Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

न्‍यायपालिका के लिए कुछ सुझाव

Supreme Court of India
अप्रैल 2007 में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने मुख्यमंत्री और उच्च न्यायलयों के न्यायधीशों को संबोधित करते हुए कहा था कि 11 वें वित्त आयोग द्वारा उपलब्ध करवायी गई राषि से फास्ट ट्रेक अदालतों ने 2000 से 2005 के दरम्यान आठ लाख लंबित याचिकाओं का निपटारा किया है। जबकि नियमानुसार उपलब्ध संसाधनों से उन्हें प्रतिवर्ष पाँच लाख केसों का निपटारा करना चाहिए था। लोक अदालत तकरीबन 10 लाख केसों का निष्पादन प्रत्येक साल करता है, पर लंबित मामलों की तुलना में निष्पादन की यह गति निःसंदेह नाकाफी है।

क्लिक करें: मुख्‍य लेख- भारत में न्याय पाने का सफर आसान नहीं

13 वें वित्त आयोग का लक्ष्य तो है देश के अदालतों में चल रहे लंबित मामलों को 2012 तक समाप्त करने का, लेकिन लगता नहीं है वत्र्तमान प्रावधानों और उपलब्ध संसाधनों से लंबित मामलों का निपटारा आने वाले आगामी 15 सालों में भी हो पायेगा। सच कहा जाए तो वित्त आयोग के प्रयास स्थिति को संभालने के लिए प्रर्याप्त नहीं है। वित्त आयोग मदद तो कर सकता है, किंतु आमूल-चूल परिवर्तन लाने के लिए योजना आयोग और सरकार के अलावा खुद निवर्तमान अदालतों की तरफ से भी दो कदम आगे आने की आवश्‍यकता है, तभी सभी को समय से न्याय मिल पायेगा। वैसे इस प्रक्रिया में निम्नवत् उपाय भी मुफीद हो सकते हैं-

कुछ सुझाव

1. लंबित केसों की लिस्ट निचली से लेकर सर्वोच्च अदालत तक बनानी होगी और एक निष्चित समय पर उनकी समीक्षा भी करनी होगी, ताकि समयावधि के अंदर उनका निपटारा हो सके।
2. राष्ट्रीय विवाद नीति भी बनाने की जरुरत है। इससे राजस्व और आपराधिक विवादों में फर्क स्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होगा। इसके लिए निष्चित अदालतों को भी रेखांकित किया जाना चाहिए।
3. राष्ट्रीय स्तर पर जूडिशियल सेवा की स्थापना की जाए।
4. वर्तमान न्यायधीशों के संख्याबल में 25 से 50 फीसदी तक इजाफा किया जाना चाहिए।
5. संविदा पर न्यायधीशों की नियुक्ति की जाए।
6. अवकाष प्राप्त न्यायधीशों की सेवा ली जाए।
7. न्यायधीशों की नियुक्ति में तेजी लाया जाए।
8. उच्च न्यायलयों के न्यायधीषों की सेवानिवृति की आयु को बढ़ाया जाए।
9. लंबित मामलों का प्रबंधन कुषल प्रबंधकों के हाथों में सौंपा जाए।
10. न्यायधीष की क्षमता तय की जाए। एक न्यायधीश एक दिन में कितने केसों का निष्पादन कर सकता है, यह सुनिश्चित किया जाए।

यह भी तय करने की जरुरत है कि न्यायधीष और जनसंख्या का अनुपात क्या है ? इस कार्य को करने से हमें किस हद तक सुधार लाने की जरुरत होगी, इसका पता चल सकेगा। साथ ही इससे किस तरह के आधारभूत संरचना की जरुरत न्यायपालिका को है, इसका भी हमें अंदाजा मिल जाएगा। बीमारी की पहचान के बाद ही सही ईलाज की तरफ हम अपने कदम को बढ़ा सकते हैं।

न्याय के मंदिर पर जितना भरोसा आम आदमी का बढ़ेगा केसों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ेगी और फिर उनके समाधान के लिए करोड़ों-अरबों रुपयों और कुषल प्रबंधन की जरुरत होगी। आर्थिक बदहाली और संसाधनों के संक्रमण के दौर में न्याय के कार्य को विकेन्द्रित करके लंबित मामलों में कुछ हद तक कमी लाई जा सकती है। इस दिषा में लोक अदालत, महिला अदालत, मोबाईल अदालत और फास्ट ट्रेक अदालत फायदेमंद हो सकते हैं।

लेखक परिचय-
श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से हिन्दी पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह से 09650182778 के जरिये संपर्क किया जा सकता है।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+