Depression: परमात्मा पर विश्वास बचाता है अवसाद से

नई दिल्ली। भारतीय दर्शन आत्मा को आनंद और उत्थान के मार्ग पर प्रवृत्त करने का मार्ग दिखाता है। माना जाता है कि मनुष्य को दुख से निवृत्ति दिलाने के लिए ही भारतीय दर्शन का प्रादुर्भाव हुआ। यह तथ्य सर्वविदित है कि शोक में डूबा व्यक्ति जीवन के आनंद से वंचित हो जाता है। यही शोक जब अंतर्मन की गहराइयों में उतर जाता है, तब व्यक्ति अवसाद अर्थार्त िडप्रेशन में चला जाता है। डिप्रेशन या अवसाद आज के युग की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। चूंकि यह मन से जुड़ी समस्या अर्थात मानसिक बीमारी है, इसलिए इसे पहचानना भी आसान नहीं है क्योंकि मन के असल भावों को छुपाना आसान होता है। ऐसी स्थिति में अवसाद में डूबा हुआ व्यक्ति स्वयं अपना ही शत्रु हो जाता है और अंततः आत्महत्या जैसा कदम भी उठा सकता है। मनुष्य रूप में मिले अमूल्य जीवन को इस तरह निरर्थक अंत से बचाने के लिए ही भारतीय दर्शन परमसत्ता की अवधारणा प्रस्तुत करता है। ऐसा माना जाता है कि परमपिता पर पूर्ण विश्वास रखने वाला व्यक्ति कभी भी निराशा या अवसाद का शिकार नहीं हो सकता है।

परमसत्ता की अवधारणा क्या है?

परमसत्ता की अवधारणा क्या है?

अब स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि यह परमसत्ता की अवधारणा क्या है? परमसत्ता की अवधारणा उसी आदिशक्ति का मूल रूप है, जिसे विश्व ने ईश्वर, अल्लाह, जीसस या वाहे गुरू का नाम दिया है। अर्थात आप किस धर्म को मानते हैं, यह बात कोई मायने नहीं रखती। यह तथ्य भी मायने नहीं रखता कि आप ईश्वर के किस रूप, पूजा की किस पद्धति को मानते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि आपके मन में यह विश्वास हो कि एक पारलौकिक शक्ति है, जो हमारे हर पल, हर कार्य, हर विचार पर नजर रख रही है। यह पारलौकिक शक्ति हमारे कल्याण के लिए ही कार्य कर रही है। हमारे हिस्से का काम सिर्फ इतना है कि हम उस आदिशक्ति के सम्मुख नतमस्तक हो जाएं और पूरी ईमानदारी से अपना कार्य करते हुए अपनी जिम्मेदारी उसे सौंप कर निश्ंिचत हो जाएं। इसी संदर्भ में आज एक कथा सुनते हैं।

देवी मां का स्मरण

किसी नगर में एक महिला रहती थी, जो देवी मां की अनन्य भक्त थी। अपने हर अच्छे बुरे कर्म, स्थिति में वह देवी मां का स्मरण बनाए रखती थी और पूरे विश्वास से कहती थी कि वह जो भी कर रही है, उसकी माता देख रही हैं। जीवन में जो भी स्थिति बनती, वह कभी निराश नहीं होती थी। उसका परम विश्वास था कि जब मैं देवी मां के संरक्षण में हूं, तो मुझे किसी भी बात की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मुझे ईमानदारी से अपना कार्य करना है, बाकी देवी मां देख लेंगी। उसका जीवन हर तरह से सुख संतोष से परिपूर्ण था। उसकी पड़ोसिनें कहा करती थीं कि तुम पर माता की अटूट कृपा है। तुमने कभी दुख देखा ही नहीं है। तुम्हारे जीवन में जिस दिन दुखों का आगमन होगा, तब देखेंगे कि तुम्हारा विश्वास कितना अटूट रहता है।

महिला के जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा

महिला के जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा

समय अपनी गति से बढ़ता रहा और एक समय ऐसा आया कि वास्तव में उस महिला के जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पहले उसका पति गलत संगत में पड़ गया, इसके साथ ही घर की आर्थिक स्थिति भी डांवाडोल हो गई। हालत यहां तक पहुच गई कि उसे दूसरों के घर खाना बनाने का काम करना पड़ा। इस सबके बावजूद उसे किसी ने कभी रोते, निराश होते नहीं देखा। उसकी सहेलियां पूछतीं कि क्या अब भी तुम्हें विश्वास है कि देवी मां तुम्हें बचा लेंगी। इस पर वह हंसकर कहती कि जीवन में जो कुछ भी होता है, वह अपने ही कर्मों का फल होता है। जीवन में सुख हो या दुख, मेरी मातारानी हर पल मुझपर कृपा बनाए रखती हैं। मुझे कभी यह चिंता होती ही नहीं कि आगे क्या होगा क्योंकि मेरी चिंता करने के लिए मेरी मां हर समय तत्पर रहती हैं।


दुख के बादल छंट गए और ...

चूंकि समय निरंतर परिवर्तनशील है, तो कुछ समय के बाद हर तरफ से धोखा खाने के बाद उस महिला के पति की आंखें खुल गईं और वह सही राह पर आ गया। इसके साथ ही वह वापस अपने सुखी और संपन्न जीवन के लिए सक्रिय हो गया। दुख के बादल छंट गए और जीवन एक बार वापस से सुखी संपन्न हो गया। इस परिवर्तन के बाद भी उस महिला को किसी ने घमंड करते नहीं देखा। अभी भी उसका यही मानना है कि माता आज भी उसका ध्यान रख रही हैं।

अब मैं परमात्मा का हो गया हूं...

अब मैं परमात्मा का हो गया हूं...

अर्थात जब मनुष्य के मन में यह विचार प्रादुर्भूत हो जाता है कि अब मैं परमात्मा का हो गया हूं, तब स्वयं की, परिस्थितियों की चिंता मिट जाती है। मन में यह विश्वास जाग जाता है कि मेरा भला देखने वाला, मेरी चिंता करने वाला वह परमपिता है। मन में इस तरह के विचार, इस तरह का विश्वास पनपते ही मनुष्य स्वयं को अकेला, असहाय समझना छोड़ देता है। इस तरह चिंता से पार पाकर मनुष्य अवसाद के स्तर पर पहुंचता ही नहीं है, जो आज के युग की सबसे बड़ी समस्या है। तो आप भी अपने मन में यह विश्वास जगाइए कि वह परमशक्ति ही हमारी सबसे अभिन्न मित्र और शुभचिंतक है। इस विश्वास के साथ ही आप पाएंगे कि जीवन शांत, संतुलित, चिंतारहित और सुखमय हो गया है।

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