Saphala Ekadashi 2021: सर्वत्र सफलता दिलाती है सफला एकादशी

Saphala Ekadashi 2021: पौष माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को सफला एकादशी कहा जाता है। सफला एकादशी 9 जनवरी 2021 शनिवार के दिन आ रही है। इस एकादशी का व्रत करने से सर्वत्र सभी कार्यो में सफलता प्राप्त होती है। विधिपूर्वक जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत रखकर भगवान नारायण की भक्तिभावपूर्ण पूजा करता है उसे जीवन में कभी असफलता का सामना नहीं करना पड़ता है। पांच हजार वर्ष तप करने से जो फल प्राप्त होता है, वह इस एक एकादशी को करने से मिल जाता है ऐसा शास्त्रों का कथन है।

कैसे करें सफला एकादशी व्रत पूजा

कैसे करें सफला एकादशी व्रत पूजा

प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व जागकर स्नानादि से निवृत्त होकर पूजा स्थान को साफ-स्वच्छ करें। नित्यपूजा के बाद एक चौकी पर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। सफला एकादशी व्रत का संकल्प लें। यह संकल्प सकाम और निष्काम दोनों तरह से लिया जा सकता है। सकाम संकल्प का अर्थ है अपने किसी विशेष कार्य की सिद्धि के लिए और निष्काम का अर्थ है, बिना किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाने वाला व्रत। संकल्प के बाद भगवान नारायण का पंचोपचार पूजन करें। पीले पुष्प अर्पित करें। ऋतुफल और मिष्ठान्न आदि का नैवेद्य लगाएं। एकादशी व्रत की कथा सुनें। दिनभर निराहार रहते हुए रात्रि जागरण करें।

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सफला एकादशी व्रत कथा

सफला एकादशी व्रत कथा

एक समय चंपावती नगरी में महिष्मान नाम का राजा राज्य करता था। उसके चार पुत्र थे। उन सबमें लुम्पक नाम वाला बड़ा राजपुत्र महापापी था। वह सदा परस्त्री और वेश्यागमन तथा दूसरे बुरे कामों में अपने पिता का धन नष्ट किया करता था। सदैव ही देवता, ब्राह्मण व वैष्णवों की निंदा किया करता था। जब राजा को लुम्पक के कुकर्मों का पता चला तो उन्होंने उसे अपने राज्य से निकाल दिया। जीवनयापन के लिए उसने चोरी करने का निश्चय किया। दिन में वह वन में रहता और रात्रि को अपने पिता की नगरी में चोरी करता तथा प्रजा को तंग करने का कुकर्म करता। उसके इस तरह के कार्यों से सारी नगरी भयभीत हो गई। वह वन में रहकर पशु आदि को मारकर खाने लगा। नागरिक और राज्य के कर्मचारी उसे पकड़ लेते किंतु राजा के भय से छोड़ देते।

वृक्ष के नीचे लुम्पक रहा करता था

वन में एक अतिप्राचीन पीपल का विशाल वृक्ष था। लोग उस वृक्ष की पूजा भगवान के समान करते थे। उसी वृक्ष के नीचे लुम्पक रहा करता था। पौष कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन शीत अधिक होने के कारण लुम्पक सारी रात सो नहीं सका। उसके हाथ-पैर अकड़ गए। सूर्योदय होते-होते वह मूर्छित हो गया। दूसरे दिन एकादशी को मध्याह्न के समय सूर्य की गर्मी पाकर उसकी मूर्छा दूर हुई। गिरता-पड़ता वह भोजन की तलाश में निकला। पशुओं को मारने में वह समर्थ नहीं था अतथ पेड़ो के नीचे गिरे हुए फल उठाकर वापस उसी पीपल वृक्ष के नीचे आ गया। उस समय तक भगवान सूर्य अस्त हो चुके थे। वृक्ष के नीचे फल रखकर कहने लगा- हे भगवन! अब आपके ही अर्पण हैं ये फल। आप ही तृप्त हो जाइए। उस रात्रि को दुथख के कारण रात्रि को भी नींद नहीं आई। उसके इस अनजाने में किए गए उपवास और जागरण से भगवान अत्यंत प्रसन्न् हो गए और उसके सारे पाप नष्ट कर दिए। दूसरे दिन प्रातथ एक अतिसुंदर घोड़ा अनेक सुंदर वस्तुओं से सजा हुआ उसके सामने आकर खड़ा हो गया। उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे राजपुत्र! श्री नारायण की कृपा से तेरे सब पाप नष्ट हो गए हैं। अब तू अपने पिता के पास जाकर राज्य प्राप्त कर। ऐसी वाणी सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न् हुआ और दिव्य वस्त्र धारण करके पिता के पास गया। पिता ने प्रसन्न् होकर उसे समस्त राज्य का भार सौंप दिया और वन का रास्ता लिया। अब लुम्पक शास्त्रानुसार राज्य करने लगा। अतथ जो मनुष्य इस परम पवित्र सफला एकादशी का व्रत करता है उसके सारे पापों का नाश होकर अंत में मुक्ति मिलती है। सफला एकादशी के माहात्म्य को पढ़ने से अथवा श्रवण करने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

एकादशी तिथि कब से कब तक

एकादशी तिथि कब से कब तक

  • एकादशी तिथि प्रारंभ : 8 जनवरी रात्रि 9.40 बजे से
  • एकादशी तिथि पूर्ण : 9 जनवरी सायं 7.17 बजे तक
  • पारणा : 10 जनवरी को प्रात: 7.09 से 9.19 बजे तक

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