देसी बैगन की जीत

भारत सरकार द्वारा गठित जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी (जीईएसी) ने अक्टूबर 2009 में बीटी बैगन को पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित बताते हुए अपनी स्वीकृति दे दी थी । इसके बाद से ही विरोध प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया। इसे देखते हुए सरकार ने देश भर में जनसुनवाई करने का निर्णय किया। आठ दौर की जनसुनवाई की अंतिम बैठक छह फरवरी को समाप्त हो गई। बीटी बैगन को महिको ने अमेरिकी कंपनी मोनसेंटो के साथ मिलकर विकसित किया है। बीटी बैगन में मिट्टी में पाया जाने वाला क्राई 1 एसी नामक जीन डाला गया है। इससे निकलने वाले जहरीले प्रोटीन को खाने से बैगन को नुकसान पहुंचाने वाले फ्रूट एंड शूट बोरर नामक कीड़े मर जाते हैं। दरअसल, बीटी बैगन को लेकर आशंकाएं कम नहीं हैं। सामान्यतया एक ही फसल की विभिन्न किस्मों से नई किस्में तैयार की जाती हैं लेकिन जेनेटिक इंजीनियरिंग में किसी भी अन्य पौधे या जंतु का जीन का किसी पौधे या जीव में प्रवेश कराया जाता है जैसे सूअर का जीन मक्का में। इसी कारण यह उपलब्धि संदिग्ध बन गई है।
उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित दो सदस्यीय पैनल के सदस्य डा. पुष्प भार्गव के अनुसार किसी भी जीएम बीज को अनुमति देने से पहले कम से कम 30 महत्वपूर्ण परीक्षण अनिवार्य हैं। इसके विपरीत जीईएसी केवल तीन परीक्षण करती है। कई महत्वपूर्ण प्रयोग नहीं किए जाते। जीईएसी कंपनियों द्वारा दिए गए सैंपल की जांच करती है जबकि नियमत: उसे खुद सैंपल एकत्र करने चाहिए। विश्व के 180 देशों में जीएम खेती या उत्पादों पर पूरी तरह रोक लगी हुई है। विश्व की 75 प्रतिशत जीएम खेती चार देशों (अमेरिका, कनाडा, ब्राजील व अर्जेंटीना) में होती है। यहां भी सिर्फ चार फसलें (कपास, सोयाबीन, मक्का, कैनोला) में ही जीन संवर्द्धन की छूट है। इनमें से अधिकांश का प्रयोग जैव ईंधन के लिए किया जाता है। बीटी बैगन की रोग प्रतिरोधकता और अधिक उत्पादकता के दावे को भी कठघरे में खड़ा किया जा सकता है।
अब तक के अनुभवों से यही प्रमाणित होता है कि अन्य परिस्थितियों के अनुकूल रहने पर जीएम बीज शुरू में अच्छी पैदावार देते हैं, लेकिन धीरे-धीरे उत्पादकता में कमी आने लगती है। तीन-चार वषरें में ही खेत में ऐसे कीट पैदा हो जाते हैं जिनके लिए अधिक शक्तिशाली रसायनों की जरूरत पड़ती है। उदाहरण के लिए बीटी कपास में बालवर्म के विरुद्ध प्रतिरोधकता मौजूद थी, लेकिन पिछले कुछ वषरें से कई अन्य कीटों (बालवीवल, आर्मीबर्म तथा ह्वाइट फ्लाई) ने कपास की फसल को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया। अब तो बालवर्म में भी प्रतिरोधकता उत्पन्न हो रही है। केंद्रीय कपास प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, माटुंगा (मुंबई) की रिपोर्ट के अनुसार 2008-09 में बीटी कपास के 12 प्रतिशत फूल बालवर्म चट कर गए जबकि चार साल पहले तक मात्र तीन प्रतिशत कपास में ही बालवर्म लगते थे।
विशेषज्ञों के अनुसार बालवर्म इसी रफ्तार से बढ़े तो बीटी कपास की 30 प्रतिशत फसल बर्बाद हो जाएगी। कड़वा सच यह है कि जीएम तकनीक के बहाने बहुराष्ट्रीय कंपनियां पूरे विश्व की खाद्य श्रृंखला पर कब्जा जमाने की मुहिम में जुट गई हैं। आहार का आधार खेती है और खेती का आधार बीज। एक बार बीजों के मामले में पराधीन हो जाने पर किसी भी देश की राजनीतिक-आर्थिक स्वतंत्रता व खाद्य सुरक्षा सदा के लिए खत्म हो जाती है। जीएम फसलों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के अभी तक जो अध्ययन हुए हैं उनसे सिद्ध हो चुका है कि बीटी बैगन खाने के बाद गाय, बकरी, खरगोश, मछलियां और चूहे जैसे जीवों को गंभीर बीमारियों ने घेर लिया। अधिकतर जीवों के आंतरिक अंगों में विकृतियां आईं। महिको ने बीटी बैगन के गुणों को तो बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, लेकिन संभावित दुष्परिणामों को जानबूझकर छिपाया है।
