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रामचौरा मंदिर: भगवान राम ने यहां किया था रात्री विश्राम, जानें क्यों हैं यहां श्रीराम के पैरों के दो बार निशान

अयोध्या मेराम मंदिर के उद्घाटन के दिन जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं वैसे-वैसे भक्तों का उत्साह बढ़ता जा रहा है। अयोध्या में श्री राम का जन्म हुआ था जबकि उनका बचपन कहीं और बीता, युवा अवस्था कहीं और। उनके जीवन काल से जुड़े बहुत से स्थान भारत और इसके पड़ोसी देशों में फैले हुए हैं। हर स्थान पर श्री राम से जुड़ा मंदिर स्थित है।

हमने आपको ऐसे ही कई मंदिरों से रूबरू कराया है। आज हम आपको श्री राम के युवा अवस्था से जुड़े एक स्थान और वहां स्थित मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं। इस मंदिर का नाम है रामचौरा राम मंदिर और ये बिहार के हाजीपुर में स्थित है। इस मंदिर में भक्तों को श्री राम के पदचिन्हों के दर्शन प्राप्त होते हैं।

Raamchaura Mandir

मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार जब महर्षि विश्वामित्र भगवान राम और उनके भ्राता लक्ष्मण को राक्षसों के संहार के लिए वन लेकर गए थे और प्रभु राम ने ताड़का नामक राक्षसी का वध कर के उसके आतंक से सभी ऋषि-मुनियों को मुक्ति दी थी। जिसके बाद महर्षि विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को युद्धनीति और युद्ध कौशल का ज्ञान दिया था।

उसी दौरान राजा जनक ने अपनी पुत्री जानकी यानी की माता सीता के स्वयंवर की उद्घोषणा की थी। इस आयोजन में महर्षि विश्वामित्र भी आमंत्रित थे। वो वहां अपने दोनों शिष्यों, राम और लक्षमण के साथ पहुंचे थे। जब महर्षि विश्वामित्र अपने दोनों शिष्यों के साथ स्वयंवर के आयोजन में भाग लेने के लिए निकले थे तब उन्होंने रास्ते में विशाला नगरी में विश्राम किया था। इसी विशाला नगरी को वैशाली के रूप में जाना जाता है।

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मान्यताओं के अनुसार महर्षि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण के साथ जनकपुर जाने के क्रम में जहां रुके थे और रात्रि विश्राम किया था विशाला नगरी यानी वैशाली के उसी स्थान पर आज रामचौरा मंदिर स्थित है। ये वैशाली के हाजीपुर क्षेत्र में आता है। रामनवमी के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।

इस स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। इस मंदिर में भगवान राम के पदचिन्हों की पूजा की जाती है। यहां दो पदचिन्ह स्थित हैं। कहा जाता है कि एक पदचिन्ह श्री राम के बाल अवस्था के हैं जबकि दूसरा पदचिन्ह भगवान राम के वनवास के दौरान के हैं। मान्यताओं के अनुसार श्री राम अपने वनवास के दौरान गंगा में स्नान करने के बाद इस स्थान पर आए थे।

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