Tradition: रूढ़िवादिता नहीं वैज्ञानिक है चोटी रखने का नियम
नई दिल्ली। आपने पढ़ा-सुना और टीवी फिल्मों में देखा होगा कि प्राचीनकाल में विद्वान पंडितों, आचार्यों का सिर मुंडा हुआ होता था और उनकी शिखा यानी चोटी होती थी। ब्राह्मणों के लिए चोटी रखना अनिवार्य होता था और यह उनकी पहचान भी होती थी, लेकिन आजकल आधुनिक समाज में चोटी रखने में शर्म महसूस की जाती है। प्राचीन समय में सिर पर चोटी रखना इतना जरूरी था कि इसे आर्यों की पहचान तक मान लिया गया था, लेकिन यह सिर्फ एक मान्यता या परंपरा नहीं है, चोटी के महत्व को पुरातन काल से लेकर आज तक के वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं।

मस्तिष्क के ताप को करती है नियंत्रित
सबसे प्रमुख बात, सिर पर चोटी रखने का सबसे बड़ा और प्रमुख कारण है इस स्थान के सीधे नीचे सुषुम्ना नाड़ी होती है, जो कपाल तंत्र की अन्य खुली जगहों (मुंडन के समय) की अपेक्षा ज्यादा संवेदनशील भी होती है। इस जगह के खुले होने के कारण वातावरण से ऊष्मा और अन्य ब्रह्मांडीय विद्युत-चुंबकीय तरंगें बड़ी ही आसानी से मस्तिष्क के साथ इंटरेक्शन कर सकती हैं। ऐसी गतिविधियां मस्तिष्क के ताप को भी बढ़ाती हैं, लेकिन वैज्ञानिक तौर पर मस्तिष्क के ताप को नियंत्रित करना बहुत जरूरी होता है इसलिए इस स्थान का ढका होना जरूरी है। सिर पर शिखा (चोटी) रखकर आसानी से ताप को नियंत्रित किया जा सकता है। यही वजह है कि प्राचीन काल से ही सिर पर चोटी रखने का प्रचलन है।

बौद्धिक क्षमता का केंद्र
शरीर में सात प्रमुख चक्र मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्त्रार होते हैं। इनमें से सहस्त्रार चक्र सिर के बीच में होता है। इस जगह पर शिखा रखने से यह चक्र जाग्रत होता है, साथ ही बुद्धि और मन भी नियंत्रित रहते हैं। आपको शायद यह पता ना हो लेकिन कपाल के जिस भाग पर चोटी रखी जाती है वह स्थान बौद्धिक क्षमता, बुद्धिमता और शरीर के विभिन्न् अंगों को नियंत्रित करता है। यह धर्म का परिचायक तो है ही साथ ही साथ मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को सुचारू रखने में सहायक सिद्ध होता है।

सही लंबाई की हो चोटी
सिर पर शिखा रखने से मनुष्य योगासनों को सही तरीके से कर पाता है। इनमें प्राणायाम, अष्टांगयोग आदि प्रमुख हैं। इसकी सहायता से नेत्रों की रोशनी भी ठीक रहती है और वह व्यक्ति शारीरिक रूप से सक्रिय रहता है। शिखा का दबाव होने से रक्त का प्रवाह ठीक रहता है, इसका सीधा लाभ मस्तिष्क को प्राप्त होता है।

परंपरा
वे लोग जिनकी परंपरा में ही चोटी रखना शामिल है, वे आधुनिकता की वजह से सिर पर बहुत छोटी सी चोटी रख लेते हैं, जबकि शास्त्रों के अनुसार यह वर्णित है कि चोटी की लंबाई और आकार गाय के पैर के खुर के बराबर होना जरूरी है।












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