क्या राजीव गांधी की तरह नरेन्द्र मोदी को भी चुकानी पड़ेगी किसान आंदोलन की कीमत?

1987 में सरकार की अदूरदर्शिता के कारण एक छोटा सा धरना इतना बड़ा किसान आंदोलन बन गया था जिसने सत्ता की चूलें हिला दी थीं। उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे दिल्ली पहुंच गया था। 1988 में किसानों ने सात दिनों तक दिल्ली को ठप कर दिया था। तात्कालीन कांग्रेस सरकार किसानों की ताकत का अंदाजा नहीं लगा पायी थी। इसकी कीमत उसे चुकानी पड़ी। किसानों की नाराजगी के कारण केन्द्र से राजीव गांधी सरकार और उत्तर प्रदेश से नारायण दत्त तिवारी सरकार की विदाई हो गयी थी। 2020 में भी किसान आंदोलन की आग धधक रही है। क्या राजीव गांधी की तरह नरेन्द्र मोदी को भी किसान आंदोलन की राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है?
Recommended Video

एक छोटा धरना बन गया था बड़ा आंदोलन
सरकार में बैठे लोग और आइएएस का तमगा लिये नौकरशाह कभी-कभी ऐसी गलतियां करते हैं कि एक छोटी सी चिनगारी आग का गोला बन जाती है। 1987 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले की करमूखेड़ी बिजली घर के बाहर किसानों ने अपनी समस्याओं को लेकर एक छोटा सा धरना दिया था। किसान सिंचाई के लिए बिजली का इस्तेमाल करते थे। लेकिन उन्हें समय पर बिजली नहीं मिल पा रही थी। बिजली बिल की गड़बड़ियों को लेकर भी कुछ शिकायतें थी। शुरू में धरना पर कुछ किसान ही बैठे थे। अफसरों ने इस धरने पर ध्यान नहीं दिया। वे तत्काल इन समस्याओं का निराकरण कर सकते थे। लेकिन नहीं किया। इलाके के दूसरे किसान भी इस समस्या से परेशान थे। जब उन्हें इस धरने की जानकारी मिली तो वे भी इसमें शामिल हो गये। मुजफ्फरनगर के सिसौली गांव के महेन्द्र सिंह टिकैत उस समय भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष थे।

किसानों पर गोलीबारी से धधक गया आंदोलन
27 जनवरी 1987 को महेन्द्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों ने करमूखेड़ी बिजली घर को घेर लिया। अब हजारों किसान वहां जमा हो चुके थे। प्रशासन ने वहां से किसानों को हटाने की तीन दिनों तक कोशिश की। लेकिन किसान अपनी मांग पर अड़े रहे। उस समय उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। वीरबहादुर सिंह मुख्यमंत्री थे। इस बीच मुजफ्फरनगर जिला प्रशासन ने एक गलत फैसला ले लिया। उसने किसानों पर गोलियां चलवा दीं। इस गोलीबारी में दो किसान मारे गये। इसके बाद यह किसान आंदोलन आग की तरह धधक गया। महेन्द्र सिंह टिकैत ने शहीद किसानों के अस्थीकलश को गंगा में प्रवाहित करने के लिए एक विशाल यात्रा का आयोजन किया। महेन्द्र सिंह टिकैत जब अस्थिकलश यात्रा लेकर निकले तो उनके पीछे लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा। इसके बाद टिकैत किसानों के मसीहा बन गये।

