75 साल में कितना बदल गया भारत, एक नजर में बदलाव की पूरी कहानी

नई दिल्ली, 15 अगस्त: आजादी के बाद भारत की 74 साल की विकास यात्रा संघर्ष और रफ्तार की पूरी कहानी बयां करती है। साढ़े सात दशकों में भारत ने कुछ चुनौतियों का अद्भुत तरीके से सामना करके विश्व में अपनी प्रचीन प्रतीष्ठा वापस कायम की है तो हमारे सामने कोरोना जैसी कुछ चुनौतियां नए सिरे से खड़ी भी हुई हैं। इसमें कोई दो राय नहीं की आज भारत की बात दुनिया गौर से सुनने को मजबूत हुई है तो कई ऐसे क्षेत्र भी हैं, जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ी बाधा बनी हुई है। हम यहां कुछ आंकड़े पेश कर रहे हैं, जिससे बदली हुई तस्वीर की एक झलक मिल सकती है, साथ ही साथ जो कमियां रह गई हैं, उसे सुधारने की ओर ध्यान भी जाता है।

बढ़ती आबादी सबसे बड़ी चुनौती

बढ़ती आबादी सबसे बड़ी चुनौती

अगर आजादी के बाद के 74 वर्षों में भारत के सामने खड़ी सबसे मुश्किल चुनौतियों की बात करें तो बढ़ती जनसंख्या एक बहुत बड़ा रोड़ा बनकर खड़ा हुआ है। क्योंकि, 1947 में भारत की जनसंख्या लगभग 37.6 करोड़ थी, जो अब बढ़कर 139.3 करोड़ होने का अनुमान है। आने वाले वर्षों में हम विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बनने के करीब पहुंच चुके हैं। जनसंख्या के असल आंकड़े तो 2021 में जनगणना संपन्न होने के बाद ही सामने आएंगे। 10 साल पहले यानी 2021 के जनगणना में भारत की आबादी 121 करोड़ के पार थी। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था यूआईडीएआई ने दिसंबर, 2020 के दिसंबर तक देश की आबादी 137 करोड़ होने का अनुमान जताया था।

गरीबी के खिलाफ देश को करना है लंबा संघर्ष

गरीबी के खिलाफ देश को करना है लंबा संघर्ष

बढ़ती जनसंख्या की तरह गरीबी भी देश के लिए चुनौती बनी हुई है। जैसे अनुमानों के मुताबिक आजादी के समय देश की करीब 80 फीसदी जनसंख्या यानी करीब 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे होते थे। जबकि 2011-12 के आंकड़ों के आधार पर देश में 26.9 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे थे, जो कि उस समय की जनसंख्या के करीब 22 फीसदी के बराबर है। यानी तुलनात्मक रूप से तो आंकड़े सुधरे हैं, लेकिन 75वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे देश के लिए यह निश्चित ही परेशान करने वाली बात है।

हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर में हुआ है सुधार

हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर में हुआ है सुधार

आज जब देश 75वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है तो जनसंख्या में अप्रत्याशित इजाफे और गरीबी को छोड़ दें तो इससे जुड़े कई पहलुओं पर उम्मीद की एक नई किरण भी दिख रही है। उदाहरण के लिए आजादी के समय प्रति महिला देश में टोटल फर्टिलिटी रेट 5.9 थी, जो कि आज घटकर 2.1 रह गई है। यानी जनसंख्या में वृद्धि की रफ्तार पर ब्रेक लगाने में देश जरूर सफल रहा है। इस दौरान एक और क्षेत्र में भारत ने बहुत बड़ी सफलता पाई है। 74 साल पहले देश में इंफैंट मॉर्टिलिटी रेट (बाल मृत्यु दर: मृत्यु/1000) 181 थी, जो अब घटकर 26.6 हो चुकी है। इसी तरह आजादी के वक्त देश की आबादी की औसत आयु 37 वर्ष ही थी, जो आज बढ़कर 70.4 वर्ष हो चुकी है। इसकी वजह ये है कि तब देश में सिर्फ 2,014 सरकारी अस्पताल होते थे जो आज बढ़कर 23,000 से ज्यादा हो चुके हैं। मेडिकल कॉलेज भी 30 से बढ़कर 541 हो गए हैं और डॉक्टर भी 12 लाख से ज्यादा जुड़े हैं। लेकिन, अभी भी अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक और बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

साक्षरता दर सुधरी, लेकिन सेक्श रेशो का हुआ बुरा हाल

साक्षरता दर सुधरी, लेकिन सेक्श रेशो का हुआ बुरा हाल

ऊपर के आंकड़े गवाह हैं कि भारत ने बीते 74 वर्षों में स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़ी कामयाबी पाई है, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि अभी मीलों आगे जाना है। मसलन, सेक्स रेशो में भारत की स्थिति सुधर नहीं पाई है, बल्कि खराब हो गई है। 1951 की जनगणना के मुताबिक तब एक हजार पुरषों के मुकाबले देश की आबादी में 946 महिलाएं थीं, जो अब घटकर 934 ही रह गई हैं। जाहिर है कि इन्हीं कारणों से सरकार को बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू करने पड़ी और हरियाणा जैसे राज्यों में इसका अच्छा असर देखने को मिला है। इसी तरह साक्षरता के क्षेत्र में देश ने लंबी छलांग लगाई है। 1947 के आसपास देश में साक्षरता दर लगभग 18.3 फीसदी थी, जो कि आज की तारीख में बढ़कर 77.7 फीसदी हो चुकी है।

आम आदमी की कमाई कई गुना बढ़ी

आम आदमी की कमाई कई गुना बढ़ी

अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में देश ने बहुत ही ऊंची छलांग लगाई है। एक अनुमान के मुताबिक देश जब आजाद हुआ था, तब देश की जीडीपी मात्र 37 अरब अमेरिकी डॉलर थी, लेकिन आज यह 2,623 अरब अमेरिकी डॉलर हो चुकी है। इसी तरह मौजूदा कीमतों पर प्रति व्यक्ति आय 1947 में सिर्फ 274 रुपये सालाना थी, जो कि इस समय 1,26,968 रुपये है। उस समय देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी और इस क्षेत्र की हिस्सेदारी 53.7 फीसदी थी। लेकिन, आज यह सिर्फ 18.8 फीसदी है। जबकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर 14.4 फीसदी से बढ़कर 26.9 फीसदी और सर्विस सेक्टर 31.9 फीसदी से बढ़कर 54.3 फीसदी हुआ है। इसी तरह जीडीपी में व्यापार की हिस्सेदारी तब 11.3 फीसदी थी और आज यह 36.5 फीसदी हो चुकी है।

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