Suvendu Adhikari Profile: नंदीग्राम के महानायक से बंगाल के मुख्यमंत्री तक! सुवेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफरनामा
Suvendu Adhikari Profile: पश्चिम बंगाल में सालों तक वामपंथ और फिर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के दबदबे वाले इस राज्य में पहली बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बन गई है। इस ऐतिहासिक बदलाव के महानायक कोई और नहीं, बल्कि सुवेंदु अधिकारी हैं। सुवेंदु अधिकारी बंगाल के सीएम बन गए हैं। क्या आप जानते हैं कि तृणमूल कांग्रेस में कभी ममता बनर्जी के सबसे खास सिपहसालार रहे सुवेंदु अधिकारी आखिर कैसे भाजपा के सबसे बड़े चेहरे बन गए? उनके राजनीतिक सफर में कितने उतार-चढ़ाव आए?
सुवेंदु अधिकारी को साल 2020 तक ममता बनर्जी का राइट हैंड माना जाता था। लेकिन पार्टी में ममता के भतीजे और सांसद अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव ने उनको धीरे-धीरे हाशिए पर पहुंचा दिया। इसके बाद सुवेंदु अधिकारी 021 के चुनाव के ठीक पहले भाजपा में आ गए। ऐसे में आइए जानते हैं सुवेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफरनामा, उनके परिवार का इतिहास।

▶️कौन हैं सुवेंदु अधिकारी? (Suvendu Adhikari Profile Family Background)
सुवेंदु अधिकारी का जन्म 15 दिसंबर 1970 को पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले के कारकुली में हुआ था। सुवेंदु को राजनीति विरासत में मिली है। उनके पिता शिशिर अधिकारी बंगाल की राजनीति के बेहद सम्मानित और कद्दावर नेता रहे हैं। शिशिर अधिकारी मनमोहन सिंह की दूसरी यूपीए (UPA) सरकार में ग्रामीण विकास राज्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं और साल 2019 में कांथी लोकसभा सीट से सांसद चुने गए थे। सुवेंदु की माता का नाम गायत्री अधिकारी है।
सुवेंदु अधिकारी शिक्षा: सुवेंदु ने साल 2011 में रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ आर्ट्स (M.A.) की डिग्री हासिल की।
सुवेंदु अधिकारी ने नहीं की शादी: सुवेंदु अधिकारी को व्यक्तिगत जीवन में बेहद सादगी पसंद है। सुवेंदु अधिकारी ने शादी नहीं की है और वे अविवाहित रहे हैं।

▶️सुवेंदु अधिकारी शुरुआती राजनीतिक सफर (Suvendu Adhikari Early Political Career)
छात्र राजनीति से आगाज: सुवेंदु अधिकारी के राजनीतिक जीवन की नींव छात्र जीवन में ही पड़ गई थी, जब वे कांथी के पीके कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रहे थे। साल 1989 में वे कांग्रेस के छात्र संगठन 'छात्र परिषद' के प्रतिनिधि के रूप में चुने गए थे।
भले ही आज सुवेंदु अधिकारी भाजपा के बड़े नेता हैं, लेकिन उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस पार्टी से हुई थी।
- साल 1995: सुवेंदु पहली बार कांथी नगर पालिका में कांग्रेस के टिकट पर पार्षद चुने गए थे।
- साल 1998: जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) बनाई, तो सुवेंदु भी उनके साथ चले गए।
- साल 2006: वे कांथी दक्षिण सीट से विधानसभा का चुनाव जीते और उसी साल कांथी नगर पालिका के अध्यक्ष भी बने।
- नगरपालिका अध्यक्ष: विधायक बनने के बाद उसी साल (2006) उन्हें कांथी नगरपालिका का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।

