Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

सलवा जुडूमः नई सोच की जरुरत

छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के लिए आये दिन नक्सली होने के आरोप को झेलना और पुलिसिया अत्याचार को सहना आम बात है। हालात इतने बदतर हो गये हैं कि पुलिस उनको नक्सली समझती है और नक्सली उनको पुलिस का मुखबिर मानते हैं। लिहाजा अपनी बदहाल स्थिति से निजात पाना ही आदिवासियों का शुरु से मूल उद्देश्‍य रहा है और यह तभी संभव है जब नक्सलियों को वे अपने घर, गाँव से बाहर खदेड़ने में सफल होते हैं।

इस संदर्भ में एक अरसे से आंतक और भय के माहौल में जी रहे सीधे-साधे आदिवासियों के प्रतिकार के प्रतीक के रुप में सलवा जुडूम के गठन को देखा जा सकता है। के मधुकर राव के आह्वान पर छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिला के कुतरू ब्लॉक के अम्बेली गाँव में स्वतः स्फूर्त तरीके से सलवा जुडूम संगठन का जन्म 4 जून 2005 में हुआ। अम्बेली गाँव के साथ-साथ आस-पास के अनेक गाँव के लोग, जोकि नक्सल विरोधी थे, इस आंदोलन से जुड़ गये।

आंदोलन के जनक

के मधुकर राव पेशे से एक शिक्षक हैं। वे नक्सलियों की हिंसक और नकारात्मक मंशा से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। वे जानते हैं कि नक्सली कभी गरीब आदिवासियों का भला नहीं करेंगे। करोड़ों-अरबों की उगाही से वे सिर्फ अपना भला कर रहे हैं। विकास से उनका कोई लेना-देना नहीं है।

विकास

अपनी स्थापना के साथ ही इस संगठन के सदस्य गाँव-गाँव में जाकर अपने आकार में वृद्वि के लिए प्रयास करने लगे। उनका कारवां आगे बढ़ता गया और लोग इस कारवां का हिस्सा बनते गये। इस कवायद में राजनीतिज्ञ भी इस आंदोलन से जुड़ गए। पुलिस इनको सुरक्षा प्रदान करने लगी। साथ ही पुलिस आदिवासियों को इस आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित भी करने लगी। कालांतर में आंदोलन के पक्ष में स्थिति इतनी सकारात्मक बन गई कि इस आंदोलन के विरोधी भी इससे जुड़ गये।

हजारों की संख्या में आदिवासी अपने गाँवों को छोड़कर कैम्प में रहने लगे। दरअसल इस आंदोलन का हिस्सा बनने के बाद उनके लिए गाँव में रहना खतरे से खाली नहीं था। इसलिए उनके लिए जरुरी हो गया था कि वे सुरक्षित जगह पनाह लें। इन कैम्पों में 1 रुपये की दर से सभी को अनाज उपलब्ध करवाया जाता था। जरुरत के मुताबिक उनको नरेगा के तहत मजदूरी भी उपलब्ध करवाई गई। सभी को 35000 रुपये घर बनाने के लिए दिये गए। सभी तरह की स्वास्थ एवं शैक्षणिक सुविधा से कैम्प को सुसज्जित बनाया गया।

इस लेख के भाग-2 में- छत्‍तीसगढ़ में सलवा जुडूम का पतन

पूरे राज्य में इसतरह के 23 कैम्प की स्थापना की गई। 14 बीजापुर जिले में और 9 दंतेवाड़ा जिला में। गंगालुर कैम्प में 600 सलमा जुडूम के समर्थक रहते थे। अब 300 लोग ही इस कैम्प में रहते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे नक्सल प्रभावित इलाकों में तकरीबन डेढ़ लाख सलवा जुडूम समर्थक अपने घर-गाँव छोड़कर कैम्प में रहने के लिए आये थेे, जो आज घटकर बीजापुर में 8000 रह गये हैं और दंतेवाड़ा में 35000।

एक समय में चर्चित रहा नारा "सलवा जुडूम जिंदाबाद, नक्सल भगाओ बस्तर बचाओ" आज कहीं अंधेरे के गर्त में खो गया है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अब शुरुआती दौर का धधकता आग ठंडा हो चुका है।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+