मध्य प्रदेश भाजपा का वो दौर, जब सिंधिया खानदान ने ला दिया था 'उबाल', शिवराज सिंह ने किया डैमेज कंट्रोल!

शिवराज सिंह के एक बयान ने मध्य प्रदेश में 15 साल तक सत्ता में रहने वाली कांग्रेस का सफाया कर दिया था। इस नतीजे की वजह शिवराज और सिंधिया की प्रतिद्वंदिता था।

Yashodhara Raje and Shivraj Singh Chouhan

वर्ष 2020 में कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल होने से पहले तक ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में शामिल थे। इतना ही नहीं, वह बीजेपी के रास्ते के सबसे बड़े कांटों में से एक थे। अपने पिता माधवराव सिंधिया की मौत के बाद से ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में वे कांग्रेस के सबसे बड़े नेता थे और इसका असर हर चुनाव में देखने को मिलता था। कांग्रेस के चुनाव अभियान की कमान चाहे किसी के भी हाथ में हो, लेकिन बीजेपी नेताओं के निशाने पर सबसे ज्यादा सिंधिया ही रहते थे। 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले अटेर विधानसभा का उपचुनाव हुआ तो शिवराज सिंह चौहान ने ज्योतिरादित्य सिंधिया पर व्यक्तिगत प्रहार करने की गलती कर दी। एक ऐसी गलती जिसके चलते बीजेपी को अटेर में तो हार मिली ही, शिवराज अपनी पार्टी में ही अलग-थलग पड़ने लगे।

अटेर में आमने-सामने शिवराज-सिंधिया
दरअसल, हुआ कुछ ऐसा कि 2018 के विधानसभा चुनाव से करीब दो साल पहले ही शिवराज सिंह चौहान ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी थीं। उस समय तक बीजेपी केंद्र में सरकार बना चुकी थी और राज्य में भी काफी हद तक मजबूत थी। ऐसे माहौल में शिवराज यह जताना चाहते थे कि वे एमपी में पार्टी के सबसे मजबूत नेता हैं। वे अपने को कमजोर नहीं दिखाना चाहते थे। उन्होंने 2016 के नवंबर में नर्मदा सेवा यात्रा शुरू की। नर्मदा सेवा यात्रा के दौरान ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सत्यदेव कटारे की मौत हो गई। कटारे अटेर विधानसभा क्षेत्र से विधायक थे जो भिंड जिले का हिस्सा है। सिंधिया ग्वालियर-चंबल इलाके में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता थे। जब अटेर विधानसभा के लिए उपचुनाव की घोषणा हुई तो कांग्रेस के लिए प्रचार की कमान सिंधिया ने संभाली।

शिवराज के बयान का बीजेपी में विरोध
जब शिवराज सिंह चौहान अटेर में चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे तो उन्होंने एक विवादित बयान दे दिया। उन्होंने कह दिया कि सिंधिया परिवार ने अंग्रेजों के साथ मिलकर भिंड की जनता पर जुल्म ढाए हैं। शिवराज के इस बयान का सबसे ज्यादा विरोध उन्हीं की पार्टी में हुआ। इसकी जायज वजह भी थी। सबसे बड़ा कारण थीं राजमाता विजयाराजे सिंधिया जो बीजेपी के संस्थापक सदस्यों में से एक थीं और ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी भी थीं।

विरोध में खड़ी हो गईं राजमाता की बेटी
राजमाता सिंधिया का मध्य प्रदेश भाजपा में वही स्थान है जो कुशाभाऊ ठाकरे का है। शिवराज के इस बयान पर सबसे पहले आपत्ति जताई राजमाता की बेटी यशोधरा राजे सिंधिया ने। यशोधरा ने कहा कि लोग भूल गए हैं कि किस तरह से सिंधिया परिवार ने अपनी संपत्ति भाजपा के लिए कुर्बान की है। उन्होंने कहा कि हमारे गैराज से नई-नई गाड़ियां भाजपा के पक्ष में चुनावों के समय जाती थीं और जब लौटती थीं तो दोनों पहिये अलग होते थे और स्टीयरिंग अलग।

वे महाराज और मैं किसान
कारण चाहे जो भी रहे हो, लेकिन अटेर उपचुनाव में बीजेपी को हार मिली। हार का अंतर काफी कम रहा, लेकिन सत्यदेव कटारे के बेटे हेमंत कटारे इस चुनाव में जीत गए। वैसे शिवराज का सिंधिया पर हमला कोई नई बात नहीं थी। सिंधिया जब तक कांग्रेस में रहे, शिवराज उन्हें अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मानते थे। इसलिए क्रिकेट से लेकर राजनीति तक, वे हमेशा सिंधिया के विरोध में खड़े रहते थे। जब सिंधिया आईपीएल की वकालत कर रहे थे, तब शिवराज सिंह उसका विरोध कर रहे थे। 2013 के विधानसभा चुनाव के दौरान जब सिंधिया को कांग्रेस ने चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया तो शिवराज यह कहकर उनका विरोध करते थे कि कहां वे राजा महाराजा और वे एक साधारण किसान।

व्यत्तिगत हमले से बचते हैं शिवराज
शिवराज के इस इन व्यक्तिगत हमलों का असर 2018 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी देखने को मिला। कांग्रेस ने सिंधिया को सीएम पद का उम्मीदवार नहीं घोषित किया था, लेकिन वह पार्टी की प्रचार अभियान का सबसे बड़ा चेहरा थे। शिवराज जहां भी जाते, उन पर हमले करते। इसका नतीजा ये हुआ कि 15 साल तक लगातार सत्ता में रहने के बाद बीजेपी कांग्रेस से पिछड़ गई। चुनाव के बाद कांग्रेस की सरकार भी बनी, लेकिन सिंधिया सीएम नहीं बन पाए। यह मतभेद 15 महीनों में ही इतना गहरा हो गया कि कमलनाथ की सरकार चली गई और सिंधिया कांग्रेस छोड़ बीजेपी में चले गए। शिवराज और सिंधिया की प्रतिद्वंदिता अब इतिहास का हिस्सा है। सच्चाई यह है कि सिंधिया के बीजेपी में आने के बाद से शिवराज उनके खिलाफ बयान देने से तो बचते ही रहते हैं। हमेशा यह कोशिश भी करते हैं कि वे सिंधिया के प्रतिद्वंदी के रूप में नजर नहीं आएं।

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