Sankashti Chaturthi 2020 : संकटों से जूझ रहे हैं तो आज गणेशजी को कर लें प्रसन्न
नई दिल्ली। संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसे जीवन में कभी कोई न कोई संकट ना आया हो। कई लोगों का तो पूरा जीवन ही संकटपूर्ण बीत जाता है। उन्हें ना तो कहीं मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा हासिल हो पाती है और ना ही कहीं कोई सुख मिलता है। एक तरह से कहा जाए तो ऐसे लोगों से उनकी किस्मत रूठी रहती है। ऐसे लोगों के लिए शास्त्रों में एक व्रत बताया गया है, संकट चतुर्थी का व्रत। इसे संकष्टी चतुर्थी का व्रत भी कहा जाता है। चतुर्थी व्रत भगवान श्री गणेश और चंद्रमा की पूजा का दिन है। श्री गणेश समस्त सुखों के दाता हैं और चंद्रमा मानसिक शांति प्रदान करते हैं। संकट चतुर्थी 8 जून 2020 सोमवार को आ रही है।

विनायक चतुर्थी है आज
प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में चतुर्थी तिथि आती है और इस दिन भगवान गणेश की पूजा कर व्रत किया जाता है। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकट चतुर्थी कहा जाता है। वैसे तो दोनों ही चतुर्थी का अपना-अपना महत्व है, लेकिन संकट चतुर्थी को विशेषकर उसके नाम के अनुरूप संकट हरने वाली चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन व्रत रखकर भगवान गणेश की पूजा की जाती है। रात में चांद को अर्घ्य देकर पूजा पूर्ण की जाती है। इस व्रत के बारे में कहा जाता है कि जो व्यक्ति संकट चतुर्थी का व्रत करता है, उसके सारे संकट दूर हो जाते हैं। व्यक्ति यदि अपनी किसी विशेष परेशानी को दूर करने का संकल्प लेकर यह व्रत रखे तो वह परेशानी निश्चित रूप से दूर होती है।

संकट चतुर्थी पूजा के लाभ
- भगवान श्री गणेश के अनेक व्रतों में संकट चतुर्थी को सबसे अधिक सशक्त और शीघ्र प्रभावी माना गया है।
- संकट चतुर्थी जीवन के सारे संकटों को दूर कर देती है।
- यह चतुर्थी व्रत करने वाले को समस्त सुख, संपत्ति, धन, सम्मान प्रदान करती है।
- मन में किसी संकट को दूर करने का संकल्प लेकर व्रत किया जाए तो वह शीघ्र दूर होता है।
- इस व्रत के प्रभाव से परिजनों में सांमज्य और प्रेम बना रहता है।
- यह व्रत स्त्रियों के सौभाग्य में वृद्धि करता है। बौद्धिक कौशल बढ़ाता है।
- संकट चतुर्थी व्रत और पूजा करने से घर के सभी नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं। घर में शुभता आती है।

कैसे की जाती है संकट चतुर्थी पूजा
संकट चतुर्थी के दिन व्रत पूजा करने वाले महिला-पुरुष प्रात: काल सूर्योदय से पहले उठ जाएं। स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहन लें। इस दिन लाल रंग का वस्त्र धारण करना बेहद शुभ माना जाता है। व्रत की पूर्णता के लिए लाल वस्त्र पहनना शुभ होता है। स्नान के बाद गणपति की पूजा करें। गणपति की पूजा करते समय जातक को अपना मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना चाहिए। सबसे पहले गणपति की मूर्ति को फूलों से अच्छी तरह से सजा लें। पूजा में लड्डू, फूल तांबे के कलश में पानी, धूप, चंदन, फलों में केले, श्रीफल रखें। गणपति को रोली लगाएं, फूल और जल अर्पित करें। विधि विधान से पूजा करने के बाद भगवान गणेश को दूर्वा डालकर लड्डू या मोदक का नैवेद्य लगाए। गणपति के सामने धूप-दीप जलाएं और ध्यान करें। गणपति का जो भी मंत्र आप जानते हैं उसका उच्चारण करें। कोई मंत्र ना आता हो तो ऊं गं गणपतयै नम: का ही जाप कर लें। पूजा के बाद फल, मूंगफली, खीर, दूध या साबूदाने को छोड़कर कुछ भी न खाएं। शाम के समय चांद निकलने से पहले एक बार फिर गणपति की पूजा करें और संकट चतुर्थी व्रत की कथा का पाठ करें या सुनें। रात को चांद की पूजा करके जल का अर्घ्य दें और प्रसाद लेकर व्रत खोलें।

संकट चतुर्थी व्रत कथा
एक बार माता पार्वती और भगवान शिव नदी के पास बैठे हुए थे, तभी अचानक माता पार्वती ने चौपड़ खेलने की इच्छा जताई। लेकिन समस्या यह थी कि वहां उन दोनों के अलावा तीसरा कोई नहीं था जो खेल में निर्णायक की भूमिका निभाए। इसका समाधान निकालते हुए शिव और पार्वती ने मिलकर एक मिट्टी की मूर्ति बनाई और उसमें जान डाल दी। मिट्टी से बने बालक को दोनों ने यह आदेश दिया कि तुम खेल को अच्छी तरह से देखना और यह फैसला लेना कि कौन जीता और कौन हारा। खेल शुरू हुआ, जिसमें माता पार्वती बार-बार भगवान शिव को मात देकर विजयी हो रही थीं।
बालक ने माता पार्वती को हारा हुआ घोषित कर दिया
खेल चलता रहा, लेकिन एक बार गलती से बालक ने माता पार्वती को हारा हुआ घोषित कर दिया। बालक की इस गलती ने माता पार्वती को बहुत क्रोधित कर दिया जिसकी वजह से गुस्से में आकर बालक को श्राप दे दिया और वह लंगड़ा हो गया। बालक ने अपनी भूल के लिए माता से बहुत क्षमा मांगी। बालक के निवेदन को देखते हुए माता ने कहा कि अब श्राप वापस तो नहीं हो सकता, लेकिन वह एक उपाय बता सकती हैं जिससे वह श्राप से मुक्ति पा सकेगा। माता ने कहा कि संकट चतुर्थी वाले दिन पूजा करने इस जगह पर कुछ कन्याएं आती हैं, तुम उनसे व्रत की विधि पूछना और उस व्रत को सच्चे मन से करना। बालक ने व्रत की विधि जानकर श्रद्धापूर्वक और विधि अनुसार उसे किया। उसकी आराधना से भगवान गणेश प्रसन्न् हुए और उसकी इच्छा पूछी।
चतुर्थी तिथि कब से कब तक
- चतुर्थी तिथि प्रारंभ : 8 जून को सायं 7.55 बजे से
- चतुर्थी तिथि पूर्ण : 9 जून को सायं 7.38 बजे तक
- चंद्रोदय 8 जून की रात्रि में 9.52 बजे












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