हरियाणा: किसानों को 50% सब्सिडी पर दी रहीं आर्गेनिक दवाएं, पराली की समस्या से अब यूं मिलेगा छुटकारा

चंडीगढ़। हरियाणा में सरकार की ओर से किसानों को 50 फीसद सब्सिडी पर आर्गेनिक दवा दी जा रही हैं, जिसके छिड़काव से पराली खुद ही खाद भी बन जाएगी। पराली प्रबंधन के लिए विभिन्न उद्योगों और गोशालाओं से संपर्क किया गया है ताकि पराली का सही तरीके से प्रयोग किया जा सके। वहीं, एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि, सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी (राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण) की सख्ती के बाद हरियाणा में पराली प्रबंधन पर काफी काम हुआ है। सरकारी और सामाजिक स्तर पर किसानों को लगातार जागरूक करने का असर यह हुआ कि पिछले कुछ वर्षो में पराली जलाने की घटनाएं लगातार कम हो रही हैं। इसके उलट पंजाब और उत्तर प्रदेश में पराली प्रबंधन को लेकर काफी कुछ किया जाना बाकी है।

मौजूदा सीजन की बात करें तो हरियाणा में अभी तक पराली जलाने के 643 मामले सामने आए हैं, जबकि पंजाब में 1,586 स्थानों पर पराली जलाई गई है। उत्तर प्रदेश में एनसीआर के आठ जिलों में पराली जलाने की 42 घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) के मुताबिक पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में 15 अक्टूबर तक पराली जलाने के कुल 1,795 मामले सामने आए, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 4,854 स्थानों पर पराली जलाई गई थी।

stubble management in Haryana, government is working in this way to dispose of stubble burning

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार धान के अवशेष जलाने की घटनाएं एक महीने के दौरान पंजाब में 64.49 फीसद, हरियाणा में 18.28 फीसद और उत्तर प्रदेश के एनसीआर में पड़ने वाले आठ जिलों में 47.61 फीसद कम हुई हैं। इसके बावजूद पंजाब में हरियाणा से तीन गुणा अधिक पराली जल रही है। पंजाब में पराली जलाने के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र अमृतसर, तरनतारन, पटियाला और लुधियाना हैं। 72 प्रतिशत केस इन्हीं चार जिलों में हैं। हरियाणा में करनाल, कैथल और कुरुक्षेत्र से पराली जलाने की 80 प्रतिशत घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं।

हरियाणा में हर साल करीब 90 लाख टन गेहूं और धान की फसल के अवशेष जलाए जाते हैं। किसानों को समझना होगा कि अगर वे नहीं संभले तो अगले 20 से 30 साल में भूमि की उत्पादन क्षमता बहुत कम हो जाएगी। तापमान बढ़ने से पानी की मांग 20 फीसद तक बढ़ेगी, जबकि इसकी उपलब्धता 15 फीसद तक घट जाएगी। प्रदेश में हर साल 50 से 55 लाख टन पराली होती है, जिसमें से फिलहाल केवल 15 फीसद का ही इस्तेमाल हो रहा है।

एक एकड़ में औसतन 25 क्विंटल पराली निकलती है, जिसे बेचकर किसान करीब 14 हजार रुपये तक कमा सकते हैं। इसके अलावा सरकारी स्तर पर किसान संगठनों का यह सुझाव भी स्वागतयोग्य है कि मनरेगा के तहत मजदूरों को पराली की गांठ बनाकर खेत से बाहर करने के काम में लगाया जाए। इससे न केवल किसानों को श्रमिकों की कमी से निजात मिलेगी, बल्कि पराली का भी सही तरीके से निस्तारण करने में सहयोग मिल सकेगा। फसलों की तरह पराली का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर मार्केटिंग बोर्ड से खरीद की व्यवस्था की जाए तो बेहतर परिणाम होंगे। सभी चीनी मिलों को पराली खरीदने की छूट दी जाए जिससे वे बिजली बना सकें।

सांसों में घुलता जहर, घट रही जमीन की उर्वरा शक्ति : एक टन पराली जलाने से हवा में तीन किलो कार्बन कण, 50 किलो कार्बन डाईआक्साइड, 92 किलो कार्बन मोनोआक्साइड, 3.83 किलो नाइट्रस आक्साइड, 0.4 किलो सल्फर डाईआक्साइड, 2.7 किलो मीथेन और 200 किलो राख घुल जाती हैं। वहीं पराली जलाने से भूमि की ऊपजाऊ क्षमता लगातार घट रही है। इस कारण भूमि में 80 फीसद तक नाइट्रोजन, सल्फर और 20 फीसद अन्य पोषक तत्वों में कमी आई है। मित्र कीट नष्ट होने से शत्रु कीटों का प्रकोप बढ़ा है जिससे फसलों में तरह-तरह की बीमारियां हो रही हैं। मिट्टी की ऊपरी परत कड़ी होने से जलधारण क्षमता में कमी आई है। प्रदूषित कण मानव शरीर में जाकर खांसी को बढ़ाते हैं। अस्थमा, डायबिटीज के मरीजों को सांस लेना मुश्किल हो जाता है। फेफड़ों में सूजन सहित इंफेक्शन, निमोनिया और हार्ट की बीमारियां जन्म लेने लगती हैं। खासकर बच्चों और बुजुर्गो को ज्यादा परेशानी होती है।

पराली के निस्तारण के लिए इस तरह काम कर रहा हरियाणा: हरियाणा में किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए प्रदेश सरकार रेड और येलो जोन के 900 से अधिक गांवों पर नजर रखे हुए है। पराली प्रबंधन के लिए कुल 200 करोड़ रुपये का बजट रखते हुए विस्तृत कार्ययोजना बनाई गई है। गांवों में बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाया गया है। खेत में पराली की बेल और गांठें बनाने के लिए किसानों को एक हजार रुपये प्रति एकड़ दिए जा रहे हैं। पराली प्रबंधन की मशीनों के लिए 50 से 70 फीसद तक सब्सिडी की व्यवस्था की गई है।

अगर किसी भी गांव में पराली जलती है तो वहां के सरपंच तथा नोडल अधिकारी पर भी कार्रवाई होगी। कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं शुरू की जा रही हैं जिनमें लगभग 40 लाख टन पराली की खपत हो जाएगी। कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) प्लांट की स्थापना के लिए इंडियन आयल कारपोरेशन से समझौता किया गया है। एक हजार टन प्रतिदिन पराली की खपत वाले कंप्रेस्ट बायोगैस प्लांट की 200 परियोजनाओं में लगभग 24 लाख मीटिक टन पराली की खपत होगी। प्रदेश में 234 टन प्रतिदिन क्षमता के सीबीजी प्लांट स्थापित करने के लिए 24 फर्मो ने 38 परियोजना प्रस्ताव दिए हैं। इसके अलावा थर्मल प्लांटों व चीनी मिलों में भी पराली का उपयोग किया जाएगा।

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