जिस जमीन पर पिता ने बमुश्किल कमाए 25 हजार, बेटे ने संभाली कमान तो हुआ मालामाल
खेती-किसानी को चुनौती मानकर हाथ खड़े करने और शहरों की ओर भाग रहे युवाओं के लिए बिहार के किसान सुधांशु, सफलता की मिसाल हैं। समस्तीपुर के किसान सुधांशु साइंटिफिक तरीकों का प्रयोग कर लाखों का मुनाफा कमा रहे हैं।
समस्तीपुर, 09 मई : खेती किसानी से दूर होती जा रही पीढ़ी के लिए बिहार के सफल किसान सुधांशु इंस्पायरिंग एग्जाम्पल हैं। उन्होंने बताया कि सालाना 80 लाख तक का टर्नओवर हो रहा है। लैपटॉप, स्मार्टफोन और इंटरनेट के प्रयोग से अत्याधुनिक खेती कर रहे सुधांशु बताते हैं कि मुनाफा कमाने के लिए पारंपरिक खेती को हॉर्टिकल्चर में बदलना पड़ेगा। उन्होंने अगली पीढ़ी तक कृषि जारी रखने के सवाल पर कहा कि उनका बेटा अमेरिका में है। वे अपने गांव में ऐसी सुविधा विकसित करना चाहते हैं कि उसे अमेरिका और समस्तीपुर में किसी फर्क या कमी का एहसास न हो।

एक साल में मिला एक्साइटिंग रिजल्ट
सुधांशु बताते हैं कि शुरुआत में पिता नाराज भी हुए। आईएएस बनते देखना चाहते थे पिता, लेकिन हमने परीक्षा छोड़ दी। उन्होंने बताया कि नाराज पिता ने 8-9 बीघा के बगीचे को हमें दिया जो जंगली झाड़ियों से पटा पड़ा था। बाग में पूरी मेहनत से काम करने के बाद एक साल के भीतर उत्साहजनक परिणाम मिला। उन्होंने बकाया कि जिस बाग से 1991 में 25 हजार तक की आमदनी होती थी। पूसा के वैज्ञानिकों की मदद से एक साल के भीतर 1.35 लाख की कमाई हुई। 2020 में 13 लाख की आय हुई। सुधांशु ने कहा कि पारंपरिक तरीकों के साथ थोड़ा सा विज्ञान जोड़कर शानदार आमदनी की जा सकती है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया उद्घाटन
परिवार की ओर से खेती का पेशा चुनने के बारे में सुधांशु ने बताया कि उनके दादा ने 1952 में कैटरपिलर ट्रैक्टर खरीदा, टेक्नोलॉजी से जुड़े थे, लेकिन आमदनी नहीं हो रही थी। इसलिए परिवार के लोग खेती किसानी को चुनौतीपूर्ण मानते हुए हमें दूसरे प्रोफेशन में देखना चाहते थे। साल 2000 में 18 बीघा के बाग से 3.65 लाख की आमदनी हुई। पहले केवल 85 हजार में खरीदना चाहता था व्यापारी। 15 एकड़ के इस बगीचे को 32 लाख रुपये में बेचा। तकनीक में कीमत लगती है, लेकिन सरकार से 80 परसेंट तक सब्सिडी मिलती है। 40 बीघा के खेत में ऑटोमेटिक तकनीक से खेती का इंतजाम। मार्च, 2019 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उद्घाटन किया।
- समस्तीपुर के किसान सुधांशु, दार्जिलिंग से पढ़ाई के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी के हंसराज कॉलेज से डिग्री
- 1988 टाटा टी गार्डन में नौकरी मिली
- 33 साल से कर रहे किसानी, छोटे भाई हिमांशु ने पहले किसानी शुरू की।
डिजिटाइजेशन ऑफ एग्रीकल्चर
18 बीघे में केला, 4 बीघा में अमरूद, शरीफा, बेदाना, मौसमी, बेल, बैर, जामुन, के पौधे लगाए गए हैं। 28 हजार पौधों की सिंचाई के लिए ऑटोमेटिक सिस्टम। वायरलेस सिस्टम से पानी, खाद की सप्लाई। कितना मिनट पानी चलेगा, कितना लीटर चाहिए। सबकुछ मोबाईल और लैपटॉप की मदद से कनेक्ट है। ब्रॉडबैंड की मदद से खेत की निगरानी होती है। फार्म ईआरपी (इलेक्ट्रॉनिक रिसोर्स प्रोग्रामिंग) डिजिटाइजेशन ऑफ एग्रीकल्चर होती है।
गांव के मुखिया भी हैं सुधांशु
अगर किसान को तरक्की करनी है तो मक्का गेहूं छोड़कर हॉर्टिकल्चर अपनाना होगा। पूरी तरह नहीं तो कम से कम एक तिहाई जमीन पर हॉर्टिकल्चर का चुनाव करें। ऐसा करने पर तीन गुना कमाई की जा सकती है। गांव के मुखिया भी हैं। चौथा टर्म है। सरकार का फंड चिह्नित लोगों तक पहुंचना चाहिए।
- माइक्रो इरीगेशन से मिलता है अभूतपूर्व लाभ। कंपलसरी बनना चाहिए। किसान को फायदा मिलता है।
- एग्रोसलाइ (argoslive) से मिलती है वेयर हाउसिंग की फैसिलिटी।
- ड्राई स्टोरेज के लिए 10 रुपये प्रतिमाह, प्रति क्विंटल का किराया।
वेयरहाउस में अनाज भंडारण, भावी पीढ़ी की योजना
सुधांशु के सहयोगियों ने बताया कि वेयहाउस के लिए WDRA guidelines का पालन किया गया है। उन्होंने बताया कि प्लींथ की ऊंचाई (plinth height) से तीन फीट ऊपर बिना सीढ़ी का गोदाम बनाने का परामर्श दिया जाता है क्योंकि चूहा अधिकतम दो फीट उछलता है। ऐसे में मानकों पर आधारित वेयर हाउस में अनाज सुरक्षित होता है। कीटनाशकों के लिए प्रशिक्षित लोग काम करते हैं। फ्यूचर प्लान के संबंध में सुधांशु बताते हैं कि उनके बेटे के लिए वे समस्तीपुर में अमेरिका जैसी सुविधाएं डेवलप करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि किसानी से मुनाफा होने के बाद उन्हें शहरों से बेहतर सुविधा गांव में मिल रही है।
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