परिश्रम के साथ धैर्य भी है जरूरी, जानिए इसके पीछे का कारण

नई दिल्ली। हर व्यक्ति जीवन में सफलता अर्जित करना चाहता है। संसार में जितने व्यक्ति, उतने ही सपने और उतने ही लक्ष्य होते हैं, किंतु सफलता प्राप्ति का एक ही उपाय है, अपने लक्ष्य पर डटे रहना और लगातार परिश्रम करते रहना। कई बार ऐसा भी होता है कि लाख प्रयत्न करने पर भी सफलता नहीं मिलती। ऐसी स्थिति में मन में उदासी आना, आत्मविश्वास कम होना बड़ी स्वाभाविक स्थितियां हैं, लेकिन हार मानकर राह छोड़ देना या फिर बार बार अपना लक्ष्य बदल लेना कोई हल नहीं है।

परिश्रम के साथ धैर्य भी है जरूरी, जानिए इसके पीछे का कारण

इस तरह से केवल भटकाव या भ्रम ही हासिल होता है और भटकने वाला व्यक्ति कभी किसी लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता। वह उसी बिंदु पर लौैट लौट कर आता है, जहां से चला था। जब कभी जीवन में ऐसी परिस्थितियों से आपका सामना हो, तो एक मूलमंत्र अवश्य याद रखें कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। हमारे पूर्वज इस तरह के जितने भी कथन कह गए हैं, वे बेमतलब नहीं हैं, बल्कि अपने भीतर एक गहरी बात, एक गहरी आस बसाए हुए हैं।

ये बात कितनी सही है, इस कथा से समझते हैं..

एक समय किसी गांव में दो भाई रहते थे। दोनों की अपनी अपनी खेती थी, पर पानी की तंगी थी। दोनों ने अपने गांव के बुजुर्गों से सलाह मांगी। सबने कहा कि अपने खेत में कुएं खुदवा लो। मजदूर लगाने के लिए दोनों भाइयों के पास पैसे नहीं थे और पूरा दिन तो खेतों में काम करते ही निकल जाता था। एक दिन दोनों भाइयों ने तय किया कि वे रोज एक घंटा अतिरिक्त काम कर अपने अपने खेत में कुआं खोद लेते हैं। दोनों ने रोज शाम को खेत का काम खत्म होने के बाद एक घंटा कुएं की खुदाई में लगाना शुरू किया।

परिश्रम के साथ धैर्य भी है जरूरी, जानिए इसके पीछे का कारण

कुछ दिन की खुदाई के बाद दोनों के ही गड्ढों में पत्थर दिखाई पड़े। जब कई दिन खुदाई के बाद भी पत्थर निकलना बंद ना हुए, तो एक भाई ने कहा कि यहां कुआं खोदना बेवकूफी होगी। इससे अच्छा है कि हम कुएं की जगह बदल लें। दूसरा भाई उससे सहमत ना हुआ। उसने कहा कि एक ही जगह पर मेहनत करते रहेंगे, तो कभी तो पानी निकलेगा। क्या पता, जगह बदलने पर भी पत्थर ही निकले, तो? पहले भाई ने बात ना मानी और कुएं की जगह बदल ली। कुछ दिनों बाद दूसरी जगह से भी पत्थर निकलने लगे। यह देख उसने तीसरी जगह कुआं खोदना चालू किया और वहां भी कुछ दिन बाद पत्थर ही निकले। जगह बदलते हुए उसने अपने हिस्से की सारी जमीन खोद डाली, पर हर जगह पत्थर ही निकले।

पहला भाई बहुत पछताया

उधर, दूसरे भाई ने एक ही जगह पर खुदाई जारी रखी और अंततः उसके कुएं में झिर फूट ही पड़ी। अब पहला भाई बहुत पछताया। उसने कुएं के चक्कर में अपनी फसल भी बरबाद कर ली। अब उसकी समझ में आया कि यदि उसने भी एक ही जगह पर मेहनत की होती, तो आज उसे परेशानी ना उठाना पड़़ती।

असफलता से निराश ना हों, मैदान ना छोड़ें

यही स्थिति आज उन सभी व्यक्तियों की है, जो एक कार्य में असफल होते ही उसे छोड़कर दूसरे कार्य में लग जाते हैं और यह सिलसिला कहीं रूकता नहीं है। जब समय निकल जाता है, तो वे पाते हैं कि उनके हाथ तो खाली रह गए। हर दिशा में भटकने के चक्कर में वे कहीं नहीं पहुंच पाए। इसीलिए यह बात ध्यान में रखें, असफलता से निराश ना हों, मैदान ना छोड़ें। अपनी इच्छित दिशा में चलते रहें, आज नहीं तो कल मंजिल आपको जरूर मिलेगी।

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