हम कैसे भूल सकते हैं 26/11

मैं उस वक्त दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान में पत्रकारिता की छात्रा थी। मुझे आज भी याद है 26/11 की वो शाम जब करीब रात आठ बजे समाचार चैनलों ने दिखाना शुरु किया कि मुंबई में कोई दो गुटों के बीच कोई गैंगवार या मुठभेड़ चल रही है। शुरु के दो घंटे तक स्पष्ट नहीं हो पा रहा था कि आखिर मुंबई में चल क्या रहा है।
रात में करीब 10 बजे खबर आई कि ये कोई मामूली मुठभेड़ नहीं बल्कि आतंकवादी हमले हैं। सारे टीवी चैनलों पर ये खबर ब्रेकिंग न्यूज की तरह चलाई जा रही थी। अगले दिन सुबह पता चला कि मुठभेड़ अभी जारी है मगर शायद ही किसी को अंदेशा था कि ये आतंकवादी हमले इतने सुनियोजित थे और अगले दो दिन भी चलने वाले थे।
अगले दिन के अखबार मुंबई हमलों की खबरों से पटे पड़े थे और अगले कई दिन ये सिलसिला चलता रहा। पूरा देश जानने को बेचैन था कि मुंबई में क्या हालात थे। हमने अपने देश में इससे पहले कभी इतने बड़े आतंकवादी हमला नहीं देखा था और ना ही भविष्य में कभी देखना चाहेंगे।
मुझे आज भी याद है उस दिन दिल्ली की सड़कों से लेकर बस, मेरे कालेज और हास्टल में सिर्फ ये ही बातें चल रही थी। लोग टीवी पर लगातार चिपके थे और इलैक्ट्रानिक मीडिया हमें पल-पल की खबर दे रहा था, सीधे मुंबई से।
देश की जनता ने पहली बार आतंकवादी हमलों का लाइव टेलीकास्ट टेलीविजन पर देखा। मीडिया ने इन हमलों का जो लाइव कवरेज किया उसे लेकर उसकी बाद में जबरदस्त निंदा की गई, मगर हम अब भी नहीं जानते कि हमारे मीडिया को इससे कुछ फर्क पड़ा या नहीं।
आज दो साल बाद ऐसा जान पड़ रहा है जैसे 26/11 जैसे बड़े और सुनियोजित आतंकी हमले को हम और हमारे नेता भूलते जा रहे हैं। हमलों के दोषियों में से एक अजमल कसाब को तक सजा दिलवाने में हमारे नेताओं के अंदर वो आग नहीं महसूस होती जो कि होनी चाहिए आखिर ऐसा क्यों? अपनी राय और टिप्पणियां लिखने के लिए नीचे बने कमेंट बॉक्स का उपयोग करें।












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