अमेरिकन एकैडमी ऑफ एनवायर्नमेंट मेडिसिन (एएइएस) का कहना है कि जीएम खाद्य स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा है। विषाक्तता, एलर्जी और प्रतिरक्षण, प्रजनन, स्वास्थ्य, चय-अपचय, पाचन क्रियाओं पर तथा शरीर और आनुवंशिक मामलों में इन बीजों से उगी फसलें, उनसे बनी खाने-पीने की चीजें भयानक ही होंगी।
भारत में इस तकनीक से बने कपास के बीच बोए जा चुके हैं। ऐसे खेतों में काम करनेवालों में एलर्जी होना आम बात है। यदि पशु ऐसे खेत में चरते हैं तो उनके मरने की आशंका बढ़ती है। भैंसे बीटी बिनौले की चरी खाकर बीमार पड़ी हैं। उनकी चमड़ी खराब हो जाती है व दूध कम हो जाता है। भैंस बीटी बिनौले की खली नहीं खाना चाहती। यूरोप और अमेरिका से खबरें हैं कि मुर्गियां, चूहे, सुअर, बकरी, गाय व कई अन्य पशु जीएम मक्का और अन्य जीएम पदार्थ खाना ही नहीं चाहते।
बीटी बैंगन के व्यावसायिक उत्पादन की अनुमति देने के मामले में चल रही बहस के बीच देश के कई राज्यों नें इसका विरोध किया । पंजाब के वन व वन्य जीव, उच्च चिकित्सा शिक्षा मंत्री तीक्ष्ण सूद ने कहा कि बीटी बैंगन के व्यावसायिक उत्पादन पंजाब के हित में नहीं है।
तीक्ष्ण सूद ने कहा कि बीटी बैंगन मामले को लेकर पंजाब सरकार संजीदा है व इसके अध्ययन के लिए पंजाब के सभी मैडिकल कालेजों में विशेष सेल का गठन कर इसका अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार करने का आदेश दिया जा चुका है। तीक्ष्ण सूद ने कहा कि जब कोई नई दवा की भी इजाद की जाती है तो उसे मानव शरीर पर 15 साल तक अध्ययन करने के बाद लागू किया जाता है वहीं खाद्य पदार्थों के मामले में 22 साल तक अध्ययन करने का प्रावधान है। उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि केंद्र बीटी बैंगन के मामले में बहुराष्ट्रीय कंपनी मोनसांटो के
दबाव में राज्यों में लागू करने को विवश करना चाहती है। पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तामिलनाडु, कर्नाटक, केरल व मध्य प्रदेश जैसे बीटी बैंगन के विरोध में है वहीं गुजरात, महाराष्ट्र सरकार ने भी इस पर विचार करने के लिए समय की मांग की है। उन्होंने कहा कि सभी पक्षों का अध्ययन करने के बाद ही पंजाब इस पर कोई निर्णय लेगी। बीटी बैगन के विरोध में 30 जनवरी को केरल से लेकर दिल्ली और पश्चिम बंगाल से लेकर गुजरात तक राष्ट्रीय उपवास दिवस का आयोजन किया गया । इस देशव्यापी उपवास का आयोजन कई गैर सरकारी संगठन व किसान
संगठनों की तरफ से किया गया । मध्य प्रदेश सरकार ने बीटी बैगन पर कड़ा ऐतराज जताते हुए केंद्र सरकार से इसे बाजार में नहीं उतारने की मांग की है। इससे पहले केरल, कर्नाटक व उड़ीसा की सरकार भी बीटी बैगन पर विरोध जता चुकी है। मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री रामकृष्ण कुस्मारिया ने रमेश को लिखे अपने पत्र में कहा है कि इस राज्य के 16000 हेक्टेयर क्षेत्र में 250 किस्म के बैगन उगाए जाते हैं। ये सभी किस्में हर प्रकार की बीमारी से मुक्त व सुरक्षित है। ऐसे में वे किसी भी प्रकार से जैविक संसाधनों को बर्बाद नहीं होने देंगे। मध्य प्रदेश का कृषि विभाग एक जैविक कृषि नीति भी बना रहा है ताकि रसायनिक खाद एवं जैविक रूप से प्रसंस्कृत बीज की बिक्री प र रोक लग सके। कुस्मारिया ने बताया कि बीटी बैगन मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के साथ छोटे किसानों की खेती के लिए भी नुकसानदायक है। मध्य प्रदेश में बैगन की खेती करने वाले अधिकतर छोटे किसान हैं।
