पाकिस्तान की संविधान सभा का उद्घाटन भाषण (गणतंत्र दिवस पर विशेष-2)

नई दिल्ली, 18 जनवरी (आईएएनएस)। आईएएनएस की चुनिंदा भाषणों की श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज पेश है मुहम्मद अली जिन्ना का भाषण। पाकिस्तान की संविधान सभा की पहली बैठक अगस्त 1947 में कराची में हुई और सभा को संबोधित करने के लिए उसके अध्यक्ष की हैसियत से मुहम्मद अली जिन्ना (1876-1948) एक सहज प्रत्याशी थे।

यह जिन्ना का उद्घाटन भाषण था और बिना तैयारी के किया गया था। उनके श्रोताओं में अधिकांशत: मुल्ला, पीर, नवाब, शाह एवं खान थे और पाकिस्तान को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में देखने, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने की आजादी होगी, की अपनी दृष्टि से उन्होंने उन सबको चकित कर दिया। अपने व्यक्तिगत जीवन में जिन्ना कभी एक रूढ़िवादी मुस्लिम नहीं रहे थे और अपनी विजय के क्षणों में, जब वे मुसलमानों को एक देश देने में सफल रहे थे, जिसे वे अपना कह सकें - उन्होंने अचानक अपने लिए और अपनी राजनीति के लिए फिर से एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्तित्व धारण कर लिया। वर्ष 2005 में अपनी कराची यात्रा के दौरान अपने विवादास्पद भाषण में एल.के. आडवाणी ने इस भाषण की प्रशंसा की थी। पेश है भाषण-

मि. प्रेसीडेंट, देवियों और सज्जनो!

अपना पहला राष्ट्रपति चुनकर आपने मुझे जो सम्मान दिया है - वह सर्वोच्च सम्मान, जो इस सार्वभौम सभा के लिए संभव है - उसके लिए मैं आपका हार्दिक धन्यवाद करता हूं। मैं उन नेताओं को भी धन्यवाद देता हूं, जिन्होंने मेरी सेवाओं की और मेरी सराहना की है। मुझे पूरा विश्वास है कि आपके समर्थन और सहयोग से हम इस संविधान सभा को दुनिया के लिए एक मिसाल बना देंगे।

संविधान सभा को दो मुख्य कार्य करने हैं। पहला है - पाकिस्तान के भावी संविधान बनाने का दूभर और जिम्मेदारी भरा कार्य तथा दूसरा पाकिस्तान के संघीय विधानमंडल के रूप में एक संपूर्ण सार्वभौम संस्था की तरह कार्य करना। पाकिस्तान के संघीय विधानमंडल के लिए एक अंतिम संविधान अपनाने हेतु हमें अपनी सर्वोत्तम प्रतिभा का परिचय देना होगा।

आप सब जानते हैं कि न केवल हम खुद इस पर अचरज कर रहे हैं, बल्कि इस अभूतपूर्व तूफानी क्रांति, जिसने इस उपमहाद्वीप में दो स्वतंत्र सार्वभौम राष्ट्रों की स्थापना की योजना को साकार किया है, पर सारी दुनिया अचरज कर रही है। अपने आप में यह अभूतपूर्व है; दुनिया के इतिहास में इसका समकक्ष नहीं है। यह विशाल उपमहाद्वीप जिसमें सभी प्रकार के लोग रहते हैं, एक ऐसी योजना के अंतर्गत लाया गया है, जो दैत्याकार, अनजाना और अतुलनीय है। और इसके संबंध में जो बात बहुत महत्वपूर्ण है, वह यह है कि हमने इसे शांति और नैतिक साधनों से प्राप्त किया है।

