मन में जैसा भाव, वैसी दिखती है दुनिया, पढ़ें ये कथा
नई दिल्ली। मनुष्य का मन विचित्र तो है लेकिन सर्वशक्तिशाली भी है। यह जैसा सोच लेता है, वैसा ही अपने आसपास के परिवेश की कल्पना करने लगता है। मनुष्य जीवन में आने वाले अनेक सुख-दुख, अच्छा-बुरा, घटनाएं आदि मन की ही उपज होती है। इसे धारणा बनाना भी कह सकते हैं। अर्थात् हमारे मन में किसी के प्रति जैसी भावना होगी वैसी ही दुनिया हमें दिखाई देती है। इसलिए कहा गया है अपने मन को सदा सकारात्मक बातों में लगाना चाहिए। आइए इसे श्रीरामचरितमानस की एक बोध कथा से समझने का प्रयास करते हैं।

यह कथा श्रीरामचरितमानस के लंकाकांड में मिलती है। भगवान श्रीराम लंका के सुबेल पर्वत पर रात्रि में अपने सहायकों के साथ बैठे हैं। उन्होंने पूर्व दिशा की ओर उदित चंद्रमा को देखकर सभी से एक प्रश्न पूछा- चंद्रमा में जो कालापन है, वह क्या है? अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार सभी इसका उत्तर दीजिए।
चंद्रमा में पृथ्वी की छाया दिखाई दे रही है
सबसे पहले सुग्रीव ने कहा- चंद्रमा में पृथ्वी की छाया दिखाई दे रही है। विभीषण ने कहा- चंद्रमा को राहू ने मारा था, वही चोट का निशान काला दाग चंद्रमा के हृदय पर पड़ा हुआ है। चूंकिविभीषण पर उसके भाई रावण ने चरण प्रहार किया था, उसी का संस्कार उसके मन पर पड़ा था। अंगद ने कहा- जब ब्रह्मा ने रति का मुख बनाया तब उन्होंने चंद्रमा का सार भाग निकाल लिया। वही छेद चंद्रमा के हृदय में वर्तमान में है। क्योंकिकिष्किंधापति बाली के साम्राज्य के उत्तराधिकारी बने सुग्रीव और उसे युवराज बना गया। अत: अंगद को लगता है किउसके जीवन का सार भाग अर्थात् राज्य उसके हाथ से चला गया। प्रभु श्रीराम ने कहा- विष चंद्रमा का बहुत प्यारा भाई है। इसी कारण उसने विष को अपने हृदय में स्थान दे रखा है। विषयुक्त अपने किरण समूह को फैलाकर वह वियोगी नर-नारियों को जलाता रहता है। श्रीराम के इस कथन में उनका लक्ष्मण के प्रति प्रेम दिखाई दे रहा है। साथ ही सीता का विरह भी दिखाई दे रहा है।
श्याम सुंदर मूर्ति सदा चंद्रमा के हृदय में निवास करती है
अंत में हनुमानजी ने कहा- हे प्रभु! चंद्रमा आपका प्रिय दास है। आपकी श्याम सुंदर मूर्ति सदा चंद्रमा के हृदय में निवास करती है। उसी श्यामता की झलक चंद्रमा में है। हनुमानजी प्रभु श्रीराम के भक्त हैं, उनके हृदय में रामजी सदैव निवास करते हैं इसलिए उन्हें चंद्रमा में श्रीराम की मूर्ति ही दिखाई देती है।
मन में जैसा भाव, वैसी दिखती है दुनिया
इस कथा के माध्यम से समझा जा सकता है कि जिसके मन में जैसी भावना रहती है, उसका दुनिया को देखने का नजरिया वैसा ही हो जाता है। इस बोध कथा के बहाने श्रीराम सभी के मन को टटोलते हैं। सुग्रीव राजा हैं इसलिए पृथ्वी की छाया की बात करते हैं। पृथ्वी अर्थात् साम्राज्य विस्तार की बात उनके मन में रहती है। भगवान ने उन्हें किष्किंधा का राजा बना दिया। अंगद को युवराज होने से राज्य की वासना है, अत: उसे लगता है किउसके जीवन का सारभाग ही चला गया है। अयोध्या में भगवान राम के साथ मात्र हनुमानजी ही रहते हैं, बाकी सभी वापस चले जाते हैं। क्योंकिएकमात्र हनुमानजी ने ही चंद्रमा के हृदय में प्रभू की सांवली मूरत बसने की बात कही है। अत: हनुमानजी सदा उनके प्रिय बनकर उनके समीप रह गए।












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