मेरठ धरना से मिली और ताकत
करमूखेड़ी में दो किसानों के मारे जाने के बाद महेन्द्र सिंह टिकैत ने किसान आंदोलन को आगे बढ़ाया। अप्रैल 1987 में टिकैत ने किसानों की सर्वखाप पंचायत (जाट बिरादगी में कई खाप हैं ) बुलायी। करमूखेड़ी घटना के बाद भी मुजफ्फरनगर जिला और तहसील प्रशासन किसानों की मांग नहीं मान रहा था। इस बैठक में फैसला लिया गया कि अब सरकार को नींद से जगाने के लिए कमिश्नरी (मेरठ) घेरी जाएगी। 27 जनवरी 1988 को किसानों ने मेरठ स्थित कमिश्नरी ऑफिस को घेरने के लिए डेरा डाल दिया। कमिश्नर ऑफिस के मैदान में किसान जम गये। महेन्द्र सिंह टिकैत की अगुवाई में किसानों का हौसला बुलंद था। बिजली के लिए शुरु हुआ आंदोलन गन्ना के समर्थन मूल्य समेत 35 मांगों तक पहुंच गया था। किसान राशन पानी लेकर पहुंचे थे। वहीं चूल्हे जलते और रोटियां बनती। सरकार किसानों को थकाना चाहती थी।

टिकैत का आंदोलन गैरराजनीतिक
24 दिन तक शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन चलता रहा। उस समय भयंकर ठंड पड़ रही थी। ठंड के कारण दो-तीन किसानों की मौत भी हो गयी। फिर भी धरना जारी रहा। धरनास्थल पर किसानों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही थी। इस आंदोलन की गूंज देश-विदेश तक होने लगी। उस समय राजीव गांधी के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा, चरण सिंह की पत्नी गायत्री देवी, अजीत सिंह, शाही इमाम अब्दुल्ला बुखारी, पर्यावरणविद सुंदर लाल बहुगुणा जैसी हस्तियां महेन्द्र सिंह टिकैत से मिलने मेरठ पहुंचती थीं। टिकैत ने इन नेताओं का नैतिक समर्थन तो स्वीकार किया लेकिन वे इस आंदोलन को गैरराजनीतिक रखने पर अड़े रहे। उन्होंने इस आंदोलन पर कोई राजनीतिक ठप्पा नहीं लगने दिया। 24 दिन बाद उत्तर प्रदेश सरकार के दो मंत्री सइदुल हसन और हुकुम सिंह टिकैत से वार्ता करने मेरठ पहुंचे। धरना खत्म हो गया। इसके बाद टिकैत ने घोषणा की कि जब तक सरकार उनकी मांगें मान नहीं लेती तब कोई किसान बिजली का बिल नहीं देगा। तब तक किसान किसी सरकारी अफसर को अपने गांव में भी नहीं घुसने देंगे।

क्या राजीव की तरह मोदी भी चुकाएंगे कीमत?
टिकैत का अंदेशा सही निकला। सरकार ने किसानों की मांग को पूरा करने की तरफ कोई कदम नहीं बढ़ाया। तब उन्होंने दिल्ली घेरने का फैसला किया। 25 अक्टूबर 1988 को करीब पांच लाख किसान दिल्ली के वोट क्लब पर धरना के लिए जुट गये। करीब एक सप्ताह तक दिल्ली ठप हो गयी। इस आंदोलन से राजीव गांधी की सरकार हिलने लगी। प्रचंड बहुत वाली यह सरकार किसान आंदोलन से घबरा गयी। उसने भी एक गलत फैसला लिया। 30 अक्टूबर की रात पुलिस ने किसानों पर लाठीचार्ज कर दिया। फिर भी किसान जमे रहे। अंत में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने किसानों की मांग मानने का आश्वसान दिया। लेकिन सरकार ने 35 मांगों को मानने का अपना वायदा पूरा नहीं किया। 1989 में चुनाव हुए तो किसानों की नाराजगी ने राजीव गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया। उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस की सरकार का सफाया हो गया। केन्द्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने सत्ता संभाली। कांग्रेस की हार में बोफोर्स के अलावा किसानों की देशव्यापी नाराजगी भी एक बड़ा कारण थी। 2020 के किसान आंदोलन को देख कर अब सवाल पूछा जा रहा है कि क्या नरेन्द्र मोदी भी राजीव गांधी की तरह किसान आंदोलन की कीमत चुकाएंगे ?












Click it and Unblock the Notifications