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भारत में न्याय पाने का सफर आसान नहीं

Supreme Court
ठीक ही कहा गया कि न्याय मिलने में अगर देरी होती है तो वह न्याय नहीं मिलने के समान है। स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान स्वस्थ न्यायपालिका को माना जाता है, लेकिन हमारे देश की न्याय व्यवस्था इतनी लचर है कि दो-तीन पीढ़ियाँ गुजर जाती हैं, फिर भी उन्हें न्याय नहीं मिल पाता है। कायदे से बदतर हालत की जिम्मेदारी लेकर सरकार को शर्म से चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए, पर "चलता है" वाली मानसिकता उनपर पर हावी है। सरकार के सारे कल-पुर्जे बस खीसें निपोरने में ही मशगूल हैं।

हमारी लापरवाही और उदासीनता का ही नतीजा है कि आज की तारीख में सर्वोच्च न्यायलय में सैतालीस हजार याचिकाएं लंबित हैं। उच्च न्यायलय भी इस बीमारी से अछूता नहीं है। वहाँ भी तीस लाख सत्तर हजार केस लंबित है। उसपर तुर्रा यह है कि इनमें से पाँच लाख तीस हजार याचिकाएँ तो दस सालों से लंबित हैं। निचली अदालतों में तो स्थिति और भी बेकाबू है। वहाँ तो लंबित मामलों की संख्या करोड़ों में है।

बजट का मौसम आया और चला भी गया, किंतु सरकार ने इस बार भी इस समस्या पर कोई खास तवज्जो नहीं दिया। जबकि जरुरत इस बात की थी कि न्याय देने की गति में इजाफा लाने के लिए सरकार द्वारा विशेष प्रयास किया जाता।

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दरअसल कानूनी प्रक्रिया और कानून में बदलते परिवेष के अनुसार सुधार लाने की भी जरुरत थी। पुलिस कानून में परिवर्तन लाकर भी इस दिशा में बदलाव लाये जा सकते थे। सुधार कार्यक्रम को एक मुहिम की तरह चलाने के लिए सरकार द्वारा आगाज की आवश्‍यकता थी। यदि कानून के क्षेत्र में आधारभूत ढांचा को मजबूती प्रदान किया जाता है तो हालात अब भी बदल सकते हैं।

सभी को बिना किसी देरी के बदस्तुर न्याय मिलता रहे इसके लिए आज बीस हजार नई अदालतों की गठन की आवश्‍यकता है और इन अदालतों में काम करने के लिए साठ हजार न्यायधीशों की भी जरुरत है। यह तभी संभव हो पायेगा जब सरकार इस कार्य को पूरा करने के लिए अस्सी हजार करोड़ रुपये व्यय करने के लिए तैयार हो जाएगी। फिर उसके बाद हर साल एक लाख साठ हजार करोड़ रुपयों की जरुरत भी सरकार को न्यायलयनीय कारवाईयों को पूरा करने के लिए होगी।

हालांकि 13 वें वित्त आयोग ने 5000 करोड़ रुपयों का आवंटन देष के विविध राज्यों में चल रहे अदालतों में सालों से लंबित मामलों के तत्काल निष्‍पादन किया है, जोकि 2010 से 2015 के दरम्यान खर्च होना है। इस राषि का इस्तेमाल सुबह और शाम चलने वाली अदालतों के अलावा स्पेषल अदालतों में चल रहे लंबित केसों के निपटारे के लिए किया जाना है। एक अनुमान के अनुसार इस राषि से 113 मिलियन लंबित केसों का निपटारा 5 सालों के दौरान किया जा सकेगा।

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इसके अलावा वैकल्पिक समस्या के समाधान के लिए 600 करोड़ रुपया दिया गया है। 100 करोड़ रुपयों का आवंटन लोक अदालतों के लिए किया गया है। 150 करोड़ रुपया वकीलों और विभिन्न न्यायलयों में काम करने वाले अधिकारियों को मुहैया करवाया गया है। 200 करोड़ रुपया कानूनी सहायता के लिए उपलब्ध करवाया गया है। 250 करोड़ रुपया न्यायधीषों के प्रषिक्षण पर खर्च किया जाएगा। 300 करोड़ रुपये जूडिशयल अकादमी को दिये जायेंगे। 150 करोड़ रुपये पीपीओ को प्रशिक्षित करने में खर्च किये जायेंगे। 300 करोड़ रुपये अदालतों के प्रबंधको को दिया जाएगा, ताकि अदालती कारवाई सुचारु रुप से चलता रहे। 450 करोड़ रुपयों का प्रावधान अदालतों के रख-रखाव के लिए किया गया है।

पहले भी 11 वें वित्त आयोग ने 1734 फास्ट ट्रेक अदालतों में चल रहे लंबित मामलों के निष्पादन लिए वित्त पोषण किया था, पर पूरी राषि इन अदालतों को मुहैया ही नहीं करवाया गया और जो करवाया गया उसका भी उपयोग इन अदालतों द्वारा नहीं किया जा सका।

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लेखक परिचय-
श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से हिन्दी पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह से 09650182778 के जरिये संपर्क किया जा सकता है।

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