पंजाब में अब निजी-सरकारी संस्थान नहीं कर सकेंगे मनमानी, सेक्रेटरी ने जारी की सख्त आदेशों वाली चिट्ठी
मोहाली। पंजाब की नई सरकार निजी और सरकारी संस्थानों की मनमानी की शिकायतों पर सख्त हो गई है। लिहाजा यहां निजी और सरकारी संस्थानों में पंजाबी भाषा को पहल देने संबंधी की जा रही लापरवाही और मनमानी अब नहीं चलेगी। इस संबंध में उच्च शिक्षा एवं भाषा मामलों के सचिव कृष्ण कुमार ने सख्त आदेशों वाली एक चिट्ठी जारी की है।

कृष्ण कुमार ने उक्त चिट्ठी में कहा है कि राज्य में सरकारी कार्य पंजाबी में होने चाहिए। इसके साथ ही अधिकारियों की नेम प्लेट, दफ्तरों के नाम वाले बोर्डों पर पंजाबी भाषा और गुरमुखी लिपि को प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने कहा कि यह आदेश गैर-सरकारी संस्थानों पर भी लागू होंगे। 4 जुलाई को जारी हुए इस पत्र में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि राजभाषा अधिनियम, 1967 की धारा 4 और राजभाषा लिप्यंतरण अधिनियम, 2008 के तहत पंजाब राज्य के प्रशासन में पंजाबी भाषा और गुरमुखी के उपयोग के संबंध में नोटिफिकेशन जारी किया गया था।
चिट्ठी में कहा गया है कि, सरकार के ध्यान में आया है कि इन हिदायतों की पालना नहीं हो रही है। इसलिए पूरे राज्य में भाषा को सम्मान और महत्व दिलवाने के साथ ही इसे प्रभावशाली बनाने के लिए सरकारी विभागों, दफ्तरों के साथ-साथ गैर-सरकारी संगठनों और कार्यालयों में पंजाबी भाषा को पहला दर्जा देने के आदेश दिए जा रहे हैं।
चिट्ठी में कहा गया है कि, फैक्ट्री एक्ट, सोसाइटी एक्ट और दुकान व कमर्शियल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट-1958 के तहत रजिस्टर्ड व्यापारिक संस्थाओं के नाम सबसे पहले पंजाबी में गुरमुखी लिपि में लिखे होने चाहिए। इसके साथ ही सड़कों के नाम वाले बोर्ड, मील पत्थर, साइन बोर्ड और फ्लेक्स बोर्ड लिखते समय पंजाबी भाषा को सबसे आगे रखा जाए। यदि कोई अन्य भाषा को लिखने की जरुरत पड़ती है, तो उसे नीचे की पंक्ति में लिखा जाना चाहिए।












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