Navratri 2019: जब चंडिका-चामुण्डा ने किया रक्तबीज का रक्तपान
नई दिल्ली। चंड-मुंड के वध के उपरांत देवी महात्म्य में जिस महादुष्ट और महामायावी असुर का वर्णन मिलता है, वह है रक्तबीज। रक्तबीज को वरदान मिला था कि धरती पर जहां भी उसके रक्त की एक बूंद गिरेगी, वहां एक और रक्तबीज पैदा हो जाएगा। इस तरह रक्तबीज जैसे मायावी राक्षस का अंत कर पाना किसी के वश की बात नहीं थी। यही कारण है कि उसके विनाश के लिए देवी चामुंडा और मां चंडिका ने ऐसा वीभत्स युद्ध किया कि उस भयंकर दृश्य को देखकर देवता भी अपने होश खो बैठे, चंड-मुंड के वध का समाचार सुनकर दैत्यराज शुंभ यह समझ गया कि अब तक जिसे वह एक अबला नारी मानकर चल रहा था, वास्तव में वह प्रचंड शक्ति का स्रोत है और उसे वश में करना आसान नहीं है।

मायावी लोक
इसीलिए शुंभ ने अपने मायावी लोक में सुप्तावस्था में निवास कर रहे असुर रक्तबीज का आवाहन किया। रक्तबीज अर्थात जिसका रक्त ही उसका बीज है, जिसके रक्त की एक बूंद नया रक्तबीज उत्पन्न करने की क्षमता रखती थी। दैत्यराज द्वारा ऐसे महामायावी असुर के साथ बड़ी सेना को भेजकर मां काली को वश में करने की योजना बनाई गई।

रक्तबीज महाशक्तिशाली योद्धा
रक्तबीज महाशक्तिशाली योद्धा भी था और बहुत विशाल सेना लेकर आया था। इसीलिए उससे मुकाबला करने के लिए सभी भगवान और देवों ने अपनी शक्ति से एक-एक देवी को उत्पन्न किया और उन्हें अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित कर युद्ध में मां काली की मदद के लिए भेजा। इस क्रम में ब्रह्मा की ब्रह्माणी, विष्णु की वैष्णवी, कार्तिकेय की जगदम्बा, यज्ञवराह की वराही और नृसिंह की नारसिंही शक्ति आदि अनेकांे देवीस्वरूपों ने युद्ध में असुरों पर एक साथ आक्रमण किया। इसी क्रम में जब सभी मातृशक्तियों ने रक्तबीज पर प्रहार करना शुरू किया, तो उसके शरीर से गिरती रक्त की प्रत्येक बूंद के साथ एक नया रक्तबीज प्रकट होने लगा।

पूरा युद्ध क्षेत्र
देखते ही देखते पूरा युद्ध क्षेत्र अनेकानेक रक्तबीजों से पट गया, जो मुख्य रक्तबीज के समान ही महापराक्रमी और मायावी थे। इस समस्या से पार पाने के लिए मां चंडिका ने चामुण्डा को आदेश दिया कि वे अपना मुख फैलाएं और रक्तबीज का सिर कटते ही उसका सारा रक्त पी जाएं और मांस भी ना छोडें। देवी चंडिका की आज्ञा पाकर चामुण्डा ने अपना आकार कई गुना बढ़ा लिया और दोनों ने मिलकर रक्तबीज का महासंहार प्रारंभ किया।

रक्तबीज का सिर काटना शुरू किया
देवी चंडिका ने अपने फरसे से रक्तबीज का सिर काटना शुरू किया और देवी चामुण्डा ने रक्त समेत रक्तबीज को अपना आहार बनाना प्रारंभ कर दिया। इस तरह दोनों देवियों के महापराक्रम से रक्तबीज का अंत हुआ।

सीख
देवी के इस स्वरूप की कथा से युद्ध कौशल और कठिन परिस्थितियों में त्वरित निर्णय लेने की प्रेरणा मिलती है। मनुष्य के जीवन में चाहे कैसी भी विकट स्थिति क्यों न आ जाए, उसका कहीं न कहीं हल अवश्य होता है। हार मानकर बैठ जाने से संकटों को हराया नहीं जा सकता। संयम, धैर्य के साथ काम लिया जाए तो हर मुश्किल से पार पाया जा सकता है।
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