बिना काम किए भी हर महीने मिलती है सैलरी, किस कंपनी में मिलती है 2 साल की पेड Sick Leave? जानिए पूरा मामला
Sick Leave: सोचिए आपको ऑफिस ना जाने के बाद भी सालों तक सैलरी मिलती रहे! जी हां, ऐसा संभव है एक ऐसे देश में जहां कर्मचारियों के स्वास्थ्य को बहुत ज्यादा तवज्जो दी जाती है। अगर कोई बीमार है और 2 साल तक भी काम नहीं कर सकता तब भी हर महीने उसकी सैलरी खाते में आती रहती है!
यह सपना नहीं, बल्कि यूरोप के एक विकसित देश नीदरलैंड की हकीकत है। भारत जैसे देशों में जहां एक दिन की छुट्टी के लिए मैनेजर को समझाना भी मुश्किल हो जाता है, वहीं नीदरलैंड जैसे देश में कर्मचारी दो साल तक छुट्टी पर रह सकते हैं और उन्हें नियमित वेतन भी मिलता है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर इस स्कीम को लेकर जबरदस्त चर्चा हो रही है।

फेसबुक, लिंक्डइन और इंस्टाग्राम पर इस सिस्टम की जमकर तारीफ हो रही है। कुछ लोग इसे कर्मचारियों के लिए सबसे बड़ी सौगात बता रहे हैं, तो कुछ इसे कंपनियों पर बोझ मान रहे हैं। लेकिन इस स्कीम को जानने के बाद यह जरूर कहा जा सकता है कि नीदरलैंड अपने कर्मचारियों की सेहत और आर्थिक सुरक्षा को लेकर बेहद संवेदनशील है। अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या भारत जैसे देशों में ऐसा सिस्टम लागू हो सकता है?
ये भी पढ़ें: HSSC CET 2025: 50 हजार से अधिक पदों पर भर्ती के लिए आवेदन शुरू, कैसे करें CET के लिए अप्लाई, देखें स्टेप्स
बीमार कर्मचारियों के लिए खास स्कीम
नीदरलैंड में कर्मचारियों को 'सिक पे स्कीम' के तहत फायदा मिलता है। अगर कोई कर्मचारी बीमार हो जाता है और वह काम पर नहीं आ पाता, तो उसे दो साल तक कम से कम 70% वेतन मिलता है। पहले साल में यह रकम न्यूनतम वेतन से कम नहीं हो सकती। कुछ कंपनियां तो पहले साल में पूरी सैलरी देती हैं। यह व्यवस्था वहां के डच लेबर लॉ का हिस्सा है।
किसे मिलता है इस स्कीम का फायदा?
यह सुविधा नीदरलैंड में काम करने वाले सभी कर्मचारियों को मिलती है, चाहे वे परमानेंट हों या टेम्पररी। अगर किसी की नौकरी बीमारी के दौरान खत्म हो जाती है, तब भी वे सरकारी एजेंसी (UWV) से 'सिकनेस बेनिफिट' ले सकते हैं। प्रेगनेंसी, ऑर्गन डोनेशन या चाइल्डबर्थ जैसी खास परिस्थितियों में कर्मचारी को 100% सैलरी भी मिलती है।
स्कीम का फायदा लेने के लिए जरूरी हैं ये बातें
इस योजना का लाभ उठाने के लिए कर्मचारियों को कुछ शर्तें माननी होती हैं। जैसे- बीमारी की सूचना पहले दिन ही कंपनी को देनी होती है। इसके बाद कंपनी मेडिकल चेकअप करवाती है। कर्मचारी को ठीक होने की प्रक्रिया में सहयोग करना होता है। अगर वो ऐसा नहीं करता है, तो कंपनी उसकी सैलरी रोक सकती है।
दो साल बाद क्या होता है?
अगर कर्मचारी दो साल बाद भी काम पर लौटने की स्थिति में नहीं होता है, तो कंपनी की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। इसके बाद कर्मचारी 'डिसएबिलिटी बेनिफिट' के लिए अप्लाई कर सकता है। हालांकि अगर सरकारी एजेंसी को लगता है कि कंपनी ने कर्मचारी की वापसी के लिए प्रयास नहीं किए, तो कंपनी को सैलरी देने की अवधि बढ़ानी पड़ सकती है।
भारत में क्या है सिस्टम?
भारत में सरकारी कर्मचारियों को मेडिकल लीव तो मिलती है, लेकिन प्राइवेट सेक्टर में यह कंपनी की नीति पर निर्भर करता है। कई जगह लंबी बीमारी में वेतन रोक दिया जाता है। नीदरलैंड जैसी स्कीम भारत में लागू करने के लिए मजबूत लेबर लॉ और कड़ी निगरानी की जरूरत होगी।
एक संतुलित और सहायक स्कीम
नीदरलैंड की यह स्कीम कर्मचारियों को मानसिक और आर्थिक राहत देती है। हालांकि कुछ लोग इसके दुरुपयोग की आशंका भी जताते हैं। फिर भी यह दिखाता है कि अगर नीति सही हो, तो कर्मचारी बिना तनाव के सेहत पर ध्यान दे सकते हैं। भारत जैसे देशों को इस तरह की योजनाओं से प्रेरणा लेकर कर्मचारियों के लिए बेहतर वातावरण तैयार करना चाहिए।
ये भी पढ़ें: IAS की नौकरी छोड़कर बनीं सांसद, पति भी है प्रशासनिक अधिकारी, खूबसूरत है प्रेम कहानी












Click it and Unblock the Notifications