Somvati Amavasya: आज है वट सावित्री पूजा, जानिए सोमवती अमावस्या का महत्व
Somvati Amavasya: ज्येष्ठ मास में इस बार दो दिन अमावस्या पड़ रही है। एक दिन सोमवती अमावस्या और दूसरे दिन भौमवती अमावस्या का संयोग बनेगा। 26 और 27 मई 2025 को अमावस्या है। दरअसल अमावस्या तिथि आज दोपहर 12:12 बजे से प्रारंभ होकर 27 मई को प्रात: 8:32 बजे तक रहेगी।
इसलिए पितृ कार्यों के लिए सोमवती अमावस्या और वट सावित्री पूजा दोनों आज है जबकि कल यानी कि 27 मई को ज्येष्ठी अमावस्या, भौमवती अमावस्या और शनि जयंती है।

सोमवती अमावस्या
अमावस्या जब सोमवार के दिन पड़ती है तो इसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। सोमवती अमावस्या के दिन शिवजी का पूजन तो किया ही जाता है, पितृ कार्यों के लिए भी यह अमावस्या श्रेष्ठ होती है। सोमवती अमावस्या का उल्लेख महाभारत और पुराणों में भी मिलता है।
एक कथा के अनुसार, महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को बताते हैं कि सोमवती अमावस्या के दिन गंगा स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति इस दिन व्रत और तर्पण करता है, वह पितरों को तृप्त करता है और स्वयं भी उत्तम लोक को प्राप्त करता है। सोमवती अमावस्या के दिन पितरों की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान आदि किए जाते हैं।
भौमवती अमावस्या
मंगलवार को आने वाली अमावस्या भौमवती अमावस्या कहलाती है। भौमवती अमावस्या का दिन ऋण मुक्ति के लिए होता है। मनुष्य पर देव ऋण, पितृ ऋण और ऋषि ऋण हाते हैं। इन तीनों ऋणों का भार कम करने के लिए भौमवती अमावस्या का व्रत किया जाता है। इसके अलावा मनुष्य पर जो धन का ऋण होता है, कर्ज होता है उससे मुक्ति के लिए भी भौमवती अमावस्या का व्रत किया जाता है।
वट सावित्री अमावस्या
ज्येष्ठ अमावस्या के दिन वट सावित्री अमावस्या होती है। इस दिन स्त्रियां अपने परिवार की सुख शांति और पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखकर वटवृक्ष की पूजा करती हैं। इस दिन सती सावित्री ने अपने पति के प्राण यमराज से वापस लाकर उन्हें जीवित किया था, इसलिए वट सावित्र व्रत रखा जाता है। इस दिन वट वृक्ष का पूजन करके उसकी परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत लपेटा जाता है। यह व्रत 26 मई को किया जाएगा।
शनि जयंती
ज्येष्ठ मास की अमावस्या के दिन शनि जयंती भी होती है। शनि जयंती सूर्योदय व्यापिनी तिथि में की जाती है। इसलिए इस बार शनि जयंती 27 मई को की जाएगी। इस दिन कर्म फलदाता शनिदेव का जन्मोत्सव मनाया जाता है। शनि मंदिरों में विशेष आयोजन होते हैं। शनि की पीड़ा से मुक्ति के लिए शनिदेव का तैलाभिषेक किया जाता है।












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