कई रंगो को समेटे हुए है मगध की "बुढवा" होली

Holi
"रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे" अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍म सिलसिला का यह गाना तो आप सबने सुना होगा, खासकर होली के दिनों मे हर गली मोहल्‍ले में यह गाना आम हो जाता है। हो भी क्‍यों न होली त्‍योहार ही ऐसा है, वैसे तो इस दिन पूरा देश होली के आगोश में डूबा रहता है। एक तरफ जहां ब्रज के बरसाना गाँव में लठमार होली होती है वहीं मगध में बुढवा होली मनाई जाती है।

इस दिन मगध के औरंगाबाद, गया, जहानाबाद, नवादा, अरवल के आसपास के सभी जिलों में बुढ़वा होली का चलन बरसो पुराना है। हालाकि बुढवा होली मनाए जाने का कोई प्रमाण तो नहीं है पर इस दिन हर घर में कुलदेवता की पूजा की जाती है। एक समय था जब बुढवा होली केवल गांवों में मनाई जाती थी मगर अब इसका चलन श‍हर में भी हो गया है।

बुढवा होली के दिन गांव के स्‍त्री पुरुष अलग-अलग टोली बनाकर शाम के समय एक दूसरे के घर जाते है, पूरे गांव में फाग गीत गाए जाते हैं। कहा जाता है एक बार मगध के जमींदार होली के दिन बीमार पड़ गए थे। जमींदार जब दूसरे दिन स्वस्थ हुए तो उनके दरबारियों ने होली फीकी रहने की चर्चा की। जमींदार ने दूसरे दिन भी होली खेलने की घोषणा कर दी।

इसके बाद मगध की धरती पर बुढ़वा होली मनाने की परम्परा शुरू हो गई। जो आज तक मनाई जा रही है। खैर कारण जो भी हो मगर इस दिन पूरे मगध में छ़ुट्टी सा नजारा रहता है।

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