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Maa Kalratri ki Katha: नवरात्रि के सातवें दिन करें किस कथा का पाठ? मां कालरात्रि करेंगी हर भय का नाश

Maa Kalratri Katha: शारदीय नवरात्रि का हर दिन मां दुर्गा के अलग-अलग रूप को समर्पित होता है। सप्तमी तिथि का महत्व सबसे अलग और अद्भुत माना जाता है। इस दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है, जो दुर्गा जी की सातवीं शक्ति हैं। वो अपने भक्तों को सभी भय और नकारात्मकताओं से मुक्त करती हैं।

माता कालरात्रि का स्वरूप भयंकर लगता है, लेकिन उनके हृदय में अपने भक्तों के प्रति अपार करुणा और शक्ति है।मान्यता है कि जो भी भक्त इस दिन विधि-विधान के साथ उनकी पूजा करता है, उसका जीवन भयमुक्त, रोगमुक्त और समृद्धि से भरा रहता है। सप्तमी के दिन मां के दर्शन और पूजा से मानसिक स्थिरता, साहस और आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

Maa Kalratri ki Katha in Hindi

इस दिन विशेष रूप से उनके मंत्रों, कथा और भोग का महत्व है। माता कालरात्रि की कथा में यह बताया गया है कि उन्होंने रक्तबीज और शुंभ-निशुंभ जैसे शक्तिशाली राक्षसों का संहार कर तीनों लोकों की रक्षा की थी। इस साल सप्तमी तिथि 29 सितंबर को है और इस दिन मां कालरात्रि की आराधना की जाएगी।
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मां कालरात्रि की महिमा

माता कालरात्रि को मां दुर्गा की सातवीं शक्ति कहा जाता है। इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है क्योंकि यह अपने भक्तों को शुभता और समृद्धि प्रदान करती हैं। मां की कृपा से भक्तों को सिद्धियां प्राप्त होती हैं और उनका जीवन भयमुक्त रहता है।

पूजा विधि

  • सप्तमी के दिन सुबह सूर्योदय से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  • पूजा स्थल पर माता की प्रतिमा या चित्र को गंगाजल से स्नान कराएं।
  • मां को कुमकुम, रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।
  • धूप और दीप जलाकर माता की आराधना करें।
  • दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती और कालरात्रि मंत्र का पाठ करें।
  • पूजा के अंत में मां को गुड़ या गुड़ से बने पदार्थ और चने का भोग लगाएं।

सप्तमी की पौराणिक कथा (Navratri Saptami Maa Kalratri ki Katha)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक समय शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज जैसे राक्षसों ने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया था। उनकी शक्ति इतनी बढ़ गई थी कि देवता भी भयभीत हो गए। तब भगवान शिव ने इस संकट का समाधान खोजने के लिए माता पार्वती से आग्रह किया।

माता ने दुर्गा का रूप धारण कर शुंभ और निशुंभ का वध किया। लेकिन रक्तबीज का वध करना कठिन था, क्योंकि उसे वरदान था कि उसके रक्त की हर बूंद से एक नया राक्षस जन्म लेगा। तब माता ने अपने तेज से कालरात्रि का रूप लिया।

मां कालरात्रि ने रक्तबीज के रक्त को जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुंह में भर लिया और अंत में उसका वध कर दिया। इस प्रकार माता ने देवताओं और मनुष्यों को इस संकट से मुक्त किया।

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