पशुपतिनाथ हमला हमने नहीं किया: माओवदी

Pashupatinath temple
काठमांडू। प्राचीन पशुपतिनाथ मंदिर के दो भारतीय पुजारियों पर हुए हमले को लेकर भारत और नेपाल के बीच तनाव पैदा हो गया है। इस बीच माओवादियों ने हमले में अपनी भूमिका से इंकार करते हुए कहा है कि धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप उनकी नीति के खिलाफ है।

प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल द्वारा इस घटना के लिए पूर्व माओवादियों को जिम्मेदार ठहराए जाने के ठीक बाद पूर्व माओवादी मंत्री और पार्टी के विदेशी मामलों के प्रमुख कृष्ण बहादुर महारा ने एक बयान जारी कर कहा कि इस मामले से उनकी पार्टी का कुछ भी लेना-देना नहीं है।

महारा ने अपने बयान में कहा है, "हर कोई इस बात को जानता है कि नेपाली जनता लंबे समय से पशुपतिनाथ में नेपाली पुजारियों की नियुक्ति की मांग कर रही है। यह भी सर्वविदित है कि हाल में सरकार द्वारा की गई दो पुजारियों की नियुक्ति के खिलाफ जनता ने अपने स्तर पर एक संघर्ष समिति का गठन किया था।"

पीएम ने कार्रवाई का भरोसा दिलाया

इससे पहले प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल ने कहा कि भारतीय पुजारियों पर हुए हमले की इस घटना को अंजाम देने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। प्रधानमंत्री ने कहा, "हम ऐसी वारदातों के मूकदर्शक नहीं हैं। अपराधियों को कटघरे में खड़ा किया जाएगा।"

काठमांडू में एक अस्पताल के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि इस विवाद के पीछे माओवादियों की भूमिका है। माओवादी भारत-नेपाल रिश्तों को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।

राजदूत की गुजारिश

इस बीच भारतीय राजदूत राकेश सूद और नेपाल के संस्कृति मंत्री मीनेंद्र रिजाल ने शनिवार को मंदिर में संयुक्त रूप से प्रार्थना की। रिजाल ने इस मौके पर पत्रकारों से बातचीत में हुए कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सदियों पुरानी भारत-नेपाल मैत्री को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। नेपाल सरकार दो पुजारियों पर बर्बर एवं अपमानजनक हमले से भौंचक है। हम ऐसी कायराना कार्रवाई को बर्दाश्त नहीं करेंगे।" मंत्री ने कहा कि सरकार मंदिर के पुजारियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर है।

रिजाल ने कहा है कि भारतीय पुजारियों की नियुक्ति मंदिर के प्रावधानों के मुताबिक होती रही है। इसे राष्ट्रीयता से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "पुजारियों के चयन का आधार योग्यता है, न कि राष्ट्रीयता।"

भारतीय पुजारी का विरोध

उल्लेखनीय है कि भारत के कर्नाटक राज्य के रहने वाले गिरीश भट्ट एवं राघवेंद्र भट्ट को इस मंदिर का पुजारी बनाए जाने का पुरजोर विरोध हो रहा है। बुधवार को एक भीड़ ने दोनों पुजारियों को निर्वस्त्र कर उनकी पिटाई की थी। शनिवार की सुबह इन दोनों पुजारियों को कड़ी पुलिस सुरक्षा के बीच मंदिर में ले जाया गया।

भारतीय राजदूत ने धर्म को राजनीति में घसीटे जाने पर अफसोस जाहिर किया है। उन्होंने कहा, "धर्म एक ऐसा कारक है जो भारत एवं नेपाल की जनता को करीब लाता है, लेकिन राष्ट्रीयता के नाम पर इसे निशाना बनाया जा रहा है। धर्म और राष्ट्रीयता को एक-दूसरे से अलग रखा जाना चाहिए।"

सूद ने कहा कि जो लोग उत्पात मचा रहे हैं, उन्हें पशुपतिनाथ मंदिर और हिंदू परंपरा की जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत के बद्रीनाथ, केदारनाथ मंदिरों में तथा काशी के कई मंदिरों में नेपाली पुजारी हैं। इस बीच दंगा निरोधक पुलिस दस्ते ने शनिवार को 30 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया और मंदिर परिसर तक जाने वाली सड़क को खाली कराने के लिए पुलिस ने लाठी चार्ज किया।

आंदोलन राजनीतिक नहीं

दूसरी ओर भारतीय पुजारियों की नियुक्ति का विरोध करने के लिए गठित 'पुजारी निजुक्त बिरोध संघर्ष समिति' ने दावा किया है कि उसका आंदोलन राजनीतिक नहीं है। इस पूरे घटनाक्रम से भारत के सामने एक नई राजनयिक चुनौती पैदा हो गई है।

मंदिर के मुख्य पुजारी महाबलेश्वर बेरी ने कहा है कि अगर नेपालियों को मंदिर में भारतीय पुजारियों की मौजूदगी पसंद नहीं है तो वह अपने साथी पुजारियों के साथ भारत लौटने को तैयार हैं। उन्होंने नेपाल के लोगों से पुजारियों का अपमान न करने की अपील की है।

कर्नाटक के उडिपी जिले के रहने वाले बेरी ने कहा, "हम शरणार्थी नहीं हैं। अगर नेपाली जनता हमें पसंद नहीं करती है तो हमें भारत लौटने में कोई परहेज नहीं है। हम लोगों से अपील करते हैं कि वे हमें अपमानित न करें।" बेरी ने कहा कि भारतीय पुजारियों पर मंदिर के चढ़ावे में गबन करने का आरोप बिल्कुल निराधार है। उन्होंने कहा, "चढ़ावे से हमारा कुछ लेना-देना नहीं है। हमारी जिम्मेदारी मंदिर में सिर्फ पूजा करने की है।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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