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Rajyoga in a kundali: जानिए कैसे बनता है मेष लग्न का राजयोग

लखनऊ। मेष लग्न एक चर लग्न है, जिसका स्वामी मंगल है। अग्नितत्व प्रधान राशि मेष बहुत ही ऊर्जावान होती है। इस लग्न में जन्में जातक साहसी होते है व निर्णय लेने में तत्पर होते है। आपको अतिशीघ्र क्रोध आता है। यहां तक मरने-मारने तक पर आप उतारू हो जाते है लेकिन आपके भीतर दया की भावाना भी मौजूद रहती है। इस लग्न में बृहस्पति को शुभ माना जाता है क्योंकि इसकी मूल त्रिकोण राशि धनु नवम भाव में में स्थित होती है और नवम भाव आपका भाग्य भाव होता है और सबसे बली त्रिकोण भी है। सूर्य भी इस लग्न के लिए शुभ कारक है। क्योंकि सिंह राशि पंचम भाव में स्थित होती है और एक शुभ त्रिकोण होता है।

चलिए जानते है इस लग्न की कुण्डली में बनने वाले राजयोग कैसे बनते है...

मेष लग्न का राजयोग

मेष लग्न का राजयोग

  • मेष लग्न में जिसका जन्म हुआ हो और सूर्य लग्न में उच्च का गुरू कर्क में चतुर्थ भाव में बैठा हो, उच्च का मंगल मकर दशम स्थान में हो तो या सूर्य-गुरू के उच्च होने पर तुला का शनि सप्तम में हो तो जातक राजा के समान सुख भोगता है।
  • सूर्य, मंगल, शनि तीनों ग्रह उच्च के हो तो भी राजयोग बनता है। ऐसा जातक प्रशासन में उच्च पद प्राप्त करता है।
  • सूर्य, मंगल, शनि, गुरू ये चारों ग्रह अगर उच्च के होकर बैठे है तो भी व्यक्ति की कुण्डली में राजयोग का निर्माण होता है।
  • मेष लग्न की कुण्डली में सूर्य व गुरू ग्रह उच्च के हो और चन्द्रमा स्वग्रही होकर साथ हो या सूर्य-शनि उच्च के हो चन्द्रमा स्वग्रही होकर बैठा हो तो जातक मन्त्री आदि पद प्राप्तकर राजयोग भोगता है।
मंगल उच्च का दशम हो तब.....

मंगल उच्च का दशम हो तब.....

  • सूर्य उच्च का, चन्द्रमा स्वग्रही हो, शुक्र स्वग्रही सूर्य-बुध के साथ मंगल उच्च का दशम हो या मंगल उच्च नीच का सूर्य बुध के साथ, कर्क का शनि हो तो भी कुण्डली में राजयोग बनता है। ऐसा जातक राजनीति में उच्च पद प्राप्त कर राज्य की सेवा करता है।
  • मेष लग्न कुण्डली में गुरू भाग्य स्थान में, सूर्य-बुध सप्तम, मंगल रिपु भाव में हो या सूर्य, बुध, शुक्र सप्तम में गुरू भाग्य भाव में हो तो, या सूर्य-शुक्र सप्तम में मंगल दशम में, शनि चतुर्थ में हो तो व्यक्ति राजा के समान जीवन व्यतीत करता है।
  • सूर्य-शुक्र सप्तम में, शनि एकादश में और गुरू पंचम स्थान में हो या सूर्य, बुध, शुक्र सप्तम में, शनि चतुर्थ में हो या सूर्य-बुध सप्तम में, शनि एकादश में, गुरू पंचम में, हो तो जातक की कुण्डली में राजयोग का निर्माण होता है। ऐसा व्यक्ति उच्च पद प्राप्त कर सुखी जीवन व्यतीत करता है।
  • पद-प्रतिष्ठा मिलती है

    पद-प्रतिष्ठा मिलती है

    • मेष का मंगल लग्न में, उच्च का बृहस्पति चतुर्थ में हो या शुक्र-बुध सप्तम में, शनि एकादश में, गुरू पंचम में हो तो कुण्डली में राजयोग का निर्माण होता है। ऐसा जातक उच्च, पद-प्रतिष्ठा से युक्त होकर बेहतर जीवन जीता है।
    • बुध सप्तम में हो, मंगल दशम में, शनि एकादश में, गुरू पंचम में हो या बुध, शुक्र सप्तम में हो या बुध सप्तम में, शनि एकादश में, गुरू पंचम में हो तो या सूर्य, बुध, शुक्र सप्तम में, मंगल दशम में, गुरू पचंम में हो तो जातक की कुण्डली में प्रबल राजयोग बनता है। ऐसा जातक कैबिनेट मिनिस्टर बनकर देश की सेवा करता है।
    • यदि मेष का सूर्य लग्न में, वृष का चन्द्रमा धन भाव में, मिथुन का राहु सप्तम में और कर्क का गुरू चतुर्थ में हो तो मनुष्य सरकारी नौकरी में उच्च पद प्राप्त करता है।
    • यदि उच्च का सूर्य-गुरू के साथ लग्न में हो, वृष का शुक्र दूसरे भाव में, शनि उच्च का तुला में मंगल के साथ सप्तम स्थान में हो और मीन का चन्द्रमा बुध के साथ द्वादश भाव में हो तो मनुष्य भाग्यवान होकर राजा बनता है।

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