रोगों की जड़ है मन के अंदर

नई दिल्ली, 20 जून (आईएएनएस)। कुछ वर्षो पूर्व जर्मन पत्रिका 'मेडिजिनेश क्लीनिक' में एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें कई चिकित्सा विज्ञानियों के अनुभव साररूप में छपे थे। लेख में कहा गया था कि शरीर के विभिन्न अंगों में होने वाली पीड़ा, वेदना आदि के लिए जितने कारण शरीर में विद्यमान होते हैं, उनसे कहीं अधिक मानसिक कारण इसके लिए उत्तरदायी होते हैं।

इस लेख में मन:स्थिति के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्वास भी था। ऐसे कई प्रयोगों का उल्लेख इस प्रतिपादन की पुष्टि में किया गया था, जिनसे सिद्ध होता था कि शरीर मन-मस्तिष्क का एकनिष्ठ आज्ञानुवर्ती सेवक है और उसे जैसे निर्देश मिलते हैं, वह उनका अक्षरश: पालन करता है।

डा. जुलियस ने अपने कुछ प्रयोगों के बारे में लिखा है कि एक बार मैंने केवल डिस्टिल्ड वाटर की सुई लगाकर रोगी को यह बताया कि उसे गहरी नींद की दवा दी गई है। वह कई दिनों से अस्पताल में ठीक नींद नहीं ले पा रहा था। सुई लगाने के 10-15 मिनट बाद जब वे उधर से निकले, तो उन्होंने देखा कि वह रोगी गहरी नींद सो रहा है।

उन्होंने आगे लिखा है कि एक दूसरे रोगी को, जिसे भी यही शिकायत थी, नींद लाने वाली तेज औषधि दी गई और कहा कि इससे थोड़ी नींद आ जाएगी और तुम्हारा दर्द भी हलका पड़ जाएगा। यह संदेह पैदा करने के बाद रोगी को नींद नहीं आई और वह पूर्ववत दर्द की शिकायत करता रहा।

इस प्रयोग के बाद उन्हीं दवाओं के विपरीत निर्देश देकर, उनके दूसरे परिणाम बताकर दी गई, तो देखने में आया कि पहले से सर्वथा भिन्न प्रतिक्रियाएं हुई हैं। पहले दिन के पानी का इंजैक्शन साधारण दवा बताकर लगाया गया, तो उससे न दर्द कम हुआ, न ही रोगी को नींद आई।

इसके साथ ही, दूसरे रोगी को नींद लाने का आश्वासन दिया गया, तो उसे गहरी नींद आई। इन प्रयोगों के आधार पर डाक्टर जूलियस ने यह निष्कर्ष प्रतिपादित किया कि दवाएं जितना परिणाम उत्पन्न करता है, उनसे अधिक प्रभाव कहीं उनके संबंध में मान्यताओं का होता है।

इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि एक ही तरह के दर्द को भिन्न-भिन्न मन:स्थिति के लोग अलग-अलग तरह से अनुभव करते हैं। डरपोक किस्म के रोगी किसी प्रकार के दर्द के कारण बुरी तरह चीखते-चिल्लाते हैं। मध्यम मन:स्थिति वाले मात्र हलके-हलके कराहते रहते हैं, लेकिन साहसी लोग उसी कष्ट को बहुत हलका मानते हैं। युद्ध के मोच्रे पर घायल होने वाले सिपाही अपनी बहादुरी की मान्यता के आवेश में कम कष्ट अनुभव करते हैं, जबकि उतने ही घाव लगने पर अन्य व्यक्ति कई गुना अधिक कष्ट अनुभव करते हैं।

भावनात्मक तनाव भी कई बार दर्द में परिणत हो जाता है। सिरदर्द, पेट के दर्द और जोड़ों में दर्द के लिए शारीरिक कारणों से अधिक मनोवैज्ञानिक कारण उत्तरदायी होते हैं। इनके मूल में कोई चिंता, कोई आशंका, कोई भय, भावी अशुभ की आशंका अथवा भूतकाल की कोई दु:खद स्मृति काम करती है। मन की यह अवस्था शरीर के किन्हीं अंगों पर आच्छादित होकर उन्हें पीड़ा का अनुभव कराती है।

कई बार ऐसी स्थिति भी देखी गई है कि डाक्टर अपने समस्त निदान-परीक्षण करने के उपरांत भी रोगी में अस्वस्थता के कोई कारण नहीं जान पाता या कोई कारण का पता नहीं चलता, किन्तु रोगी अपने को बराबर रोग से पीड़ित अनुभव करता है, कष्ट उठाता है, दिनों-दिन दुबला होता जाता है और साधारण काम-काज करने में समर्थ नहीं रहता।

यद्यपि रोग का कोई कारण पकड़ में नहीं आता, फिर भी उसका कष्ट स्पष्ट दीख पड़ता है। यह कहा जाए कि रोगी ढोंग कर रहा है, तो उसका भी कोई कारण समझ में नहीं आता क्योंकि उस रुग्णता का पूरा भार रोगी को उठाना पड़ता है। इस प्रकार के विचित्र रोगों की जड़ खोज लेने में अब मनोविज्ञान सफल होता जा रहा है।

मनोविज्ञान के क्षेत्र में हुई नवीनतम खोजों के अनुसार इस प्रकार के विचित्र और न पकड़ में आने वाले रोगों का कारण मानसिक होता है। कोई पुरानी कटु अनुभूति मस्तिष्क के किसी भाग पर आक्रमण करती है और वहां के संतुलन को गड़बड़ा देती है क्योंकि मस्तिष्क की प्रत्येक कोशिका आपस में एक-दूसरे के साथ जुड़ी रहती हैं और आपस में कई प्रकार के आदान-प्रदान का क्रम चलता है।

इसी प्रक्रिया के अंतर्गत लगे हुए आघात संबद्ध केंद्र तक ही सीमित न रहकर शरीर के अन्य अंग-अवयवों को भी प्रभावित करते हैं और वे अंग भी रुग्णता अनुभव करने लगते हैं। शारीरिक दृष्टि से वह अंग निरोग रहता है, किंतु मस्तिष्क का विद्युत प्रवाह उस स्थान तक ठीक तरह से नहीं पहुंच पाता, क्योंकि संवेदना अनुभव करने वाले कोश रुग्णावस्था में पड़े रहते हैं। यह गड़बड़ी संबंधित अंग तक पूरी खुराक और सही निर्देश नहीं पहुंचने देती।

इस तरह के रोग न होने पर भी रोगी वस्तुत: कष्ट का वैसा ही अनुभव करता है, लेकिन डाक्टर के सामने भी यह समस्या रहती है कि वह क्या करे और क्या न करे? इस तरह की मानसिक गुत्थियों और उलझनों की उसे जानकारी नहीं होती। इसलिए ऐसे रोगियों को मन:चिकित्सक के पास जाने की सलाह देकर वह अपना पिंड छुड़ा लेता है।

(यह लेख पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का है जो शांतिकुञ्ज फीचर्स द्वारा जारी किया गया है)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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