Somnath Temple को क्यों कहते हैं 'सोमनाथ'? क्या है इसके पीछे की कहानी?
Somnath Temple: भारत के सबसे प्राचीन और पवित्र तीर्थस्थलों में सोमनाथ मंदिर का विशेष स्थान है। यह मंदिर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में अरब सागर के तट पर स्थित है और भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है। अक्सर लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि इस मंदिर को 'सोमनाथ' क्यों कहा जाता है।
'सोमनाथ' दो शब्दों से मिलकर बना है- सोम और नाथ। 'सोम' का अर्थ है चंद्रमा और 'नाथ' का अर्थ है स्वामी या भगवान। पौराणिक कथा के अनुसार, चंद्रदेव को दक्ष प्रजापति के श्राप के कारण क्षय रोग हो गया था। श्राप से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने प्रभास क्षेत्र में भगवान शिव की घोर तपस्या की।

शिव की कृपा से उन्हें रोग से मुक्ति मिली और चंद्रदेव ने यहां शिवलिंग की स्थापना की। चंद्र (सोम) द्वारा स्थापित होने के कारण इसका नाम सोमनाथ पड़ा।
Somnath Temple का धार्मिक महत्व
सोमनाथ मंदिर को बारह ज्योतिर्लिंगों में पहला माना जाता है, इसलिए इसका विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि यहां दर्शन करने से जीवन के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
Somnath Temple दर्शन करते वक्त करें इस मंत्र का जाप
- ॐ नमः शिवाय
- ॐ सोमेश्वराय नमः
सोमनाथ मंदिर की आरती (Somnath Temple)
- हो सोमेश्वर देव भोडिया, करु तमारि सेव
- जटामा वसे मात गंगेव, पतित न पावन कराति
- पार्वती न पति, तोडले रामे गुण नो पति
- जप नित जपे जाति ने सति
- आरती रोज उतारती, ........
- कद ताना चो कद, कंठ मा जूली रह्या कंकाल
- अंग पर रामे विकन्धर व्याद, मणिधर मनियाल कड़ा
- गरल धरल नीलकंठ धतूरा, भांग तृप्त आ कंठ
- निशाचर भूत प्रेत न जप, भयंकर भूरील कड़ा
- आरती रोज उतारती, ........
- निर्मल जल नी धार, धरे कोई बिलिपत्र उपहार
- शिवाय ॐ नमः करे उच्चार, ध्यानं शंकर न धरे
- धर्म अर्थ ने काम मोक्ष, शाह चारु फल ने शाम
- शदा शिव हाम दाम ने ठाम, समर्पे सेवक द्वारे
- आरती रोज उतारती, ........
- स्थान भूमि शमशान, दुर्जति धरे अलखरो ध्यान
- दिगंबर महादेव भगवान, अजन मा अकद अनुपम
- देव दैत्य ने नाग मानवी, कोईना पमे ताड़
- अजरवर तारा गुणालय थाय, समरपे शम्भू बांध बांध
- आरती रोज उतारती,
- जटा जुट में चन्द्रा, त्रिलोचन अगन जड़ पर जप
- त्रिशूल पार डमरू डाक बजंत, वास कैलाश वासी
- भव हर भवरा नाथ साधरा, सथ वदा सम्राट
- अधौ हर अनाथ हांडा नाथ, ताड़ ताल भवरी फासी
- आरती रोज उतारती,
- चले चौद ही लोक, पुकारत नाम मिटे सब शोक
- चरित बांचय जगत रे चोक, के जय हो पिनाक पानी
- अलगरी उचरंग धरि गुन गाय कारि मन जप
- राखिए नाथ त्रिलोकी रंग, वदत नीत विमल वाणी
- आरती रोज उतारती, ........
- ॐ नमः शिवाय!
DISCLAIMER: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। वनइंडिया लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है इसलिए किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले कृपया किसी जानकार ज्योतिष या पंडित की राय जरूर लें।












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