Deepdaan Importance: दीपदान का महत्व एवं विधि
लखनऊ। दीपक ज्ञान, प्रकाश, भयनाशक, विपत्तियों व अंधकार के विनाश का प्रतीक है। तन्त्र, मन्त्र व अध्यात्म में इसका विशिष्ट स्थान होता है। सात्विक साधना में घी का व तान्त्रिक कार्यो में तेल का दीपक जलाना चाहिए। दीपक की बत्ती भी पृथक्-पृथक् कार्यो हेतु पृथक्-पृथक् प्रयुक्त होती है। दीपक पात्र भी अपनी विशेष पहचान रखता है। मिटटी का दीपक सात्विक कार्यो में प्रयोग किया जाता है और धातु या अन्य किसी चीज का दीपक तान्त्रिक कार्यो में प्रयोग किया जाता है। दीपदान किसी भी विपत्ति के निवारणार्थ श्रेष्ठ उपाय है।
दीपदान काल
- ऋतु-दीपदान हेतु बसन्त, हेमन्त, शिशिर, वर्षा व शरद ऋतु उत्तम मानी गई है।
- मास-वैशाख, श्रावण, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन मास श्रेष्ठ है।
- पक्ष-शुक्ल पक्ष दीपदान के लिए अधिक उत्तम होता है।
- तिथि-प्रथमा, द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, द्वादशी, त्रयोदशी व पूर्णिमा तिथि दीपदान के लिए श्रेष्ठ होती है।
- नक्षत्र-इन नक्षत्रों में दीपदान करना चाहिए। जैसे-रोहिणी, आर्दा, पुष्य, तीनों उत्तरा, हस्त, स्वाती, विशाखा, ज्येष्ठा और श्रवण।
- योग-सौभाग्य, शोभन, प्रीति, सुकर्म, वृद्धि, हर्षण, व्यतीपात और वैधृत योगों में दीपदान करना ज्यादा लाभकारी रहता है।
- विशेषः-सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, संक्रान्ति, कृष्ण पक्ष की अष्टमी, नवरात्र एवं महापर्वो पर दीपदान करना विशेष फलदायक रहता है।
- दीपदान का समय-प्रातः, सायं, मध्यरात्रि तथा अन्य यज्ञकर्म की पूर्णाहूति से पूर्व।
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दीपदान की सामग्री
- कपिला गौ का गोमय।
- इमली और आॅवले का चूर्ण।
- कामना के अनुसार दीपपात्र।
- कामना के अनुसार घृत अथ्वा तेल।
- संकल्पानुसार बत्तियाॅ।
- आधार यन्त्र।
- अखण्ड चावल।
- लाल चन्दन।
- करबीर पाॅच पत्ती वाले।
- लाल फल।
- रेश्मी लाल वस्त्र।
- पंचगव्य। 1
- शलाका बत्ती जलाने के लिए।
- नारियल।
- बिल्वपत्र।
- चन्दन।
- ताॅबे का कलश।
- सुपारी।
- अष्टगंध।
- ऋतु फल।
- पंच पल्लव।
- कंकुम व सिन्दूर आदि पूजन सामग्री।
- ब्रहम्ण वरण सामग्री।
- दक्षिणा व नैवेद्य आदि।
- खैर की लकड़ी के बनी 8 कीले।
- एक हाथ लम्बा भैरव दण्ड।
- पकाये हुये चावल तथा छूरी-कटार आदि।
- यात्रा में सफलता के लिए 32 तोला घी व 32 तोला के धातु के पात्र से दीपदान करना चाहिए।
- ग्रह पीड़ा निवारण करने हेतु चैसठ तोला तेल से दीपदान करने से किसी भी प्रकार की ग्रह पीड़ा समाप्त हो जाती है।
- असाध्य रोग नाश के लिए अस्सी तोला तेल का दीपक 20 दिन जलाने से रोग का शमन हो जाता है।
- भूत-बाधा भगाने के लिए-एक पाव तेल का दीपक 21 दिन तक निरन्तर जलाने से भूत-बाधा दूर हो जाती है।
- अगर किसी जातक को राजभय है तो सवा पाव तेल का दीपक 40 दिन जलाने से राज भय समाप्त हो जायेगा।
- पुत्र प्राप्ति हेतु-उन्नीस दिन सवा पाव तेल का दीपक जलाने से इच्छित सन्तान की प्राप्ति होती है।
- शत्रु शमन के लिए-75 बत्ती वाली दीपक जलाने से शत्रु का नाश हो जाता है।
- गाय के दूध का घी सर्वसिद्धिधारक होता है।
- भैंस के दूध का घी मारण क्रिया के प्रयोग में लाया जाता है।
- उॅटनी के दूध का घी विद्वेषण में प्रयोग होता है।
- भेड़ के दूध का घी शान्तिकर्म में प्रयोग किया जाता है।
- बकरी के दूध का घी उच्चाटन क्रिया में प्रयोग होता है।
तिल का तेल सर्वार्थसिद्धि के लिए प्रयोग होता है।
सरसों का तेल मारण क्रिया में उपयोग किया जाता है। - मुख रोग व दुर्गन्ध में फूलों के रस का तेल उपयोग होता है।
- दीपक की बत्ती में धागे का महत्व-बत्तियों के धागे को तीन बार धोकर क्रमशः वशीकरण में श्वेत, विद्वेषण में पीत, मारण में हरा, उच्चाटन में केसरिया, स्तम्भ में काला धागा प्रयोग करना चाहिए। शान्ति के लिए काले धागे का उपयोग न करें बल्कि सफेद धागे का इस्तेमाल करें।
- दीपक के मुख का विचार-पूर्व दिशा में दीपक का मुख रखने से सर्वसुख की प्राप्ति होती है। स्तम्भन, उच्चाटन रक्षण, विद्वेषण में दीपक का मुख पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए। मारण क्रिया में दीपक का मुख दक्षिण दिशा में होना चाहिए। लक्ष्मी प्राप्ति के लिए दीपक का मुख उत्तर दिशा में रखना श्रेष्ठ होता है।

दीपदान करने से लाभ

घी व तेल का प्रयोजन

वशीकरण में श्वेत, विद्वेषण में पीत
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