जाति आधारित जनगणना क्या है ? इसके बारे में सबकुछ जानिए
नई दिल्ली, 23 अगस्त: 2021 की जनगणना में जातियों के आधार पर गिनती को लेकर विभिन्न राजनीतिक पार्टियां गोलबंद हो रही हैं। आने वाले राज्य विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह एक बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है और जाति आधारित वोट बैंक को लुभाने की लालच में शायद ही कोई सियासी दल इस आइडिया का विरोध करने की साहस दिखा पाएं। इस मसले पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई में विभिन्न दलों का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात कर आया है। आइए जानते हैं कि जाति आधारित जनगणना क्या है और यह राजनीतिक मुद्दा क्यों है?

जाति आधारित जनगणना क्या है ?
भारत की स्वतंत्रता के बाद 1951 से लेकर 2011 तक हर 10 साल में देश में जनगणना होती रही है। इस जनगणना में सिर्फ दलितों और आदिवासियों की ही आबादी की गिनती की जाती है, बाकी किसी जाति का अलग से रिकॉर्ड नहीं तैयार किया जाता है। अब कई सारी राजनीतिक पार्टियां 2021 की जनगणना में जातियों के आधार पर भी आबादी की गिनती करने की मांग कर रही हैं। खासकर ओबीसी या अन्य पिछड़ी जातियों की गिनती। जाति आधारित जनगणना की मांग के पीछे का मूल कारण देश में आरक्षण की व्यवस्था है। जाति आधारित जनगणना नहीं होने की वजह से इस समय जातियों की संख्या का कोई भी प्रामाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

क्या कभी हुई है जाति आधारित जनगणना ?
देश की आजादी से पहले 1872 से लेकर 1931 तक जनगणना में सभी जातियों के आंकड़े भी जुटाए जाते थे। 1941 की जनगणना में भी जाति आधारित आंकड़े जुटाए गए थे ,लेकिन उसे प्रकाशित नहीं किया गया था। अभी जो जाति आधारित जनगणना की मांग हो रही है,उसके पीछे देश में ओबीसी राजनीति का बढ़ता दबदबा है। अभी जो देश में ओबीसी आरक्षण की व्यवस्था है, उसका आधार मंडल कमीशन की वह रिपोर्ट है, जिसके अनुमानों के मुताबिक देश में ओबीसी (अन्य पिछड़ी जाति) की आबादी 52% है। बाकी कुछ अनुमान नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों; और लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान राजनीतिक पार्टियों की ओर से खुद के जुटाए अनुमानों पर आधारित हैं।

सरकार का अब तक का स्टैंड क्या है ?
इस साल 10 मार्च को केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में बयान दिया था कि, 'स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने नीतिगत आधार पर फैसला किया था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर जाति के आधार पर आबादी की गिनती नहीं की जाएगी।' इससे पहले 2011 की जनगणना में तत्कालीन यूपी सरकार ने सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) करने का फैसला किया था। ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़े ग्रामीण विकास मंत्रालय और शहरी इलाकों में आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय की ओर से जुटाए गए थे। लेकिन, 2016 में दोनों मंत्रालयों ने एसईसीसी के सारे आंकड़े जारी किए, लेकिन जाति के आंकड़े छोड़ दिए।

ओबीसी की गिनती की मांग कब से शुरू हुई ?
जैसा कि पहले बताया गया कि ओबीसी की आबादी का पुख्ता आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है। इसकी मांग ने तब से रफ्तार पकड़नी शुरू की, जब 1980 के दशक से जाति-आधारित कई क्षेत्रीय दलों का जन्म हुआ। इसकी वजह से सरकारी नौकरियों और सरकारी संस्थानों में दाखिले में अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की मांग ने भी जोर पकड़नी शुरू कर दी। 1979 में केंद्र सरकार ने इन जातियों की पहचान के लिए एक आयोग का गठन किया, ताकि इन्हें विशेष सरकारी सुविधाएं मुहैया करवाई जाए। बीपी मंडल नाम के एक सांसद की अगुवाई में यह आयोग बना इसलिए इसकी रिपोर्ट मंडल कमीशन रिपोर्ट के नाम से चर्चित हुई। इसने अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की सिफारिश की थी। जब 1990 में पूर्व पीएम वीपी सिंह की अगुवाई में राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार थी तो इन सिफारिशों को मंजूर कर लिया गया।

जाति आधारित जनगणना की मांग के पीछे क्या राजनीति है ?
विभिन्न राजनीतिक दलों खासकर जाति आधारित क्षेत्रीय दलों को लगता है कि अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) की आबादी मंडल कमीशन की ओर से अनुमानित 52% से कहीं ज्यादा है। वह इसीलिए जाति आधारित जनगणना की मांग कर रहे हैं, ताकि यह आंकड़ा ज्यादा होने पर वह केंद्रीय नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए ओबीसी के लिए तय 27% आरक्षण के कोटे को बढ़ाने की मांग कर सकें।












Click it and Unblock the Notifications