क्या होता है खलयज्ञ? कौन और कैसे किया जाता है?

नई दिल्ली, 19 जुलाई। महर्षि पराशर ने अपने ज्ञान और दिव्य दृष्टि के माध्यम से अनेक ग्रंथों की रचना की है। उन्हीं में से एक ग्रंथ है कृषि पराशर। इस ग्रंथ में कृषि से संबंधित अनेक नियमों और कृषि के विभिन्न माध्यमों, तरीकों का वर्णन किया गया है। उनमें खलयज्ञ का भी वर्णन मिलता है। यह खलयज्ञ क्या होता है? कौन इसे करता है? खलयज्ञ क्यों किया जाना चाहिए?, आइए विस्तार से जानते हैं।

क्या होता है खलयज्ञ? कौन और कैसे किया जाता है?

महर्षि पराशर खलयज्ञ के बारे में लिखते है। किवृक्षों को काटने, पृथ्वी को जोतने, गोड़ने तथा इन कर्मो को करते समय जो कृमि कीट आदि अनेक सूक्ष्म जीव मर जाते हैं, उनके पाप से मुक्ति के लिए खेती करने वाले को खलयज्ञ करना चाहिए।

पराशर स्मृति के द्वितीय अध्याय का पंद्रहवां श्लोक कहता है-

  • वृक्षं छित्वा महीं भित्वा हत्वा च कृमिकीटकान् ।
  • कर्षक: खलयज्ञेन सर्वपापै: प्रमुच्यते ।।

महर्षि पराशर कहते हैं यह यज्ञ फसल कटने के बाद अन्न की राशि से खलिहान में ही किया जाता है। इसमें विशेष रूप से कृषि द्वारा प्राप्त अन्न की राशि से सर्वप्रथम सुपात्र ब्राह्मणों को दान करें, राजा को खेती का छठा भाग दें तथा देवताओं के निमित्त प्रदान करें, साथ ही कृषि कार्य में सहायक सेवकों तथा याचकों को अन्न देकर शेष अन्न घर में लाना चाहिए। ऐसा करने से वह किसान कृषि कर्म जन्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है और उसका अन्न हविष्यरूप हो जाता है।

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