इस सभा के पहले समारोह में शरीक होने के कारण मैं इस वक्त बहुत सुविचारित घोषणाएं नहीं कर सकता; परंतु मैं कुछ बातें कहूंगा, जो इस वक्त मेरे मन में आ रही हैं। पहली और मुख्य बात, जिस पर मैं जोर देना चाहूंगा, यह है - याद रखिए, अब आप एक सार्वभौम विधायी संस्था हैं और आपके हाथों में सारी शक्तियां हैं। इसलिए वह आप पर भारी जिम्मेदारी डालता है कि आपको अपने फैसले किस तरह लेने चाहिए। इस पर मैं जो पहली टिप्पणी करना चाहूंगा वह यह है। निस्संदेह, आप मुझसे सहमत होंगे कि एक सरकार का पहला कर्तव्य है कि कानून और व्यवस्था लागू करना, जिससे राज्य अवाम के जान-माल और उसके धार्मिक विश्वासों को पूरा संरक्षण दे सकें।

मेरे मन में जो दूसरी बात आती है वह यह है। जिन सबसे बड़े शापों से भारत ग्रस्त है - मैं यह नहीं कहता कि दूसरे देश इससे मुक्त हैं, परंतु हमारी स्थिति कहीं बदतर है - वे हैं घूस और भ्रष्टाचार। वे सचमुच जहर हैं। हमें उससे सख्ती से निपटना होगा और मुझे आशा है कि आप जितनी जल्दी संभव हो, ऐसे कदम उठाएंगे कि यह सभा उस दिशा में कुछ कर सके।

कालाबाजारी एक और अभिशाप है। यह ठीक है कि मैं जानता हूं कि कालाबाजारी अक्सर पकड़े जाते हैं और उन्हें सजा मिलती है। अदालतें उन्हें सजा देती हैं और कभी-कभी उन पर केवल जुर्माना लगाया जाता है। अब आपको इस राक्षस से निपटना है, जो कि समाज के खिलाफ एक बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा अपराध है - हमारे विपदाग्रस्त हालात में जब हम भोजन और जीवन की दूसरी जरूरी चीजों की लगातार किल्लत झेल रहे हैं। मैं समझता हूं कि एक कालाबाजारी सबसे बड़े और जघन्य अपराधों से भी बड़ा अपराध करता है।

ये कालाजारिए असल में जानकार, बुद्धिमान एवं अमूमन जिम्मेदार लोग होते हैं और जब वे कालाबाजारी करते हैं तो मैं समझता हूं कि उन्हें कड़ी सजा दी जानी चाहिए, क्योंकि वे खाद्य पदार्थो और दूसरी जरूरी चीजों पर नियंत्रण व नियमन की पूरी प्रणाली को कमजोर बनाते हैं तथा बड़े पैमाने पर भुखमरी और अभाव पैदा करते हैं।

अगली चीज जो मेरा ध्यान खींचती है वह यह है - यह भी हमें विरासत में मिली हैं। कई अच्छी और बुरी बातों के साथ यह भयंकर बुराई भी आ गई है -भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार की बुराई। इस बुराई को कठोरता से कुचल दिया जाना चाहिए। मैं यह बिल्कुल साफ कर देना चाहता हूं कि मैं किसी तरह का भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद या प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मुझे प्रभावित करने की कोशिशों को कतई सहन नहीं करूंगा। जहां कहीं भी मैं इसका चलन देखूंगा, चाहे वह ऊंचे स्तर पर हो या नीचे, उसे खत्म कर दूंगा।

मैं जानता हूं कि ऐसे लोग हैं, जो हिन्दुस्तान के बंटवारे तथा पंजाब और बंगाल के बंटवारे से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उसके खिलाफ बहुत कुछ कहा गया है, लेकिन अब, जबकि वह स्वीकार कर लिया गया है, हममें से हर एक का यह फर्ज है कि निष्ठा से उसका पालन करें तथा उस समझौते के अनुसार ईमानदारी से कार्य करें, जो अब अंतिम और सब पर बाध्यकारी है। लेकिन आपको याद रखना चाहिए कि, जैसा मैंने कहा, यह महान क्रांति अभूतपूर्व है। दोनों समुदायों की भावनाओं को कोई भी अच्छी तरह समझ सकता है; जहां एक समुदाय बहु संख्या में है और दूसरा अल्प संख्या में। मगर सवाल यह है कि क्या यह संभव या व्यवहार्य था कि हमने जो कुछ किया है, वह न करके कुछ और कर लें? विभाजन जरूरी था।

हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों तरफ ऐसे वर्ग हैं, जो इससे सहमत न हों, इसे पसंद न करते हों; परंतु मेरे से इस समस्या का और कोई हल नहीं था और मुझे विश्वास है कि भावी इतिहास इसके पक्ष में अपना फैसला दर्ज करेगा। यही नहीं, जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, हमारे वास्तविक अनुभव से यह साबित हो जाएगा कि भारत की संवैधानिक समस्या का वही एक समाधान था। एक संयुक्त भारत का कोई भी विचार काम नहीं करता और मेरे विचार से वह हमें महाविनाश की ओर ही ले जाता। यह नजरिया सही हो सकता है और गलत भी, यह देखा जाना बाकी है। फिर भी, इस विभाजन में दोनों में से किसी राष्ट्र में अल्पसंख्यकों के सवाल से बचा नहीं जा सकता था। अब वह तो अपरिहार्य है। इसका कोई दूसरा हल नहीं है। अब हम क्या करेंगे? अब यदि हम इस महान राष्ट्र पाकिस्तान को सुखी और समृद्ध बनाना चाहते हैं तो हमें अपने प्रयासों को पूरी तरह से और केवल लोगों, विशेष रूप से आम और गरीब जनता, के कल्याण पर केंद्रित करना होगा।

यदि आप भूतकाल को भूलकर, दुश्मनों को खत्म कर सहयोग से काम करेंगे तो निश्चित रूप से सफल होंगे। यदि आप जो कुछ हुआ, उसे भूलकर इस भावना से काम करते हैं कि आप में से, हर एक, चाहे वह किसी भी समुदाय का हो, चाहे भूतकाल में आपके साथ उसके संबंध कैसे भी रहे हों; चाहे उसका रंग, जाति या धर्म कुछ भी हो, वह सबसे पहले, दूसरे और अंत में इस मुल्क का नागरिक है, जिसे उतने ही अधिकार, सुविधाएं और कर्तव्य उपलब्ध हैं जितने किसी और को, तो आप यकीनन बेइंतहा तरक्की करेंगे।

मैं इस पर जितना जोर दूं, वह फिर भी कम होगा। हमें इस भावना से काम शुरू कर देना चाहिए और समय के साथ बहुसंख्यक समुदाय की कठोरताएं - हिंदू समुदाय और मुस्लिम समुदाय और मुसलमानों में भी पठान, पंजाबी, शिया, सुन्नी और दूसरे कई विभाजन हैं। इसी तरह हिन्दुओं में भी ब्राह्मण, वैष्णव, खत्री आदि और उनके साथ बंगाली, मद्रासी जैसे क्षेत्रीय विभाजन - अपने आप ही खत्म जाएंगे। असल में, अगर आप मुझसे पूछें तो भारत की आजादी की राह में यही सबसे बड़ी बाधा थी और यह न होती तो हमें बहुत पहले आजादी मिल गई होती।

कोई शक्ति किसी दूसरे राष्ट्र को, विशेष रूप से 40 करोड़ की आबादी वाले राष्ट्र को गुलाम बनाकर नहीं रख सकती; कोई आपको पराजित नहीं कर सकता था और यदि ऐसा हो भी जाता तो यह बाधा न होने पर इतने लंबे समय तक अपना प्रभुत्व कायम न रख पाता। इसलिए हमें इससे एक सबक सीखना चाहिए। पाकिस्तान राष्ट्र में आप आजाद हैं; आप अपने मंदिरों में जाने के लिए आजाद हैं; आप अपनी मस्जिदों या किसी भी पूजा स्थल में जाने के लिए स्वतंत्र हैं। आप किसी भी धर्म, जाति या पंथ से संबंधित हो सकते हैं - उसका राज्य के कामकाज से कोई संबंध नहीं है।

