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सरकारी वरदान बने गेहूं किसानों के लिए अभिशाप!

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    नई दिल्ली, 12 मई (आईएएनएस)। तमाम उपायों को अपनाकर सरकार आखिर गेहूं की सरकारी खरीद के लक्ष्य को कमोबेश एक सप्ताह पहले ही हासिल कर चुकी है। लेकिन प्रश्न उठता है किसानों को आगे क्या मिलेगा। आसन्न स्थितियों पर गौर करने पर पाएंगे कि आखिर किसान कुल मिलाकर घाटे में ही रहेंगे।

    नई दिल्ली, 12 मई (आईएएनएस)। तमाम उपायों को अपनाकर सरकार आखिर गेहूं की सरकारी खरीद के लक्ष्य को कमोबेश एक सप्ताह पहले ही हासिल कर चुकी है। लेकिन प्रश्न उठता है किसानों को आगे क्या मिलेगा। आसन्न स्थितियों पर गौर करने पर पाएंगे कि आखिर किसान कुल मिलाकर घाटे में ही रहेंगे।

    खाद्यान्नों की कीमतों में तेजी किसानों के लिए कितनी बड़ी समस्या है, इस पर सरकार अगर गौर करती तो यह स्थिति पैदा नहीं होती। आज महंगाई व खाद्यान्नों की आसमान छूती कीमतों को लेकर बवाल मचा हुआ है, लेकिन किसानों की वजह से नहीं बल्कि कारोबारियों और बाजार पर नियंत्रणकारी शक्तियों के हितों को लेकर है।

    आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी खरीद लक्ष्य हासिल होने के बाद सरकार अगर खरीद में ढील देती है तो बाजार में आवक का दबाव बढ़ जाएगा। और इन स्थितियों में किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम पर गेहूं बेचनी होगी।

    पिछले वर्ष के दौरान देश भर में 1.50 करोड़ टन गेहूं की सरकारी खरीद -लक्ष्य के विरूद्ध सिर्फ 1.11 करोड़ टन गेहूं की सरकारी खरीद हो सकी थी। पिछले वर्ष से सबक लेकर सरकारी खरीद को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार ने मौजूदा रबी सीजन के दौरान गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य को 850 रुपये प्रति 100 किलो से बढ़ाकर एक हजार रुपये कर दिया।

    सरकार ने निजी कंपनियों को सरकारी खरीद से दूर रखने के लिए भी हरसंभव उपाय किए। इस बाबत सरकार द्वारा रेल मंत्रालय को निर्देश दिए गए कि वह गेहूं की ढुलाई के लिए सरकारी एजेंसियों से इतर किसी अन्य को बैगन न उपलब्ध कराएं। सरकार के उपाय सफल हुए और निजी कंपनियों को खरीद में भाग लेने से रोका जा सका।

    सरकार का इस वर्ष हरसंभव प्रयास रहा कि निर्धारित लक्ष्य को जल्दी से जल्दी हासिल कर लिया जाए ताकि पिछले वर्ष जैसी स्थिति का फिर से सामना न करना पड़े। पिछले वर्ष सरकारी खरीद में कमी के मद्देनजर सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए कुल 18 लाख टन गेहूं का आयात करना पड़ा था।

    इस बार सरकार ने हालांकि गेहूं की सरकारी खरीद के लक्ष्य को एक ही महीने में हासिल कर लिया। पिछले शुक्रवार यानी 9 मई तक सरकार द्वारा 1.801 करोड़ टन गेहूं की खरीद की जा चुकी थी जबकि लक्ष्य 1.50 करोड़ टन गेहूं की सरकारी खरीद का था। पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में सरकारी खरीद में दोगुना वृद्धि दर्ज की गई है। सरकारी सूत्रों के अनुसार सरकार अभी 25 से 30 लाख टन और गेहूं खरीद सकती है।

    उधर, मौजूदा वर्ष के दौरान देश में 7.75 से 7.80 करोड़ टन गेहूं उत्पादन की संभावना है। सरकार हालांकि पिछले वर्ष के स्टाक को जोड़कर कुल 7.67 करोड़ टन गेहूं उत्पादन की बात कह रही है। अमेरिकी कृषि विभाग के अनुसार देश में गेहूं का पहले से उपलब्ध स्टाक 64 लाख टन का था।

    बंपर उत्पादन के मद्देनजर इतना तो स्पष्ट है कि पर्याप्त सरकारी खरीद के बावजूद बाजार में भारी मात्रा में गेहूं उपलब्ध होगी। फिलहाल बाजार में दैनिक आवक तकरीबन 13 लाख टन के आस-पास है। महीने के अंत तक आवक में और भी तेजी के आसार हैं।

    आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी खरीद के पूरा हो जाने के बाद निजी कंपनियां और कारोबारी बाजार में उपलब्ध गेहूं खरीदने में रुचि नहीं ले सकते हैं। और यह स्थिति किसानों के लिए परेशानी का सबब होगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि पिछले दो वर्षो से कारोबारियों और निजी कंपनियों के लिए गेहूं खरीद फायदे का सौदा रहा है। लेकिन इस वर्ष गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी और निर्यात पर प्रतिबंध से स्थितियां बदल गई हैं।

    कारोबारी कहते हैं कि सरकार द्वारा पर्याप्त गेहूं खरीद के मद्देनजर खरीद सीजन के बाद खुले बाजार में गेहूं की पर्याप्त उपलब्धता होगी और इस वजह से कीमतों में नरमी आ सकती है। फिलहाल गेहूं की खरीद 3 रुपये प्रति किलो महंगा पड़ रहा है। इसलिए खरीद सीजन के बाद ही गेहूं खरीदना उचित होगा।

    कारोबारियों के अनुसार ऐसी स्थिति में बाजार में गेहूं की उपलब्धता बढ़ेगी और कारोबारियों व निजी कंपनियों की गैर मौजूदगी में किसानों को औने पौने यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम कीमत पर गेहूं की बिक्री करनी होगी। इस बात की पर्याप्त संभावना है कि सरकार ऐसी स्थिति में हस्तक्षेप करना नहीं चाहेगी और अंतिम नुकसान किसानों को ही होगा।

    इतना ही नहीं, सरकार की निजी कंपनियों को खरीद से दूर रखने के लिए किए गए उपायों व नियंत्रण भी किसानों के लिए फायदे की जगह परेशानी पैदा कर रहे हैं। सरकार ने निजी गोदामों को भी सरकारीोरीद की गेहूं को रखने के लिए अपने नियंत्रण में ले लिया है जिससे किसानों का गेहूंोरीद के इंतजार में खुले आसमान के नीचे पड़ा हुआ है।

    रेलवे बैगन की अनुपलब्धता की वजह से राज्य सरकार चाहकर भी अतिरिक्त गेहूं को बिक्री के लिए दूसरे राज्यों को नहीं भेज पा रही है। ऐसी स्थिति अगर दो चार दिन और बरकरार रहती है तो गेहूं की कीमतों पर दबाव बढ़ेगा। कुल मिलाकर कहें तो अत्यधिक सरकारी नियंत्रण की वजह से स्थितियां किसानों के प्रतिकूल हो गई हैं।

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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