कई रंगो को समेटे हुए है मगध की "बुढवा" होली

इस दिन मगध के औरंगाबाद, गया, जहानाबाद, नवादा, अरवल के आसपास के सभी जिलों में बुढ़वा होली का चलन बरसो पुराना है। हालाकि बुढवा होली मनाए जाने का कोई प्रमाण तो नहीं है पर इस दिन हर घर में कुलदेवता की पूजा की जाती है। एक समय था जब बुढवा होली केवल गांवों में मनाई जाती थी मगर अब इसका चलन शहर में भी हो गया है।
बुढवा होली के दिन गांव के स्त्री पुरुष अलग-अलग टोली बनाकर शाम के समय एक दूसरे के घर जाते है, पूरे गांव में फाग गीत गाए जाते हैं। कहा जाता है एक बार मगध के जमींदार होली के दिन बीमार पड़ गए थे। जमींदार जब दूसरे दिन स्वस्थ हुए तो उनके दरबारियों ने होली फीकी रहने की चर्चा की। जमींदार ने दूसरे दिन भी होली खेलने की घोषणा कर दी।
इसके बाद मगध की धरती पर बुढ़वा होली मनाने की परम्परा शुरू हो गई। जो आज तक मनाई जा रही है। खैर कारण जो भी हो मगर इस दिन पूरे मगध में छ़ुट्टी सा नजारा रहता है।












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