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छत्‍तीसगढ़ में सलवा जुडूम का पतन

आंदोलन के आगाज के दिनों में सभी कार्यकर्ता अपने निकट संबंधियों की मौत का बदला लेने की भावना से लबरेज थे। उनमें जबर्दस्त उत्साह था। वे पूरी व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाना चाहते थे। अपने आंदोलन को वे क्रांति की तरह देखते थे। इस तारतम्य में सलवा जुडूम आंदोलन को उपयोगी बनाने और राज्य सरकार की पुलिस को ताकतवर बनाने के लिए स्पेषल पुलिस ऑ‍फीशियल (एसपीओ) का गठन किया गया।

नक्सलियों को कमजोर करने में एसपीओ ने अपनी प्रभावशाली भूमिका भी निभाई, परन्तु उन्हें नक्सलियों के गुस्से को भी झेलना पड़ा। 2006 में गंगालुर गाँव में 7 एसपीओ को बर्बर तरीके से मार डाला गया। आगे भी एसपीओ नक्सलियों के षिकार बनते रहे।

सामान्‍य समर्थक भी बनते रहते निशाना

इसी बरक्स में बिडम्बना यह है कि इसके एवज में उनको महज 2100 रुपयों की मासिक वेतन मिलता था। हाल ही में उनकी तनख्वाह को 2100 से बढ़ाकर 3000 किया गया है। इसके अलावा इन एसपीओ को न कभी किसी पुरस्कार से नवाजा गया और न ही उन्हें राज्य की नियमित पुलिस बल में शामिल किया गया।

एसपीओ को छोड़ दें तो सलवा जुडूम के सामान्य समर्थक भी हमेशा नक्सलियों का निषाना बनते रहते रहे। सलवा जुडूम को कमजोर करने की रणनीति के तहत ही नक्सलियों ने द्रोणपाल में 30 सलवा जुडूम समर्थकों को लैंडमाईन ब्‍लास्‍ट के द्वारा उड़ा दिया था।

क्लिक करें लेख का भाग-1: सलवा जुडूम- नई सोच की जरूरत

बाद में इस आंदोलन के समर्थक अपना प्रयोजन भूल गये। सलवा जुडूम का भ्रमजाल छीजने लगा। उनपर राजनीति और भ्रष्टाचार हावी हो गया। वे आदिवासियों को इस संगठन से जुड़ने के लिए मजबूर करने लगे। जो लोग अपना घर नहीं छोड़ना चाहते थे, उनको भी ऐसा करने के लिए विवष किया गया। इस आंदोलन के नेता कैम्पों में सरकार द्वारा मुहैया करवाई गई सुविधाओं का दुरुपयोग करने लगे।

बहुत सारे शीर्ष नेता मारे गए

बहुत सारे नेता मारे गये। इससे लोगों का यह भी भ्रम टूट गया कि कैम्प में रहने से उनकी जिंदगी बची रहेगी। समर्थकों को घर की याद आने लगी, क्योंकि कैम्प में वे अपनी स्वाभाविक जिंदगी को नहीं जी पा रहे थे। कैम्प का जीवन जीने का अनुभव उनके लिए जेल में जीवन जीने के समान था। वे वहाँ अपने रीति-रिवाजों का पालन करने और पर्व-त्यौहारों के उमंग को महसूस करने में असमर्थ थे।

आज गंगालुर और चेरपल कैम्प में संगठन के अधिकांष बचे हुए कार्यकर्ताओं के बीच में भारी असंतोष व्याप्त है। उन्होंने संगठन में अपना योगदान गुलामी और जिल्लत की जिंदगी से निजात पाने के लिए दिया था, किन्तु यहाँ आकर उन्हें निराशा के सिवाए कुछ भी हासिल नहीं हुआ।

लेख का अगला भाग : सलवा जुडूम के फायदे

फिलहाल सलवा जुडूम के सदस्य के रुप में उनकी पहचान ने उनका जीना मुहाल कर दिया है। अब वे न तो इस घाट के रहे हैं और न ही उस घाट के। मंझधार से निकलना उनके लिए असंभव हो गया है।

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