जैसा कि आप जानते हैं, इतिहास बतलाता है कि कुछ समय पहले इंग्लैंड में हालात आज के भारत से कहीं बदतर थे। रोमन कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट एक-दूसरे पर जुल्म करते थे। अब भी कई राज्य ऐसे हैं, जहां किसी वर्ग विशेष के साथ भेदभाव किया जाता है और उसकी स्वतंत्रता का हनन किया जाता है। खुदा का शुक्र है कि हम उन दिनों में अपनी शुरुआत नहीं कर रहे हैं। हम एक ऐसे समय में शुरुआत कर रहे हैं, जब एक समुदाय और दूसरे के बीच कोई भेदभाव नहीं है, एक जाति या पंथ और दूसरे के बीच कोई भेदभाव नहीं है। हम इस मूलभूत सिद्धांत से शुरूआत कर रहे हैं कि हम एक राष्ट्र के नागरिक, समान दर्जे के नागरिक हैं।

इंग्लैंड को एक समय इस स्थिति की सच्चाइयों का सामना करना पड़ा था और उस देश की सरकार द्वारा उन पर डाली गई जिम्मेदारियों का पालन करना पड़ा था और वे क्रमश: इस अग्निपरीक्षा से गुजरे। आज आप यह कहें कि रोमन कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट अब अस्तित्व में नहीं हैं तो गलत न होगा; अब वहां जिस चीज का वजूद है वो यह है कि हर आदमी ग्रेट ब्रिटेन का एक नागरिक, एक बराबरी का नागरिक है और वे सभी राष्ट्र के सदस्य हैं।

अब मैं समझता हूं कि एक आदर्श के रूप में हमें इसे अपने सामने रखना चाहिए और आप एक दिन पाएंगे कि हिंदू हिंदू नहीं रहेंगे और मुसलमान-मुसलमान नहीं रहेंगे - एक धार्मिक अर्थ में नहीं, क्योंकि वह प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत विश्वास है - बल्कि एक राष्ट्र के नागरिक के रूप में, राजनीतिक अर्थ में।

सज्जनों, मैं आपका और अधिक समय नहीं लेना चाहता और आपने मुझे जो सम्मान दिया है, उसके लिए एक बार फिर आपको धन्यवाद देता हूं। मैं, जैसा कि राजनीतिक भाषा में कहा जाता है, बिना किसी पूर्वाग्रह और दुर्भावना के-दूसरे शब्दों में बिना किसी पक्षपात के - हमेशा न्याय और ईमानदारी के सिद्धांतों पर चलता रहूंगा। मेरे मार्गदर्शी सिद्धांत होंगे न्याय और संपूर्ण निष्पक्षता। मुझे विश्वास है कि आपके समर्थन और सहयोग से मैं पाकिस्तान को दुनिया के महानतम देशों में से एक के रूप में देखने की उम्मीद कर सकता हूं।

मुझे संयुक्त राज्य अमेरिका से अपने नाम एक संदेश मिला है। वह इस प्रकार है - मुझे, पाकिस्तान की संविधान सभा के प्रेसीडेंट की हैसियत से श्रीमान आपको यह संदेश पहुंचाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, जो मुझे अभी-अभी अमेरिका के विदेश मंत्री से मिला है - पाकिस्तान की संविधान सभा की पहली बैठक के अवसर पर मैं आपको और सभा के सदसयों को, जो कार्य आप हाथ में लेने जा रहे हैं, उसके सफल निष्पादन के लिए अमेरिका की सरकार और उसकी जनता की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं।

(प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित और रुद्रांक्षु मुखर्जी द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'भारत के महान भाषण' से साभार।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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