दिल्ली में सामूहिक उपवास दिवस का आयोजन करने वाले संगठन एसोसिएशन फॉर इंडिया डेवलपमेंट के पदाधिकारियों के मुताबिक बीटी बैगन सेहत व कृषि के लिए कितना उपयोगी है, इसे लेकर 30 परीक्षणों का एक मॉडल तैयार किया गया था, लेकिन 30 की जगह मात्र 6 परीक्षण किए गए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बीटी बैंगन के मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए इसका विरोध किया है।
सरसंघ चालक मोहन भागवत ने यहाँ 'सेवा संगमा' कार्यक्रम में कहा कि बीटी बैंगन को स्पष्ट रूप से खारिज किया जाना चाहिए। उन्होंने देश में बीटी बैंगन और आतंकवादियों की घुसपैठ को एक समान बताया।भागवत ने कहा लोगों की राय अब माँगी जा रही है। भारत में किसान पिछले दस हजार सालों से पारंपरिक खेती करते आ रहे हैं।
जिनेटिकली मॉडिफाइड फसलों के इस्तेमाल पर देशव्यापी बहस के बीच उत्तराखंड ने प्रदेश में बीटी बैंगन की खेती पर रोक लगा दी है। इस तरह से उत्तराखंड बीटी फसलों के खिलाफ इतना सख्त कदम उठाने वाला पहला राज्य बन गया है। राज्य के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि राज्य के संवदेनशील माहौल और यहां की प्राकृतिक विविधता को देखते हुए हमें बीटी फसलों के खिलाफ सतर्क रुख अपनाना होगा। इसी आधार पर हमने उत्तराखंड में बीटी बैंगन की खेती पर बैन लगाने का फैसला किया है। निशंक ने केंद्र से अपील की कि वह भी बीटी फसलों पर ऐसा ही रुख अपनाए। 30 जनवरी को उत्तर प्रदेश के पांच जिलों में विभिन्न किसान संगठन व गैर सरकारी संगठन के संयुक्त प्रयास के तहत उपवास दिवस गया । इनमें लखनऊ, सिद्धार्थ नगर, गोरखपुर, फतेहपुर व जालौन शामिल थे . इन संगठनों का कहना है कि बीटी बैगन का उत्पादन जहरीले जीन की मदद से की जा रही है। भारत में पहली बार किसी सब्जी पर इस प्रकार का परीक्षण किया गया है।
बी टी बैंगन है क्या
बीटी यानि बैकिलस युरिजेसिस बैंगन जैविक रूप से संशोधित मोडिफाईड बैगन है। इस बैंगन का बीज भारत की सबसे बड़ी बीज निर्माता कंपनी माईहको ने अमरीका की बहुराष्ट्रीय कंपनी मोनसांटो के साथ मिलकर तैयार किया है।
कंपनी दावा कर रही है कि यह बैंगन भारत के बैंगन की खेती करने वाले को उत्पादन व क्वालिटी के मामले में किसानों के लिए वरदान साबित हो सकता है पर पर्यावरणविदों का कहना है कि जैविक रूप से संशोधित कोई भी चीज स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए नुकसानदायक होती है। दिखने में तो यह साधारण बैंगन जैसा ही होगा। फर्क इसकी बुनियादी बनावट में है। इस बैंगन की, उसके पौधे की,
हर कोशिका में एक खास तरह का जहर पैदा करने वाला जीन होगा, जिसे बीटी यानी बेसिलस थिरुंजेनेसिस नामक एक बैक्टेरिया से निकालकर बैंगन की कोशिका में प्रवेश करा दिया गया है। इस जीन को पूरे पौधे में प्रवेश करा देने की सारी प्रक्रिया बहुत ही पेचीदा और बेहद महंगी है। इसी प्रौद्योगिकी को जेनेटिक इंजीनियरिंग का नाम दिया गया है।
क्या हो सकते हैं नतीजे
बैसिलस थ्युरिंगियेंसिस बैक्टीरिया का जीन मक्के में एक जहरीला प्रोटीन पैदा करता है, जिससे उनको नुकसान पहुंचाने वाली कॉर्नबोरर तितली का लार्वा मर जाता है। बीटी बैगन में इस जीन के मिलावट के पीछे भी पौधे में नुकसानदेह कीटों को मारने की क्षमता विकसित करने की ही सोच है। संभव है इस जीन प्रोद्यौगिकी की मदद से कीटनाशकों पर होनेवाला किसानों का व्यय बचे तथा उपज में वृद्धि हो। लेकिन मानव स्वास्थ्य व पर्यावरण पर इसका कितना दुष्प्रभाव पड़ेगा, इसका समूचा आकलन अभी शेष है।












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