धर्मपुरी बस अग्निकांड : 3 दोषियों की मौत की सजा पर रोक (लीड-1)

नई दिल्ली, 28 जनवरी (आईएएनएस)। सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को तमिलनाडु के धर्मपुरी बस अग्निकांड (2000) के उन तीन दोषियों की सजा के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी, जिन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी। ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शन के दौरान इस घटना में तीन छात्राएं जिंदा जल गई थीं।

गौरतलब है कि कोडाइकनाल स्थित प्लीजेंट स्टे होटल में हुए अनधिकृत निर्माण मामले में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) की प्रमुख जे.जयललिता को फरवरी 2000 में दोषी ठहराए जाने के बाद राज्यभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था। इसी दौरान विरोध प्रदर्शन कर रहे एआईएडीएमके के कार्यकर्ताओं ने धर्मपुरी में एक बस में आग लगा दी थी। नतीजतन बस में यात्रा कर रहीं कृषि विश्वविद्यालय की तीन छात्राएं जल गई थीं।

याचिकाकर्ता द्वारा शीर्ष अदालत के 1966 के नियम में संशोधन की मांग करने पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बी.सुदर्शन रेड्डी और न्यायमूर्ति एस.एस. निज्जर की खंडपीठ ने शीर्ष अदालत के रजिस्ट्रार को नोटिस जारी किया है।

याचिकाकर्ता ने 1966 के नियम में संशोधन की मांग की है जिससे मृत्युदंड की सजा सम्बंधी मामले की सुनवाई पांच या कम से कम तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ही करे।

याचिकाकर्ता ने याचिका में कहा है कि मृत्युदंड की सजा सम्बंधी मामले पर शीर्ष अदालत के फैसले की समीक्षा की सुनवाई खुली अदालत में हो। इसके साथ ही समीक्षा चाहने वाले याचिकताकर्ता को अपने बचाव में मौखिक दलील पेश करने का अवसर प्रदान किया जाए।

ज्ञात हो कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी.एस.सिंघवी और न्यायमूर्ति बी.एस.चौहान की पीठ ने अगस्त 2010 में तीन लोगों- सी.मुनियप्पा, नेडु नेडुनचेझियन और मधु रवींद्रन को इस घटना के लिए दोषी ठहराया था और उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। लेकिन शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय ने दोषियों के खिलाफ सजा के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी।

सबसे पहले सलेम की निचली अदालत ने 16 फरवरी, 2007 को इस मामले में तीन लोगों को दोषी करार दिया था। इसके बाद छह दिसम्बर, 2007 को मद्रास उच्च न्यायालय ने तीनों दोषियों की अपील खारिज कर दी थी। 30 अगस्त, 2010 को शीर्ष अदालत ने तीनों के दोष को बरकरार रखते हुए उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई थी।

उल्लेखनीय है कि चेन्नई की एक अदालत ने फरवरी 2000 में कोडाइकनाल में स्थित सात मंजिला प्लीजेंट स्टे होटल में हुए अनधिकृत निर्माण को अधिकृत करने के लिए जयललिता और चार अन्य को दोषी ठहराया था और प्रत्येक को एक-एक वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। जयललिता ने जिस समय इस अनधिकृत कार्य को अंजाम दिया था, उस समय वह राज्य की मुख्यमंत्री (1991-96) थीं।

वर्तमान में समीक्षा याचिका की सुनवाई वे ही संबंधित न्यायाधीश चैंबर में करते हैं जिन्होंने फैसला सुनाया है। इसके साथ ही याचिकाकर्ता को बचाव में दलील पेश करने का अवसर नहीं दिया जाता है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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