देश के कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा है सपना

नई दिल्ली, 4 मई (आईएएनएस)। सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले देश के 93 प्रतिशत कामगार खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाएं इनके लिए एक सपना है।

'पीपुल्स कॉलेक्टिव फॉर इकॉनोमिक, सोशल एंड कल्चरल राइट' (पीसीइएससीआर) नामक संगठन की ओर से कराए गए सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि कामगारों की सामाजिक सुरक्षा का मुद्दा सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। यह संगठन 150 गैर सरकारी संस्थाओं का संघ है।

संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार समिति (सीइएससीआर) में वर्ष 2006 में जमा की गई सरकारी रिपोर्ट की प्रतिक्रिया में इसे तैयार किया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जीडीपी में असंगठित क्षेत्र के कामगारों का 62.3 प्रतिशत योगदान के बावजूद उनकी सामाजिक सुरक्षा अधर में है। देश में लगभग 37 करोड़ असंगठित क्षेत्र के कामगार हैं जो कुल कामगारों का 93 प्रतिशत हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक असंगठित क्षेत्र के मात्र 0.4 प्रतिशत कामगारों को सामाजिक सुरक्षा से जुड़े भविष्य निधि कोष जैसी सुविधाएं मिल रही हैं। मुआवजा कानून 1923 के तहत ठेके पर काम करने वाले कामगारों, स्वरोजगार व अन्य असंगठित क्षेत्र के कामगारों को कोई सामाजिक सुरक्षा सुविधा नहीं मिलता है।

दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-2007) में असंगठित क्षेत्र के लिए सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी सुविधा देने पर बल दिया गया था। उस समय से लेकर अब तक 14 अरब रुपये इस दिशा में खर्च किए जा चुके हैं लेकिन अब भी अधिकतर कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा एक सपना बना हुआ है।

पीसीइएससीआर के सदस्य सुनिल सिंह ने कहा, "इस रिपोर्ट को तैयार करने का उद्देश्य इतना भर है कि सही दिशा में सकारात्मक विकास हो।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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