Raksha Bandhan 2025: क्यों बांधते हैं भाभी को राखी? क्या है 'लूंबा राखी' का मतलब?
Raksha Bandhan 2025: भाई-बहन के प्रेम का पर्व रक्षा बंधन आज पूरे भारत में बडे ही उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। सावन की पूर्णिमा के दिन मनाए जाने वाले इस त्योहार का इंतजार भाई-बहन बड़ी ही शिद्दत के साथ करते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि राखी पर कुछ जगहों पर भाई के साथ-साथ 'भाभी' को भी राखी बांधी जाती है।
मु्ख्य तौर पर राजस्थान और गुजरात में भाई के साथ-साथ 'भाभीसा' यानी कि 'भाभी' को ननद (भाई की बहन) राखी बांधती है। जिसे कि 'लूंबा राखी' कहा जाता है,जो कि आम तौर पर 'चूड़ी' या 'कंगन' की तरह होती है।

यह परंपरा विशेष रूप से उन परिवारों में निभाई जाती है जहां बहनें चाहती हैं कि उनके भाई का जीवनसाथी भी उनकी शुभकामनाओं का हिस्सा बने, भाभी को राखी बांधने से भाभी-ननद के बीच प्रेम और गहरा हो जाता है। ये रिश्ते की मजबूती, समर्पण और आपसी प्रेम का सूचक है जो कि ये बताती है कि 'भाभी' न केवल परिवार की 'बहू' हैं, बल्कि एक बहन के समान स्थान भी रखती हैं।
रक्षा बंधन की तिथि और मुहूर्त (Raksha Bandhan 2025)
- पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 8 अगस्त को दोपहर 2:12 PM से हुई थी।
- पूर्णिमा तिथि का अंत 9 अगस्त को दोपहर 1:24 PM पर होगा।
- उदया तिथि मान्य होने के कारण रक्षा बंधन 9 अगस्त 2025 यानी कि आज है।
Raksha Bandhan 2025 का मुहूर्त
9 अगस्त को 5 बजकर 47 AM से दोपहर के 1 बजकर 24 PM तक है।
राखी बांधते वक्त करें इस मंत्र का जाप
येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल: तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:'
Aarti Kunj Bihari Ki ( आरती कुंज बिहारी की)
- आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की
- गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
- श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
- आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
- गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
- लतन में ठाढ़े बनमाली; भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,
- ललित छवि श्यामा प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की।
- आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
- कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
- गगन सों सुमन रासि बरसै; बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग;
- अतुल रति गोप कुमारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
- आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
- जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा।
- स्मरन ते होत मोह भंगा; बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच;
- चरन छवि श्रीबनवारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
- आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
- चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।
- चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू; हंसत मृदु मंद,चांदनी चंद, कटत भव फंद।।
- टेर सुन दीन भिखारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
- आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
- आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
- आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
Disclaimer: इस आलेख का मतलब किसी भी तरह का अंधविश्वास पैदा करना नहीं है। यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। वनइंडिया लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है इसलिए किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले कृपया किसी जानकार ज्योतिष या पंडित की राय जरूर लें।












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