Pitru Paksha 2023: जानिए गया और ब्रह्मकपाली में श्राद्ध का महत्व

Pitru Paksha 2023: पितरों की तृप्ति और उनकी प्रसन्नता के लिए आश्विन मास के पूरे कृष्णपक्ष में श्राद्ध किया जाता है। अब अक्सर लोग यह प्रश्न पूछते हैं कि गयाजी में श्राद्ध करने के बाद पितरों का वार्षिक श्राद्ध या पितृपक्ष में उनका श्राद्ध करना चाहिए या नहीं। अनेक विद्वान यह कह देते हैं कि एक बार गयाजी में श्राद्ध कर दिया तो फिर वार्षिक या पितृपक्ष में श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती।

Pitru Paksha 2023:

अनेक लोग यह प्रश्न भी पूछते हैं कि गयाजी में श्राद्ध करने के बाद बदरीनाथ स्थित ब्रह्मकपाली में श्राद्ध करना चाहिए या नहीं। तो ऐसे ही कुछ प्रश्नों के उत्तर शास्त्रों के आधार पर यहां देने का प्रयास किया है।

श्रीमद्देवीभागवत 6-4-15 के अनुसार गयाजी में श्राद्ध करने की बड़ा महत्व है-

  • जीवतो वाक्यकरणात् क्षयाहे भूरिभोजनात् ।
  • गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिर्पुत्रस्य पुत्रता ।।

अर्थात्- जीवनपर्यन्त माता-पिता की आज्ञा का पालन करने, श्राद्ध में खूब भोजन करवाने और गयातीर्थ में पितरों का पिण्डदान अथवा गया में श्राद्ध करने वाले पुत्र का पुत्रत्व सार्थक है। जो व्यक्ति गया जाने में समर्थ होते हुए भी नहीं जाता है उसके पितर सोचते हैं कि उनका संपूर्ण परिश्रम निरर्थक है। अत: मनुष्य के पूरे प्रयत्न के साथ गया जाकर विधि विधान से पिंडदान करना चाहिए।

पितृपक्ष में तिथि श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं

अब शास्त्र कहते हैं कि कुछ लोगों में यह भ्रम है कि गया में पितरों का श्राद्ध करने के बाद वार्षिक श्राद्ध या पितृपक्ष में तिथि श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं है, जबकि यह पूर्णतया गलत है। गया श्राद्ध तो नित्य श्राद्ध है और इसे एक बार से अधिक बार भी गया जाकर किया जा सकता है। गयाजी में पितरों का श्राद्ध करने के बाद भी घर में वार्षिक क्षय तिथि पर तथा पितृपक्ष में तिथि पर श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। इसे छोड़ा नहीं जाता।

गयाजी और ब्रह्मकपाली में श्राद्ध पर विचार

बदरीनारायण में जिस जगह ब्रह्मा का सिर कटकर गिरा था उस स्थान को ब्रह्मकपाली कहा जाता है। प्रारंभ में ब्रह्माजी के पांच सिर थे जिनमें से एक शिवजी ने काट दिया था और वह सिर जिस स्थान पर गिरा उसे ब्रह्मकपाली कहा जाता है। यह स्थान बदरीनारायण धाम में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है। ब्रह्मा का सिर काटने से शिवजी को ब्रह्महत्या का पाप लगा था और वे इसी स्थान पर ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हुए थे।

ब्रह्मकपाली श्राद्ध करने का अंतिम स्थान

शास्त्रों का कथन है कि ब्रह्मकपाली श्राद्ध करने का अंतिम स्थान होता है। जिन पितरों को गयाजी में भी मुक्ति नहीं मिलती उन्हें ब्रह्म कपाली में मुक्ति मिल जाती है। शास्त्र कहते हैं कि जो मनुष्य ब्रह्म कपाली में पिंडदान करने की सामर्थ्य रखते हुए भी गयाजी में श्राद्ध करके संतुष्ट हो जाता है उसके पितरों का अध:पतन होता है। इसलिए गयाजी में श्राद्ध करने के बाद ब्रह्म कपाली में श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। किंतु एक बार यदि ब्रह्म कपाली में श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण आदि कर दिया तो फिर गयाजी में नहीं करना चाहिए।

ब्राह्मण भोजन, दान आदि कर्म करते रहना चाहिए

मुख्य बात यह है कि गयाजी में श्राद्ध करने के बाद ब्रह्म कपाली में श्राद्ध अवश्य करना चाहिए, किंतु ब्रह्मकपाली में श्राद्ध करने के बाद गयाजी या अन्य जगह श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। किंतु पितरों की क्षय तिथि और श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त ब्राह्मण भोजन, दान आदि कर्म करते रहना चाहिए, केवल पिडंदान आदि की मनाही है।

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