Vinayak Chaturthi 2022 Date And Timing: आज है विनायक चतुर्थी, क्या है शुभ मुहूर्त , जानिए चालीसा और आरती
Vinayak Chaturthi 2022 Date and Timing: आज है मार्गशीर्ष की विनायक चतुर्थी, जिसका बड़ा मान है। वैसे भी भगवान गणेश तो अपने भक्तों से बहुत ज्यादा प्यार करते हैं। बच्चों के प्रिय गन्नु बाबा तो हर वक्त अपने भक्तों की समस्याओं का अंत करने में लगे रहते हैं। उनके स्मरण मात्र से ही इंसान के आधे कष्टों का निवारण हो जाता है और अगर चतुर्थी के दिन कोई उनके सच्चे मन से पूजा करे तो उसके तो वारे-न्यारे हो जाते हैं। हालांकि चतुर्थी तिथि का प्रारंभ कल शाम 7 बजकर 28 मिनट पर ही हो गया था लेकिन उदयातिथि की वजह से व्रत आज रखा गया है। आपको बता दें कि चतुर्थी तिथि आज शाम 4 बजकर 25 मिनट तक रहेगी।

पूजा का शुभ मुहूर्त
27 नवंबर को 11: 06 AM से 01: 12 PM तक पूजा का शुभ मुहूर्त है।
गणेश के मंत्र
- ॐ गं गणपतये नम:।'
- 'ॐ वक्रतुण्डाय हुं।'
- सिद्ध लक्ष्मी मनोरहप्रियाय नमः
- ॐ मेघोत्काय स्वाहा।'
- ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।'
- 'ॐ नमो हेरम्ब मद मोहित मम् संकटान निवारय-निवारय स्वाहा।'

गणेश जी की आरती
- जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
- माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
- एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी।
- माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥
- जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
- माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
- पान चढ़े फल चढ़े, और चढ़े मेवा।
- लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥
- जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
- माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
- अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
- बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥
- जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
- माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
- सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
- माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
- जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
- माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

श्री गणेश जी की चालीसा
दोहा
- जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
- विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
चौपाई
- जय जय जय गणपति गणराजू।
- मंगल भरण करण शुभ काजू॥1॥
- जय गजबदन सदन सुखदाता।
- विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥2॥
- वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन।
- तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥3॥
- राजत मणि मुक्तन उर माला।
- स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥4॥
- पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
- मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥5॥
- सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
- चरण पादुका मुनि मन राजित॥6॥
- धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।
- गौरी ललन विश्व-विख्याता॥7॥
- ऋद्घि-सिद्घि तव चंवर सुधारे।
- मूषक वाहन सोहत द्घारे॥8॥
- कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी।
- अति शुचि पावन मंगलकारी॥9॥
- एक समय गिरिराज कुमारी।
- पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥10॥
- भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
- तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा॥11॥
- अतिथि जानि कै गौरि सुखारी।
- बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥12॥
- अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा।
- मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥13॥
- मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला।
- बिना गर्भ धारण, यहि काला॥14॥
- गणनायक, गुण ज्ञान निधाना।
- पूजित प्रथम, रुप भगवाना॥15॥
- अस कहि अन्तर्धान रुप है।
- पलना पर बालक स्वरुप है॥16॥
- बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना।
- लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥17॥
- सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।
- नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥18॥
- शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं।
- सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥19॥
- लखि अति आनन्द मंगल साजा।
- देखन भी आये शनि राजा॥20॥
- निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
- बालक, देखन चाहत नाहीं॥21॥
- गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो।
- उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥22॥
- कहन लगे शनि, मन सकुचाई।
- का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥23॥
- नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ।
- शनि सों बालक देखन कहाऊ॥24॥
- पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा।
- बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा॥25॥
- गिरिजा गिरीं विकल हुए धरणी।
- सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥26॥
- हाहाकार मच्यो कैलाशा।
- शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥27॥
- तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो।
- काटि चक्र सो गज शिर लाये॥28॥
- बालक के धड़ ऊपर धारयो।
- प्राण, मंत्र पढ़ि शंकर डारयो॥29॥
- नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
- प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे॥30॥
- बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
- पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥31॥
- चले षडानन, भरमि भुलाई।
- रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई॥32॥
- धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे।
- नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥33॥
- चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
- तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥34॥
- तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
- शेष सहसमुख सके न गाई॥35॥
- मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
- करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥36॥
- भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
- जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥37॥
- अब प्रभु दया दीन पर कीजै।
- अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥38॥
- श्री गणेश यह चालीसा।
- पाठ करै कर ध्यान॥39॥
- नित नव मंगल गृह बसै।
- लहे जगत सन्मान॥40॥
दोहा
- सम्वत अपन सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
- पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥












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