बलात्कार पीड़ितों की मदद में बाधा महिला न्यायाधीशों की कमी
नई दिल्ली, 4 मई (आईएएनएस)। केंद्र सरकार द्वारा बलात्कार पीड़ितों की मदद के लिए पिछले सप्ताह लिए गए दो फैसले कागज पर भले ही अच्छे लगते हों लेकिन उनको लागू करने से परिस्थितियों में सुधार आएगा इसका आश्वासन नहीं दिया जा सकता। इसमें सबसे बड़ी बाधा यह है कि देश में महिला न्यायधीशों की संख्या बहुत कम है।
नई दिल्ली, 4 मई (आईएएनएस)। केंद्र सरकार द्वारा बलात्कार पीड़ितों की मदद के लिए पिछले सप्ताह लिए गए दो फैसले कागज पर भले ही अच्छे लगते हों लेकिन उनको लागू करने से परिस्थितियों में सुधार आएगा इसका आश्वासन नहीं दिया जा सकता। इसमें सबसे बड़ी बाधा यह है कि देश में महिला न्यायधीशों की संख्या बहुत कम है।
सरकार ने पिछले सप्ताह फैसला लिया था कि दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन किया जाएगा जिसके तहत बलात्कार के मामलों में महिला जजों की नियुक्ति की जाएगी और उनका मुकदमा उनके घरों पर चलाया जाएगा।
इस मामले में सबसे बड़ी अड़चन तो यही है कि देश में महिला न्यायधीशों की संख्या बहुत कम है। कानून एवं न्याय मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार देश भर के उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में कुल मिलाकर केवल 39 महिला न्यायाधीश हैं जबकि इन जगहों पर पुरुष न्यायाधीशों की संख्या 556 है।
सरकार के इस फैसले पर अपना रोष व्यक्त करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने आईएएनएस से कहा, "महिला और पुरुष न्यायाधीशों में यह भेदभाव पूरी तरह असंवैधानिक है। मैं मानता हूं कि महिलाएं महिलओं की परेशानियां ज्यादा भली भांति समझती हैं लेकिन मैं सेक्स के आधार पर भेदभाव के खिलाफ हूं।"
वरिष्ठ अधिवक्ता कामिनी जायसवाल ने आईएएनएस से कहा, "सुधारों में कहा गया है कि पुलिस घर जाकर पीड़ित का बयान दर्ज करेगी यह तो उसके लिए और शर्मनाक बात होगी।"
जायसवाल ने कहा कि बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा पूछे जाने वाले गंदे और दोहरे मतलब वाले सवालों के बारे में कोई नियम क्यों नहीं बनाया गया।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष अकेले दिल्ली में बलात्कार के 623 मामले दर्ज किए गए थे।
प्रस्तावित सुधारों में कहा गया है कि मामले की सुनवाई पीड़ित के घर पर होगी जहां कैमरों के द्वारा इसकी रिकार्डिग की जाएगी और मामले की सुनवाई तीन महीने के भीतर पूरी कर ली जाएगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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