जन्मकुंडली में छुपे हैं विदेश यात्राओं के रहस्य, शनि-राहु करवाते हैं विदेश भ्रमण
नई दिल्ली, 21 जून। अनेक लोग विदेश घूमने का सपना देखते हैं लेकिन सभी की यह कामना पूरी नहीं हो पाती है। अनेक लोग मात्र सोचते ही रह जाते हैं और पूरा जीवन निकल जाता है, जबकिअनेक जातक सैकड़ों-हजारों बार विदेश यात्राएं कर लेते हैं। ऐसा क्यों होता है? विदेश यात्राओं का रहस्य मनुष्य की जन्मकुंडली में छुपा है। वैदिक ज्योतिष में शनि और राहु को विदेश यात्राओं का कारक ग्रह कहा गया है। इसके अलावा कुंडली के ज्यादातर ग्रहों का चर राशियों में होना भी विदेश यात्राओं का सूचक है।

जन्मकुंडली में तीसरा भाव छोटी यात्राएं दर्शाता हैं, सातवां भाव यात्राएं और नवम भाव से विदेश यात्राओं की सूचना मिलती है। बारहवां भाव वातावरण में पूर्ण परिवर्तन दर्शाता है इसलिए यह विदेश यात्राओं या विदेश निवास से संबंधित होता है।
जन्मकुंडली में विदेश यात्राओं के योग
- सूर्य लग्न में हो
- बुध आठवें भाव में हो
- शनि बारहवें भाव में हो
- दशमेश और दशमेश का नवांशश दोनों ही चर राशियों में हों
- लग्नेश सातवें भाव में चर राशि में हो
- सप्तमेश नवे भाव में हो
- चंद्र 11वें या 12वें भाव में हो
- शुक्र आठवें, छठे या सातवें भाव में हो
- दशम भाव और दशमेश चर राशि में हो
- कब बनता है विदेश यात्रा का संभावित समय
- उच्च के सूर्य, चंद्र, मंगल या बृहस्पति की महादशा
- सूर्य की महादशा में
- मंगल की दशा में यदि वह बली होकर लग्न में बैठा है या सूर्य से संबंधित है
- नीच के बुध की महादशा में
- बृहस्पति की दशा में यदि वह सातवें या 12वें भाव में चर राशि में है
- शुक्र की दशा में यदि वह सातवें में बैठा है या एक पाप ग्रह से संबंधित है
- सूर्य की महादशा में केतु की अंतर्दशा में
- केतु की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा में
- केतु की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा में यदि चंद्र केतु से केंद्र-त्रिकोण या 11वें भाव में हो
- राहु की दशा में सूर्य की अंतर्दशा
- शनि की दशा में केतु की अंतर्दशा में












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