Switch To BJP: सुवेंदु-हिमंता समेत 7 और नेता, जो दूसरी पार्टी से BJP में आए और बने CM, अगला कौन?

Suvendu Adhikari West Bengal के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं। उन्होंने कोलकाता के ब्रिगेड परेड मैदान में जनता के सामने शपथ ली। इसी बीच इस बात की चर्चा तेज हो गई कि बीजेपी में दूसरी पार्टी से आने वाले नेताओं के लिए भी क्या उतनी ही जगह है जितनी कि उनके पुराने कार्यकर्ताओं की? दूसरी पार्टी से आने वाले नेता जो सीएम बने उनमें सुवेंदु अधिकारी, हिमंता बिस्वा सरमा या फिर सम्राट चौधरी ही नहीं हैं बल्कि 6 और ऐसे नेता है या रह चुके हैं जिन्होंने अपने करियर का स्विच बीजेपी में किया और सत्ता के सिंहासन तक भी पहुंचे। इस लिस्ट में अर्जुन मुंडा, बसवराज बोम्मई, पेमा खांडू, सर्वानंद सोनोवाल, हिमंता बिस्व सरमा और सम्राट चौधरी जैसे कई बड़े नाम जुड़ चुके हैं। एक-एक कर सबके बारे में जानते हैं

पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी इस राजनीतिक पैटर्न का सबसे ताजा उदाहरण बन गए हैं। वह कभी ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाते थे, लेकिन आज वही बीजेपी के सबसे बड़े चेहरों में गिने जाते हैं। शुभेंदु अधिकारी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस पार्टी से की थी। लेकिन साल 1998 में उन्होंने ममता बनर्जी के साथ तृणमूल कांग्रेस (TMC) जॉइन कर ली। धीरे-धीरे वह ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में शामिल हो गए। फिर साल 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी ने 34 साल पुरानी वाममोर्चा सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था।

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कांग्रेस से टीएमसी, टीएमसी से बने बीजेपी के अधिकारी

उस जीत में शुभेंदु अधिकारी की भूमिका बेहद अहम मानी गई थी। लेकिन साल 2020 आते-आते शुभेंदु अधिकारी और टीएमसी नेतृत्व के बीच मतभेद बढ़ने लगे। पहले उन्होंने मंत्री पद छोड़ा और फिर विधायक पद से भी इस्तीफा दे दिया। 19 दिसंबर 2020 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में उन्होंने बीजेपी जॉइन कर ली। इसके बाद 2021 विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम सीट से खुद ममता बनर्जी को हराकर पूरे देश में सुर्खियां बटोरीं और बाकी इतिहास आपके सामने है।

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कांग्रेस बीजेपी में हिमंता का स्विच

असम के मुख्यमंत्री रहे हिमंता बिस्व सरमा कभी कांग्रेस पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे। साल 2001 से वह लगातार कांग्रेस विधायक रहे और तरुण गोगोई सरकार में शिक्षा, स्वास्थ्य और वित्त जैसे अहम मंत्रालय संभाल चुके थे। लेकिन 2014 के बाद कांग्रेस नेतृत्व से उनकी दूरी बढ़ने लगी। आखिरकार अगस्त 2015 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी जॉइन कर ली।बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्होंने पूरे पूर्वोत्तर भारत में पार्टी का विस्तार करने में बड़ी भूमिका निभाई। इसके बाद मई 2021 में बीजेपी ने हिमंता बिस्व सरमा को असम का मुख्यमंत्री बना दिया।

कई पार्टियों का लिया स्वाद फिर बने बीजेपी के सम्राट

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर भी काफी दिलचस्प रहा है। उन्होंने पहली बार राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के टिकट पर विधायक चुनाव जीता था। बाद में वह जनता दल यूनाइटेड (JDU) में शामिल हुए और नीतीश कुमार सरकार में मंत्री भी रहे। करीब 2018 के आसपास उनका झुकाव बीजेपी की तरफ बढ़ा और उन्होंने भारतीय जनता पार्टी जॉइन कर ली। इसके कुछ समय बाद सम्राट को बिहार बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। फिर उप मुख्यमंत्री और अब मुख्यमंत्री पद तक वे पहुंच गए हैं।

