Humility is your safety shield: विनम्रता है आपका सुरक्षा कवच

नई दिल्ली। जीवन में कोमलता का क्या महत्व है, यह सभी जानते हैं। कोमलता में सहज आकर्षित करने की क्षमता होती है। कोमल मीठी वाणी को हर व्यक्ति बार बार सुनना चाहता है। कोमल फूलों को हर कोई छूना और सजाना चाहता है। कोमल शिशुओं को हर कोई दुलारना चाहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि कोमलता चाहे किसी भी रूप में हो, वह सबके मन को भाती है, इसके साथ ही कोमलता का एक गुण और है, वह यह है कि कोमलता हमारी रक्षा भी करती है। जिस व्यक्ति का व्यवहार कोमल या मीठा होता है, उसके साथ प्रायः दुर्व्यवहार नहीं होता।यदि कोई उसके साथ बुरा व्यवहार कर भी बैठता है, तो वह स्वयं ग्लानि से भर उठता है। इसके ठीक विपरीत कठोर व्यवहार वाले व्यक्ति से सामने वाला भी अकड़कर बात करता है। कोमल पुष्पों को कोई मसलकर नहीं फेंकता, पर कांटों को कभी गुलदस्ता नसीब नहीं होता। नन्हें शिशु पर हमला करने जा रहे हत्यारे का हाथ भी कांप उठता है। कोई निर्दयी व्यक्ति ही कोमलता का उत्तर कठोरता से दे सकता है, बाकी संपूर्ण सामान्य लोक कोमलता को हाथो हाथ लेता है।

कोमलता किस प्रकार हमारी रक्षा करती है, इसका एक बहुत प्यारा, हास्यपरक प्रसंग आज सुनते हैं..

जीवन में कोमलता का क्या महत्व है...

जीवन में कोमलता का क्या महत्व है...

यूनान में एक प्रसिद्ध विचारक हुए हैं- सुकरात। पाश्चात्य दर्शन जगत के जाने माने विद्वान सुकरात स्वभाव से बहुत ही विनम्र थे। अहंकार उन्हें छू भी नहीं पाया था। उनके पास बड़ी संख्या में शिष्य शिक्षा लेने आते थे और सुकरात उनसे मित्रवत व्यवहार करते थे। वे हंसी मजाक में ही जीवन के गहन ज्ञान का परिचय अपने शिष्यों को करवाया करते थे। जीवन के अंतिम दिनों में एक बार सुकरात ने अपने शिष्यों को बुलाया और बोले कि एक सामान्य मनुष्य के मुंह में 32 दांत होते हैं। जरा देखना, मेरे 32 दांत सही सलामत बचे हैं या नहीं। उनकी बात सुनकर और उनका पोपला मुंह देखकर शिष्य हंसने लगे और बोले कि आपके सब दांत इस उम्र में कैसे बचे रहेंगे? आपके अधिकतर दांत टूट चुके हैं, केवल कुछ ही दांत शेष हैं। उनकी बात सुनकर सुकरात बोले, अच्छा, ऐसी बात है। तो बच्चों, मेरे मुंह में तो एक जीभ भी हुआ करती थी। देखना तो, वह शेष है या वह भी टूट गई? उनकी बात सुनकर शिष्य फिर हंसने लगे और बोले कि जीभ भी कभी टूटती है? वह तो हमेशा बनी रहती है।

...जीभ तो दांतों से पहले आई थी...

...जीभ तो दांतों से पहले आई थी...

अब सुकरात ने पूछा कि जीभ तो दांतों से पहले आई थी, फिर भी वह अभी तक है और जीवित रहने तक इस शरीर के साथ ही रहती है, फिर दांत क्यों टूट गए? शिष्य उनकी बात सुनकर सोच में पड़ गए तब सुकरात बोले कि देखो बच्चों, जीभ लचीली थी, विनम्र थी, इसीलिए हर कष्ट झेल कर भी अब तक बची हुई है। दांत कठोर थे, वो सबसे लड़ते थे, सबको काटते थे, सबको चबाते थे, इसीलिए वे टूट गए। यही हमारे दैनिक जीवन में होता है। विनम्र व्यक्ति हर कष्ट का सामना सह कर, शांति से करता है और हर तरह के व्यक्ति के मन में अपना एक कोमल स्थान बना लेता है। इसके विपरीत कठोर व्यवहार करने वाले व्यक्ति को एक दिन टूटना ही पड़ता है।

 संसार में लंबा टिकना है, तो जीभ की तरह कोमल बनो...

संसार में लंबा टिकना है, तो जीभ की तरह कोमल बनो...

इस तरह खेल खेल में सुकरात ने अपने शिष्यों को जीवन का एक गहन ज्ञान दे दिया। उन्होंने बता दिया कि संसार में लंबा टिकना है, तो जीभ की तरह कोमल बनो, जो 32 दांतों के बीच रहते हुए भी जीवन पर्यंत अपनी रक्षा करती है और दांतों से अधिक जीवन पाती है।

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