रमज़ान माह का इतिहास, रोज़े में क्‍या करें क्‍या न करें

नई दिल्‍ली। इस्लाम धर्म में अच्छा इन्सान बनने के लिए पहले मुसलमान बनना आवश्यक है। अरबी लुगद (डिक्‍शनरी) के मुताबिक मुसलमान का मतलब होता है 'पक्‍के ईमान वाला'। मुसलमान बनने के लिए पांच कर्तव्यों का पालन करना जरूरी है। यदि कोई व्यक्ति इन पांच कर्तव्यों में से किसी एक को भी ना माने, तो वह मुसलमान नहीं हो सकता।

वो कतर्व्‍य हैं- पहला- ईमान यानी कलिमा तय्यब, जिसमें अल्लाह के परम पूज्य होने का इकरार, उसके एक होने का यकीन और मोहम्मद साहब के आखिरी नबी होने का यकीन करना। दूसरा नमाज़, जिसके अंतर्गत एक मुसलमान को नमाज पढ़ना चाहिये। तीसरा रोज़ा, चौथा हज और पांचवां ज़कात। यदि कोई व्यक्ति मुसलमान होकर इस सब पर अमल न करे, तो वह अपने मजहब के लिए झूठा है।

रमज़ान का इतिहास- रमज़ान इस्‍लाम कैलेंडर का नवां महींना होता है। रमज़ान का मतलब होता है प्रखर। सन् 610 में लेयलत उल-कद्र के मौके पर जब मुहम्‍मद साहब को कुरान शरीफ के बारे में पता चला, तभी इस महीने को पवित्र माह के रूप में मनाया जाने लगा।

क्‍या कहते हैं मौलाना साहब- रमजान की फ़ज़ीलत पर रौशनी डालते हुए मुस्लिम धर्म गुरु लखनऊ के मौलाना यासूब अब्बास कहते हैं कि ये महिना अल्लाह का है जिसे रूह हुल्लाह खैरुल्लाह भी कहते हैं। ये महिना नेमतों का महिना है, बरकतों का महिना है, अजमतों का महिना है। इस महीने में अल्लाह अपने बन्दों के लिए बरकतों के दरवाज़े खोलता है। इस महीने में अल्लाह सबको रिज्क देता है, उनके सभी गुनाह- गुनाहे कबीरा, गुनाहे सगीरा माफ़ करता है, मौलाना ने ये भी कहा कि अल्लाह ने अपनी किताब में फ़रमाया है कि उसके नेक बन्दे जितना हो सके अपनी नफ्ज़ पर कंट्रोल रखें,ऐसा करके उन बन्दों का शुमार अल्लाह के करीबियों में उनके मेहबूबों में होगा।

फितरे के सवाल पर जानकारी देते हुए मौलाना ने कहा कि इस रमजान महीने के अंत में दिया जाने वाला फितरा एक तरह का टोकन अमाउंट होता है जो उस इंसान को ये बताता है कि अल्लाह की नज़र में सब बराबर हैं। जब कोई अमीर आदमी ये टोकन अमाउंट अपने ख़ुदा की तरफ से किसी ग़रीब हो देता है तब उसे ये एहसास होता है कि आख़िर भूख क्या होती है भूख का एहसास क्या होता है , अल्लाह अमीर बन्दे को इस टोकन के ज़रिये एक ग़रीब का दरवाज़ा दिखाता है, इस टोकन का पैगाम ये है कि इस दुनिया में कोई भी ग़रीब नहीं है कोई भी बेसहारा नहीं है अल्लाह सबके साथ है। साथ ही मौलाना यासूब अब्बास ने ये भी कहा कि अगर आज इंसान इन सब बातों को मान ले तो इस दुनिया में कोई भी ग़रीब और बेसहारा नहीं रहेगा और सब तरफ अमन और सुकून रहेगा।

धूम-धाम से मनाया जाता है रमज़ान

भारत समेत दुनिया भर में रमज़ान के महीने की धूम देखी जाती है। अगर भारत की बात करें तो यहां कश्‍मीर से लेकर कन्‍याकुमारी तक हर जगह रमज़ान के महीने में बाजारों में रौनक बनी रहती है। खास तौर से पुरानी दिल्‍ली, हैदराबाद और लखनऊ में रमज़ान के महीने में रात के वक्‍त भी बाजार गुलज़ार रहते हैं। एक से एक बेहतरीन पकवान और रोज़ा इफ्तार के वक्‍त मेल-मिलाप का अनोखा संगम देखने को मिलता है। खास बात यह है कि कई शहरों में रमज़ान के मौके पर तमाम हिन्‍दू अपने मुस्लिम भाईयों के लिये इफ्तार पार्टी का आयोजन भी करते हैं।

तस्‍वीरों के साथ पढ़ें रोज़े में क्‍या करें क्‍या न करें

बुराई से दूर रहें

बुराई से दूर रहें

रोज़ा यानी संयम। यानि आप कितना संयम बरत सकते हैं, इस बात की परीक्षा इस दौरान होती है। तमाम बुराइयों से दूर रहना चाहिये। गलत या बुरा नहीं बोलना, आंख से गलत नहीं देखना, कान से गलत नहीं सुनना, हाथ-पैर तथा शरीर के अन्य हिस्सों से कोई नाजायज़ अमल नहीं करना।