कांग्रेस से बीजेपी और फिर अरुणाचल के सीएम बने पेमा खांडू

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने अपना राजनीतिक डेब्यू कांग्रेस के साथ किया था। साल 2016 में वह कांग्रेस विधायक दल के नेता बने और मुख्यमंत्री पद संभाला। लेकिन उसी साल अरुणाचल प्रदेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ। इसके बाद उन्होंने पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (PPA) का रुख किया। लेकिन बाद में हवा का रुख देखते हुए वे अपने समर्थक विधायकों के साथ वह बीजेपी में शामिल हो गए। तब से लेकर आज तक वह अरुणाचल में बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा बने हुए हैं।

AASU और AGP से राजनीति की शुरुआत

सरबानंद सोनोवाल की राजनीति की शुरुआत ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) से हुई थी। इसके बाद उन्होंने असम गण परिषद (AGP) में भी काम किया। साल 2011 में उन्होंने बीजेपी जॉइन कर ली। 2016 में बीजेपी ने पहली बार असम में सरकार बनाई और पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया।

कांग्रेस बीजेपी में आए और मणिपुर के मणि बने बीरेन सिंह

एन बीरेन सिंह ने भी अपनी राजनीतिक पारी डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशनरी पीपल्स पार्टी से ही शुरू की थी। बाद में वे कांग्रेस के साथ आ गए। साल 2017 में उन्होंने कांग्रेस से बगावत कर बीजेपी जॉइन की। उसी साल बीजेपी ने पहली बार मणिपुर में सरकार बनाई और उन्हें मणिपुर में कांग्रेस का किला धंसकाने का इनाम मिला। बाद में उन्होंने राज्य में बीजेपी संगठन को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई।

JDS टू BJP के बसवराज

बसवराज बोम्मई के पिता एसआर बोम्मई भी कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनका नाम हाल ही में तमिलनाडु के राजनीतिक संकट के दौरान भी चर्चा में रहा था। बसवराज बोम्मई ने साल 2008 में जनता दल (S) छोड़कर बीजेपी जॉइन कर ली। बाद में वह जुलाई 2021 से मई 2023 तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे।

शिबू सोरेन के करीबी से झारखंड के सीएम तक मुंडा

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) से की थी। साल 1995 में वह पहली बार विधायक बने थे। साल 2000 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने बीजेपी जॉइन कर ली। उसी साल झारखंड नया राज्य बना और बाद में वह बीजेपी के मुख्यमंत्री बने।

कांग्रेस से बीजेपी और दोबारा बने सीएम

गेगोंग अपांग पहली बार 1980 में कांग्रेस पार्टी से मुख्यमंत्री बने थे। अटल-आडवाणी के दौर में साल 2003 में उन्होंने बीजेपी की हवा के रुख को भांप लिया पार्टी में शामिल हो गए और फिर एनडीए सरकार के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने अगस्त 2003 में बीजेपी का दामन थामा था और करीब 42 दिनों तक एनडीए सरकार का नेतृत्व किया। अपने करियर में अपांग तकरीबन 22 सालों तक सिंहासन पर हे जिसमें कांग्रेस के साथ उनका बड़ा हिस्सा रहा।

बीजेपी की फ्लाइट उड़ाते-उड़ाते चूके थे पायलट?

इस लिस्ट में एक नाम राजस्थान के कद्दावर नेता सचिन पायलट जुलाई 2020 में 18-19 विधायकों के साथ बागी हो गए थे। कहा गया कि वे ज्योतिरादित्य सिंधिया के कदम से प्रभावित हो गए थे जो उन्हीं की तरह उपेक्षित महसूस कर रहे थे। लेकिन उनके पास सिर्फ 19 विधायक थे जो सरकार गिराने के लिए काफी नहीं थे। हालांकि बाद में सचिन पायलट ने कहा था कि वे कभी बीजेपी के साथ नहीं जाने वाले थे। लेकिन इसे खानापूर्ति वाला बयान भी कहा गया था। अब पायलट कांग्रेस के साथ ही हैं।

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क्या कहती है बीजेपी की नई शतरंज?

इन सभी उदाहरणों को देखें तो साफ दिखाई देता है कि बीजेपी अब सिर्फ अपने पुराने कैडर पर निर्भर नहीं रहना चाहती। पार्टी उन नेताओं को भी तेजी से आगे बढ़ा रही है, जिनका अपने-अपने राज्यों में पहले से मजबूत जनाधार रहा है। यही कारण है कि दूसरी पार्टियों से आए कई नेता आज बीजेपी में सिर्फ शामिल ही नहीं हुए, बल्कि मुख्यमंत्री जैसे बड़े पद तक पहुंच गए। अब ये देखना होगा कि आने वाले चुनावों में भी बीजेपी की यही रणनीति रहती है?

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