शीतला सप्तमी 15 मार्च को, परिवार के सुख के लिए करें शीतला माता की पूजा

नई दिल्ली। शीतला सप्तमी चैत्र माह के कृष्णपक्ष की सप्तमी तिथि के दिन आती है। इस दिन शीतला माता की पूजा की जाती है। पूजा का उद्देश्य परिवार के सदस्यों को छोटी माता और चेचक, फोड़े फुंसियों से बचाव करना है। शीतला सप्तमी की पूजा मुख्य रूप से मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश और गुजरात में बड़े पैमाने पर की जाती है, अन्य राज्यों में भी परंपरानुसार शीतला सप्तमी तो कहीं शीतला अष्टमी की पूजा की जाती है। इस बार शीतला सप्तमी 15 मार्च 2020, रविवार को आ रही है। इस दिन अनुराधा नक्षत्र और रवियोग का संयोग भी है जो सर्वसिद्धिदायक माना जाता है।

कैसे की जाती है शीतला सप्तमी की पूजा

कैसे की जाती है शीतला सप्तमी की पूजा

शीतला सप्तमी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर ठंडे जल से स्नान करते हैं। इसके बाद शीतला माता के मंदिर में जाकर देवी को ठंडा जल अर्पित करके उनकी विधि-विधान से पूजा करते हैं। श्रीफल अर्पित करते हैं और एक दिन पूर्व पानी में भिगोई हुई चने की दाल चढ़ाई जाती है। शीतला माता को ठंडे भोजन का नैवेद्य लगता है इसलिए भोजन एक दिन पहले रात में बनाकर रख लिया जाता है। शीतला सप्तमी की कथा सुनने के बाद घर आकर मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर हल्दी से हाथ के पांच पांच छापे लगाए जाते हैं। जो जल शीतला माता को अर्पित किया जाता है उसमें से थोड़ा सा बचाकर उसे पूरे घर में छींट देते हैं। इससे शीतला माता की कृपा बनी रहती है और रोगों से घर की सुरक्षा होती है। शीतला सप्तमी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है। इस दिन लोग खाने में भी एक दिन पूर्व बना हुआ ठंडा भोजन करते हैं।

शीतला सप्तमी व्रत कथा

शीतला सप्तमी व्रत कथा

शीतला सप्तमी को लेकर कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं। एक सर्वाधिक चर्चित कथा के अनुसार एक बार चैत्र कृष्ण सप्तमी के दिन एक बुढि़या व उसकी दो बहुओं ने व्रत रखा। उस दिन सभी को बासी भोजन ग्रहण करना था। इसलिए पहले दिन ही भोजन पका लिया गया था। लेकिन दोनों बहुओं को कुछ समय पहले ही संतान की प्राप्ति हुई थी तो उन्होंने सोचा कि कहीं बासी भोजन खाने से वे और उनकी संतानें बीमार न हो जाएं इसलिए उन्होंने बासी भोजन ग्रहण न कर अपनी सास के साथ माता की पूजा अर्चना के पश्चात पशुओं के लिए बनाए गए भोजन के साथ अपने लिए भी रोटे सेंक कर उनका चूरमा बनाकर खा लिया। जब सास ने बासी भोजन ग्रहण करने को कहा तो बहुएं काम का बहाना बनाकर टाल गई। उनके इस कृत्य से शीतला माता कुपित हो गई और उन दोनों के नवजात शिशु मृत मिले। जब सास को पूरी कहानी पता चली तो उसने दोनों को घर से निकाल दिया। दोनों अपने शिशु के शवों को लेकर जा रही थी तभी एक बरगद के पेड़ के पास उन्होंने दो बहनों को देखा। उनके नाम ओरी व शीतला थे। ओरी और शीतला ने दोनों बहुओं को दुखी देखा तो कारण पूछा। उन्होंने सारी बात बता दी। तब शीतला ने उन्हें लताड़ लगाते हुए कहा कि पाप कर्म का दंड तो भुगतना ही पड़ेगा। बहुओं ने पहचान लिया कि वे साक्षात माता हैं तो चरणों में पड़ गई और क्षमा याचना की, माता को भी उनके पश्चाताप करने पर दया आई और उनके मृत बालक जीवित हो गए। तब दोनों खुशी-खुशी गांव लौट आईं। इस चमत्कार को देखकर सब हैरान रह गए। इसके बाद पूरा गांव माता को मानने लगा।

क्या करें इस दिन

क्या करें इस दिन

  • मान्यता है कि शीतला सप्तमी के दिन शीतला माता साक्षात पृथ्वी पर विचरण करती हैं। वे किसी भी रूप में भोजन ग्रहण करने आ सकती है। इसलिए यदि घर पर कोई वृद्धा, भिखारी या अन्य कोई आए तो उसे खाली हाथ ना जाने दें। उसे भोजन अवश्य कराएं।
  • इस दिन पशुओं, पक्षियों आदि को भी अन्न के दाने जरूर डालें। इससे माता प्रसन्न होती है।
  • इस दिन गर्म पानी से स्नान करना और गर्म भोजन करना वर्जित है।

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