प्रियंका गांधी ने बदल दिया यूपी में चुनाव का मतलब-‘लड़की हूं लड़ सकती हूं'

लोकतांत्रिक भारत में महिलाओं की लामबंदी का एक लंबा और प्रभावशाली इतिहास रहा है। फिर वो इकोफेमिनिस्ट चिपको आंदोलन हो, मथुरा बलात्कार विरोधी आंदोलन और डिग्निटी मार्च हो, ग्रामीण महिलाओं का शराब के खिलाफ सामूहिक विरोध करना हो, निर्भया के गैंगरेप के बाद सार्वजनिक प्रदर्शन हो, सीएए-एनआरसी, कृषि कानून - इन सब आंदोलन या प्रदर्शन के बाद देश की नीतियों में परिवर्तन आया है, क्योंकि जब भी महिलाएं सड़क पर उतरती हैं, तो वो चूकती नहीं हैं।

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इसके बावजूद राजनीतिक दलों ने महिलाओं को एक गुट के रूप में कभी संगठित नहीं किया. एआईएडीएमके और तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियां जिसका नेतृत्व जयललिता और ममता बनर्जी जैसी मजबूत महिला नेताओं द्वारा किया गया, इन्होंने महिलाओं को तव्वजो दी।

नवीन पटनायक की बीजू जनता दल और नीतीश कुमार की जनता दल (यू) जैसी पार्टियों ने भी महिलाओं को वोट बैंक के रूप में बदलने का प्रयास किया और लाभ भी उठाया. लेकिन सभी दलों ने चुनाव प्रचार में उनका कम उपयोग किया।
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा का उत्तर प्रदेश चुनावी अभियान का नारा 'लड़की हूं! लड़ सकती हूं' - चुनाव अभियानों के सामान्य व्याकरण को फिर से लिखने का प्रयास है. यह वादा करके कि 2021 में चुनाव प्रचार शुरू होने पर कम से कम 40 प्रतिशत उम्मीदवार महिलाएं होंगी और फिर उस बात कायम रहते हुए प्रियंका गांधी वाड्रा ने एक बेंचमार्क सेट किया है और वह मायने रखता है।

चुनावी अभियानों का व्याकरण

किसी भी चुनावी अभियान में पांच मुख्य किरदार होते हैं, जिन्हें शामिल किया जाता है। अभियान के प्रवर्तक (ओरिजनेटर) आम तौर पर राजनीतिक दल का ही कोई होता है या फिर कोई रणनीतिकार होता है। अभियान को लीड करनेवाला स्थानीय जिला या निर्वाचन क्षेत्र के नेता हैं और कार्यकारी पार्टी कैडर हैं।

इसके अलावा रैलियों या रोड शो में भाग लेने वाले लोग भी एक किरदार हैं और आखिर में चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवार भी एक किरदार हैं।

अधिकतर यही देखा गया है कि ये सभी किरदार पुरुष ही होते हैं. कभी कभार अभियान की प्रवर्तक (ओरिजनेटर) महिला होती हैं, लेकिन फिर भी वो उन पुरुषों के आसपास घिरी होती हैं जो कर्ताधर्ता हैं. वैसे ही अभियान के लीडर की बात करें तो कभी महिलाएं वो किरदार निभा रही होती हैं, लेकिन वहां भी पुरुष भरे पड़े रहते हैं। और फिर उम्मीदवारों की बात करें तो 8-10 फीसदी उम्मीदवार ही महिलाएं रहती हैं. रैलियों में भरे लोगों को तो देखा जा सकता है हमेशा वहां भी पुरुष ही ज्यादा होते हैं।

इस प्रकार एक आदर्श अभियान पुरुष-प्रधान होता है - जिसे पुरुष मतदाताओं के लिए डिजाइन, अमल और लक्षित किया जाता है. ऐसी अपेक्षा की जाती है, जैसे महिलाओं को भी इसका कुछ न कुछ लाभ मिल रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो एक महिला रैली कभी-कभार ही होती है।

लेकिन अब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का चुनावी अभियान पुरुष-प्रधान न होकर महिला प्रधान बनने के प्रयास में है। इसके तहत पहले ही मेरठ, लखनऊ, बरेली जैसे शहरों में कई महिला मैराथन आयोजित करवाई गईं, जहां हजारों युवा महिलाएं प्रतिभागी रही हैं।

इसी तरह फिरोजपुर, राय-बरेली आदि शहरों में शक्ति संवाद टाउनहॉल का आयोजन हुआ, जहां विशेष रूप से महिलाओं को आमंत्रित किया गया. जिसमें आशा कार्यकर्ता और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं सहित हजारों महिलाएं शामिल हुईं। इसके साथ ही डोर-टू-डर कैंपेन भी केवल महिलाओं द्वारा किया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए कांग्रेस की पहली सूची भी दर्शाती है कि महिलाओं को टिकट दिया गया और ऐसी महिलाओं को जैसे, सीएए/एनआरसी की लड़ाई लड़ने वाली सदफ जफर, उन्नाव के पूर्व बीजेपी विधायक और दोषी कुलदीप सिंह सेंगर से लड़ने के लिए मजबूर एक मां, उचित वेतन की लड़ाई में आशा वर्कर का नेतृत्व करने वाली पूनम पांडे और अन्य जिन्होंने पहले से ही मतदाताओं के दिलों में योद्धा की छवि बनाई है।

आखिर में हर एक चीज तो मतदाताओं के हाथों में होती है। फिर भी, भारत में पहली बार चुनावी अभियानों का नारीकरण किया गया है। हम इस बहुत ही स्वागत योग्य परिवर्तन के साक्षी हैं, वो भी विकसित केरल या तमिलनाडु में नहीं बल्कि सबसे पिछड़े राज्य उत्तर प्रदेश में।

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