स्‍त्री को गलत नीयत से न देखें

स्‍त्री को गलत नीयत से न देखें

रोज़े के दौरान किसी भी स्‍त्री को गलत नियत से नहीं देख सकते हैं। यहां तक अपनी पत्नी तक को नहीं। पत्‍नी के लिये मन में कामवासना नहीं जागनी चाहिये। गैर औरत के बारे में तो ऐसा सोचना ही हराम है।

लड़ाई-झगड़ों से दूर रहें

लड़ाई-झगड़ों से दूर रहें

रोज़े में दिन भर भूखा व प्यासा ही रहा जाता है, जिससे इन्सान में एक वक्ती कमज़ोरी आ जाती है और वह किसी भी हैवानी काम के विषय में नहीं सोचता, शोर नहीं मचाता, हाथापाई नहीं करता इत्यादि। जिस स्‍थान पर ऐसा हो रहा हो, वहां रोज़ेदार के लिए खड़ा होना मना है।

नेक काम करें

नेक काम करें

रमज़ान के माह में मुसलमान के हर नेक अमल यानी पुण्य के कामों का सबाव 70 गुना बढ़ा दिया जाता है। 70 गुना अरबी में मुहावरा है, जिसका मतलब होता है बेशुमार। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने पुण्य के कामों में अधिक से अधिक हिस्सा लेना चाहिये।

दान पुण्‍य करें

दान पुण्‍य करें

ज़कात इसी महीने में अदा की जाती है। यदि कोई व्यक्ति अपने माल की ज़कात इस महीने में निकालता है तो उसको 1 रुपये की जगह 70 रुपये अल्लाह की राह में देने का पुण्य मिलता है।

झूठ मत बोलें

झूठ मत बोलें

रोज़े के वक्‍त झूठ नहीं बोलना चाहिये। हिंसा, बुराई, रिश्वत तथा अन्य तमाम गलत कामों से दूर रहना चाहिये। इसकी मश्क यानी (अभ्यास) पूरे एक महीना कराया जाता है ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचे और इंसान से हमदर्दी का भाव रखे।

नशा मत करें

नशा मत करें

शराब का सेवन इस्‍लाम में हराम है। रमजान पाक में के दौरान इसके अलावा भी कोई भी नशा सिगरेट, बीड़ी, तम्‍बाकू, आदि हराम है।

अल्‍लाह का नाम लें

अल्‍लाह का नाम लें

कुरआन में अल्लाह ने फरमाया कि रोज़ा तुम्हारे ऊपर इसलिए फर्ज़ किया है, ताकि तुम खुदा से डरने वाले बनो और खुदा से डरने का मतलब यह है कि इंसान अपने अंदर विनम्रता तथा कोमलता पैदा करे और खुद को हर पल खुदा का मोहताज़ समझता रहे। वह समझे कि मैं तो कुछ भी नहीं, एक रोज़ फना हो जाऊंगा। यह तो सब अल्लाह ही का करम है कि सांस ले रहा हूं, चल फिर रहा हूं, कामकाज कर रहा हूं और इस काबिल हूं कि लोगों की मदद कर सकता हूं।

कलमा पढ़ते रहें

कलमा पढ़ते रहें

कलमा- ला इलाहा इलल ला मोहम्‍मदुर रसूलुल्‍लाह। हदीसों में इसको सबसे अच्‍छा जिक्र माना गया है। अगर सातों आसमान, सातों ज़मीन और उनके आबाद करने वाले (यानी सारे इंसान और जिन्‍नात), सारे फरिश्‍ते, चांद-सूरज, सारे पहाड़, सारे समुद्र तराजू के एक पलड़े में रख दिए जाएं और एक तरफ यह कलमा रख दिया जाए तो कलमे वाला हिस्‍सा भारी पड़ जाएगा। इसलिए यह कलमा चलते-फिरते, उठते-बैठते पढ़ते रहें।

अस्‍तग़फार

अस्‍तग़फार

हदीसों के मुताबिक इस मुबारक महीने में व्‍यक्ति को ज्‍यादा से ज्‍यादा अस्‍तग़फार करना चाहिये। अस्‍तग़फार यानी अपने गुनाहों से तौबा करनी चाहिये। जब आदमी गुनाह करता है तो एक काला नुक्‍ता उसके दिल पर लग जाता है। अगर तौबा कर लेता है तो वह धूल जाता वर्ना बाकी रहता है।

जन्‍नत में जाने की दुआ करें

जन्‍नत में जाने की दुआ करें

जहन्‍नुम के अज़ाब से बचें और जन्‍नत में जाने की दुआ करें। हम जब भी अल्‍लाह से जन्‍नत की दुआ करें तो जन्‍नतुल फिरदोस मांगे क्‍योंकि जन्‍नत के भी कई दर्जें होते हैं और सबसे ऊंचा दर्जा जन्‍नतुल फिरदौस है।

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