TN Election 2026: तमिलनाडु में BJP एक सीट पर क्यों हुई ढेर? वोट शेयर भी गिरा, क्या भारी पड़ा अन्नामलाई फैक्टर?
TN Election Result 2026: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में कई बड़े उलटफेर किए, लेकिन BJP के 'दक्षिण विजय' के दावों पर पानी फेर दिया है। 2024 लोकसभा चुनाव में जहां बीजेपी ने अकेले दम पर 11.24% वोट शेयर हासिल कर राज्य में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी, वहीं 2026 विधानसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर गिरकर करीब 3% तक सिमट गया।

इतना ही नहीं, 27 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बीजेपी केवल एक सीट जीत सकी। यह गिरावट सिर्फ चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने तमिलनाडु में भाजपा की रणनीति, गठबंधन के फैसलों और अन्नामलाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विस्तार से पढें हार की पूरी इनसाइड स्टोरी
Tamil Nadu BJP Vote Share Drop: 2024 से 2026 तक वोट शेयर क्यों गिरा?
2024 लोकसभा चुनाव बीजेपी के लिए तमिलनाडु में एक मोरल विक्ट्री की तरह देखा गया था। पार्टी ने द्रविड़ दलों DMK और AIADMK से अलग होकर चुनाव लड़ा था और 11% से ज्यादा वोट हासिल किए थे। उस समय बीजेपी ने खुद को राज्य में तीसरी राजनीतिक ताकत के रूप में पेश करने की कोशिश की थी। उस प्रदर्शन के बाद माना जा रहा था कि विधानसभा चुनाव में बीजेपी पहले से ज्यादा आक्रामक तरीके से मैदान में उतरेगी। लेकिन परिणाम इसके बिल्कुल उलट रहे।
2024 की 'प्रगति' का 2026 में 'पतन' होने के पीछे कई प्रमुख कारण रहे:
1. AIADMK के साथ 'मुश्किल' सीटों का समझौता:
इस बार भाजपा, अन्नाद्रमुक (AIADMK) के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा थी। सूत्रों का कहना है कि अन्नाद्रमुक ने भाजपा को वे 27 सीटें दीं, जहां या तो द्रविड़ दलों का गढ़ था या जहां भाजपा की ज़मानत बचाना भी मुश्किल था। खुद के दम पर लड़ने के बजाय गठबंधन में जूनियर पार्टनर बनने से भाजपा का अपना स्वतंत्र वोट बैंक बिखर गया।
2. थलपति विजय की TVK का उदय:
सुपरस्टार विजय की पार्टी तमिलगा वेट्ट्री कजगम (TVK) ने इस चुनाव में 108 सीटें जीतकर और 35% से अधिक वोट शेयर बटोरकर एक 'तीसरा ध्रुव' खड़ा कर दिया और सबसे बड़ा राजनीतिक सरप्राइज दिया। विजय ने युवा वोटरों, पहली बार वोट डालने वाले वर्ग और एंटी-एस्टैब्लिशमेंट को अपने पक्ष में मोड़ लिया। ऐसे वोटर, जो 2024 में बीजेपी की तरफ आकर्षित हुए थे, इस बार TVK की ओर शिफ्ट होते दिखाई दिए। खासकर शहरी और युवा वर्ग में विजय का प्रभाव बीजेपी के लिए चुनौती बन गया।
3. स्थानीय बनाम राष्ट्रीय नैरेटिव रहा हावी:
2024 के चुनाव 'मोदी बनाम राहुल' के राष्ट्रीय नैरेटिव पर थे, जहां भाजपा को फायदा मिला। लेकिन विधानसभा चुनाव 'द्रविड़ अस्मिता', स्थानीय कल्याणकारी योजनाओं और 'तमिल गौरव' पर केंद्रित हो गए, जहां भाजपा का 'हिंदुत्व' कार्ड फिर से विफल रहा।