▶️नंदीग्राम आंदोलन: जब ममता के सबसे बड़े 'सारथी' बने सुवेंदु (Nandigram Movement)
हालांकि उनका करियर 90 के दशक में शुरू हुआ, लेकिन 2007 के नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने उन्हें एक बड़े नेता के रूप में स्थापित किया। साल 2007 में पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने नंदीग्राम में एक विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) स्थापित करने के लिए लगभग 10,000 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करने का फैसला किया। इस फैसले के खिलाफ स्थानीय किसानों में भारी रोष था।
यहीं से सुवेंदु अधिकारी की असली ताकत दुनिया के सामने आई। उन्होंने 'भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी' का गठन किया और नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन की कमान अपने हाथों में ले ली। इस आंदोलन ने न केवल बंगाल की बल्कि देश की राजनीति को हिलाकर रख दिया और इसी आंदोलन की बदौलत ममता बनर्जी बंगाल की सत्ता के केंद्र में स्थापित हुईं।
हालांकि तत्कालीन वामपंथी सरकार की पुलिस (CID) ने सुवेंदु पर माओवादियों को हथियार सप्लाई करने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए थे। नंदीग्राम में उनके ही प्रयासों का नतीजा था कि इलाके के सबसे प्रभावशाली सीपीएम नेता लक्ष्मण सेठ को हार का सामना करना पड़ा।
नंदीग्राम आंदोलन की सफलता के बाद ममता बनर्जी ने सुवेंदु को जंगल महल (पश्चिम मेदिनीपुर, पुरुलिया और बांकुड़ा) का प्रभारी बनाया, जहां उन्होंने टीएमसी के संगठन को बेहद मजबूत किया।

▶️संसद से लेकर राज्य के कैबिनेट मंत्री तक का सफर
सुवेंदु अधिकारी का कद लगातार बढ़ रहा था। साल 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तामलुक सीट से चुनाव लड़ा और माकपा (CPI-M) के कद्दावर नेता लक्ष्मण सेठ को लगभग 1 लाख 73 हजार वोटों के भारी अंतर से हरा दिया। इसके बाद 2014 में भी वे इसी सीट से सांसद चुने गए।
साल 2016 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने उन्हें फिर से नंदीग्राम से मैदान में उतारा, जहां उन्होंने बड़ी जीत दर्ज की। विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और ममता बनर्जी की कैबिनेट में परिवहन मंत्री (2016-2020) के रूप में शपथ ली। इसके बाद साल 2018 में उन्हें सिंचाई और जल संसाधन मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया।
धीरे-धीरे अपनी सांगठनिक कुशलता के कारण वे ममता सरकार में 'नंबर दो' की हैसियत तक पहुंच गए थे और TMC में सत्ता का एक वैकल्पिक केंद्र बन गए।

▶️ममता से दूरी और भाजपा में धमाकेदार एंट्री
साल 2020 आते-आते तृणमूल कांग्रेस के भीतर सुवेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के बीच वर्चस्व की जंग तेज हो गई। सुवेंदु को लगने लगा कि पार्टी में अभिषेक बनर्जी को ममता के उत्तराधिकारी के तौर पर थोपा जा रहा है और उनके जैसे जमीनी नेताओं की अनदेखी की जा रही है।
इसके बाद सुवेंदु ने बगावती रुख अख्तियार कर लिया:
🔹26 नवंबर 2020: उन्होंने हुगली रिवर ब्रिज कमिश्नर (HRBC) के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया।
🔹27 नवंबर 2020: परिवहन मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।
🔹16 दिसंबर 2020: विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा दिया, जिसे विधानसभा अध्यक्ष ने कुछ तकनीकी कारणों से 21 दिसंबर को स्वीकार किया।
🔹17 दिसंबर 2020: उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता भी छोड़ दी।
🔹19 दिसंबर 2020: मेदिनीपुर की एक विशाल जनसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए।
▶️2021 और 2026 की ऐतिहासिक चुनावी जंग
भाजपा में शामिल होने के बाद साल 2021 के विधानसभा चुनाव में सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को सीधे चुनौती दी। उन्होंने अपनी पारंपरिक सीट नंदीग्राम से ममता बनर्जी को 1,956 वोटों के अंतर से हराकर पूरे देश को चौंका दिया था। इस जीत के बाद उन्हें बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी दी गई।
लेकिन असली चमत्कार तो साल 2026 के विधानसभा चुनाव में हुआ। इस बार सुवेंदु अधिकारी ने एक साथ दो सीटों-नंदीग्राम और भवानीपुर (ममता बनर्जी की सीट)-से चुनाव लड़ा और दोनों ही जगहों पर ऐतिहासिक अंतर से जीत हासिल की। भवानीपुर सीट पर उन्होंने निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को 15 हजार से अधिक मतों से शिकस्त दी।
बंगाल के चुनावी इतिहास में लगभग 60 साल बाद ऐसा हुआ है जब किसी व्यक्ति ने दो सीटों पर चुनाव लड़ते हुए एक मौजूदा मुख्यमंत्री को उसके अपने ही गढ़ में हरा दिया हो। इससे पहले साल 1967 में बांग्ला कांग्रेस के अजय मुखर्जी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्र सेन को अरामबाग सीट पर हराया था।















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