Ganesha Chaturthi 2022 : गणपति के 'षडक्षर मंत्र' के प्रभाव से इंद्र को प्राप्त हुए थे एक हजार नेत्र

नई दिल्ली, 27 अगस्त। प्रथम पूज्य देव भगवान श्री गणेश सिद्धि-बुद्धि प्रदाता तो हैं ही, वे समस्त संकटों का नाश भी करने वाले हैं। भगवान गणेश के मंत्रों का वैदिक, पौराणिक काल में चिकित्सा के रूप में भी उपयोग किया जाता था। साथ ही उनके मंत्र समस्त दोषों, पापों का शमन करने वाले होते हैं। आज भी जो भक्त सच्ची श्रद्धा और विश्वास से भगवान गणेश के मंत्रों का जाप करता है उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ऐसा ही एक मंत्र है गणेश षडक्षर मंत्र। इस मंत्र का नित्य जाप करने से बड़ी से बड़ी परेशानी भी दूर हो जाती है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है। इस मंत्र को वैसे को किसी भी समय अपनी कामना की पूर्ति के लिए जपा जा सकता है किंतु भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से चतुर्दशी तक जाप करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है। इस मंत्र के प्रभाव से देवराज इंद्र को एक हजार नेत्रों की प्राप्ति हुई थी।

Ganesha Chaturthi 2022 : गणपति के षडक्षर मंत्र के प्रभाव से इंद्र को प्राप्त हुए थे एक हजार नेत्र

षडक्षर मंत्र

वक्रतुण्डाय हुं

कैसे करें जप

गणपति के षडक्षर मंत्र का जाप संकल्पपूर्वक भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी तक करना चाहिए। इसके लिए नित्य प्रात: स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करके किसी गणेश मंदिर में या अपने घर के पूजा स्थान में आसन बिछाकर बैठ जाएं। पूर्वाभिमुख होकर अपने सामने चौकी पर गणेशजी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। विधि से पूजन करें और षडक्षर मंत्र का जाप प्रारंभ करें। मंत्र जप स्फटिक, रुद्राक्ष या पारद की माला से किया जा सकता है। नियमानुसार जितने अक्षर का मंत्र होता है उतनी माला का जाप किया जाना चाहिए। यह मंत्र षडक्षर मंत्र है इसलिए छह माला मंत्र जाप करें। गणेशजी को दूर्वा सहित नैवेद्य अर्पित करें। प्रतिदिन छह माला जाप चतुर्दशी तक करें। अंतिम दिन दशांश हवन करें। ब्राह्मणों को भोजन करवाकर यथोचित दान देकर आशीर्वाद ग्रहण करें। आपकी इच्छित कामना शीघ्र पूरी होगी।

 षडक्षर मंत्र के प्रभाव से इंद्र को प्राप्त हुए थे एक हजार

कैसे मिले इंद्र को एक हजार नेत्र

पौराणिक कथा के अनुसार एक समय देवराज इंद्र महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या के रूप पर अत्यंत मोहित होकर काम पीड़ित हो गए। अहिल्या को प्राप्त करने के लिए वे अपनी शक्तियों के दम पर गौतम ऋषि का रूप धारण करके आश्रम पहुंच गए। उस समय गौतम ऋषि जप-ध्यान के लिए नदी के तट पर गए हुए थे। अहिल्या को अकेली पाकर इंद्र आश्रम में पहुंच गए और अहिल्या से रतिक्रीड़ा का निवेदन किया। अहिल्या ने प्रश्न किया किइतनी जल्दी वापस कैसे आ गए तो गौतम ऋषि रूप धरे इंद्रा ने कहा हे प्रिये मैं काम पीड़ा में जल रहा हूं इसलिए मंत्र जप में मेरा मन नहीं लगा। इस पर अहिल्या ने उन्हें स्वीकार किया किंतु इंद्र की देह की गंध से अहिल्या को शंका हुई तो उन्होंने क्रोधित होकर कहा बता दुष्ट तू कौन है जिसने मेरे प्रति का रूप धरकर पाप किया है। बता वरना शाप दे दूंगी। शाप के डर से इंद्र अपनी असली रूप में आ गया। इतने में गौतम ऋषि लौट आए। यह देखकर इंद्र भाग गया। अहिल्या गौतम ऋषि के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगी किंतु ऋषि ने शाप दे दिया कितू पत्थर हो जा। त्रेता युग में जब श्रीराम आएंगे तब उनके चरणों के स्पर्श से तू पुन: अपने असली स्वरूप में लौटेगी। इंद्र तो भाग गया था किंतु गौतम ऋषि ने उसे शाप दिया किइंद्र तू जहां भी छुपा है, जा तेरे शरीर पर सहस्त्र स्त्री योनि चिन्ह हो जाएंगे। शाप के कारण इंद्र के पूरे शरीर पर स्त्री योनी के चिन्ह बन गए। लज्जा के कारण इंद्र वीरबहूटी कीट बनकर कमलिनी की कली में छुप गया।

गौतम ऋषि से देवताओं ने की प्रार्थना

चूंकि इंद्र देवताओं का राजा था इसलिए उसके गायब हो जाने से सारी व्यवस्थाएं बिगड़ गई। इस पर समस्त देवता मिलकर गौतम ऋषि के पास गए और क्षमा याचना कर इंद्र को लौटाने की विनती करने लगे। देवताओं की बात मानकर गौतम ऋषि ने देवताओं से कहा किजाओ और जाकर इंद्र को गणपति के षडक्षर मंत्र का उपदेश दो। देवताओं ने गौतम ऋषि से मंत्र ग्रहण किया और इंद्र को उसका उपदेश दिया। इंद्र ने गणपति के मंत्र का जाप किया और उसके शरीर पर बने सहस्त्र योनि के चिन्ह सहस्त्र नेत्रों में परिवर्तित हो गए।

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