TN Election में सिर्फ एक सीट पर जीत, BJP के 'पोस्टर बॉय' अपने ही गढ़ में हारे
बीजेपी की ओर से केवल एम. भोजराजन उधगमंडलम सीट जीत पाए। उनकी जीत का अंतर भी महज 976 वोट रहा। यानी पार्टी जिस तरह की राजनीतिक जमीन तैयार करने का दावा कर रही थी, वह चुनावी नतीजों में दिखाई नहीं दी। तमिल मानिला कांग्रेस (मूपनार), जो NDA का हिस्सा थी और बीजेपी के चिन्ह पर पांच सीटों पर चुनाव लड़ी थी, वह भी एक भी सीट नहीं जीत सकी।
भाजपा के लिए सबसे शर्मनाक बात यह रही कि उसके सभी 'पोस्टर बॉय' चुनाव हार गए:
- एल. मुरुगन (केंद्रीय मंत्री): अविनाशी सीट से हार।
- नैनार नागेंद्रन (प्रदेश अध्यक्ष): सात्तूर से हार।
- वानथी श्रीनिवासन (राष्ट्रीय अध्यक्ष, महिला मोर्चा): कोयंबटूर उत्तर से हार।
- तमिलिसाई सुंदरराजन (पूर्व राज्यपाल): मायलापुर से हार।
AIADMK BJP Alliance Impact: AIADMK गठबंधन BJP के लिए फायदा या नुकसान?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी की गिरावट की एक बड़ी वजह AIADMK के साथ उसका गठबंधन भी रहा। 2024 में बीजेपी ने खुद को स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश किया था। लेकिन 2026 में AIADMK के साथ जाने के बाद पार्टी फिर जूनियर पार्टनर की भूमिका में सिमट गई।
बीजेपी नेताओं के भीतर भी यह चर्चा रही कि AIADMK ने पार्टी को ऐसी सीटें दीं जहां जीतना तो दूर, जमानत बचाना भी मुश्किल था। कई सीटों पर बीजेपी के पास न मजबूत संगठन था और न स्थानीय चेहरा। इस वजह से बीजेपी का वोट शेयर भी गठबंधन के भीतर दब गया और पार्टी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने में असफल रही। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विजय की TVK ने उस एंटी-DMK वोट बैंक का बड़ा हिस्सा अपने पक्ष में कर लिया, जिस पर BJP उम्मीद लगा रही थी।
अन्नामलाई का चुनाव न लड़ने से पार्टी पर असर? पूरे चुनाव में स्टार कैंपेनर की कमी
2024 लोकसभा चुनाव के दौरान अन्नामलाई बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे थे। अन्नामलाई को भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच सबसे ऊर्जावान और आक्रामक नेता माना जाता है। उनके चुनाव मैदान में नहीं उतरने से कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर पड़ा। उनकी 'एन मन्न, एन मक्कल यात्रा' ने युवाओं और शहरी वोटरों के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत की थी।
जिस तरह DMK के पास स्टालिन, AIADMK के पास EPS और TVK के पास विजय जैसा बड़ा चेहरा था, लेकिन BJP के पास ऐसा कोई स्टेटलेवल करिश्माई नेता चुनाव में सक्रिय रूप से नजर नहीं आया।
अन्नामलाई ने 2024 में बीजेपी को सिर्फ हिंदुत्व पार्टी की छवि से बाहर निकालकर भ्रष्टाचार विरोधी और आक्रामक विपक्ष के रूप में स्थापित करने की कोशिश की थी। उनकी पारंपरिक तमिल राजनीति से अलग मानी जाती थी। लेकिन विधानसभा चुनाव में उनका मैदान से बाहर रहना पार्टी कैडर और समर्थकों के लिए बड़ा झटका साबित हुआ। बीजेपी के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं बचा जो राज्यव्यापी चुनावी नैरेटिव बना सके।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर अन्नामलाई चुनाव लड़ते या आक्रामक प्रचार करते, तो बीजेपी का वोट शेयर इतना नीचे नहीं जाता। उनकी गैरमौजूदगी से पार्टी का कैडर भी उतना उत्साहित नहीं दिखा जितना 2024 में था।
द्रविड़ राजनीति के बीच फंसी बीजेपी के पास क्या है सबसे बड़ी चुनौती
तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से द्रविड़ दलों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। DMK और AIADMK की मजबूत सामाजिक और क्षेत्रीय पकड़ के बीच बीजेपी अब तक स्थायी जगह नहीं बना पाई है। 2024 में पार्टी ने जिस तेजी से वोट शेयर बढ़ाया था, उससे लगने लगा था कि बीजेपी धीरे-धीरे इस राजनीतिक समीकरण को बदल सकती है।
लेकिन 2026 के नतीजों ने दिखा दिया कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों की राजनीति तमिलनाडु में अलग-अलग तरीके से काम करती है। विधानसभा चुनाव में स्थानीय नेता, जातीय समीकरण, क्षेत्रीय पहचान और द्रविड़ राजनीति अभी भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
अब पार्टी को यह फैसला करना होगा कि वह द्रविड़ दलों के सहारे आगे बढ़ेगी या स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश करेगी। इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या पार्टी भविष्य में फिर अन्नामलाई को केंद्र में रखकर तमिलनाडु की राजनीति में नई शुरुआत करेगी।














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