अयोध्या, चित्रकूट के साथ-साथ विंध्य धाम की भी सुनियोजित विकास कर रही योगी सरकार
लखनऊ। चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ। महामुनि वाल्मीकि इन्हीं शब्दों में इस सुरम्य क्षेत्र की गाथा कहते हैं। अब उत्तर प्रदेश सरकार चित्रकूट के साथ ही विंध्य धाम में भी संभावनाओं की नई गाथा लिखने जा रही है। वस्तुत: उत्तर प्रदेश को देश का सबसे बड़ा धार्मिक पर्यटन केंद्र बनाने का संकल्प तभी पूरा हो सकता है, जबकि अयोध्या के साथ ही विंध्य धाम और चित्रकूट का भी सुनियोजित विकास हो।

रामनगरी के समग्र विकास का खाका खींचा जा चुका है और तेजी से काम भी चल रहा है, लेकिन बीते पखवाड़े राज्य सरकार ने चित्रकूट और विंध्य धाम के लिए तीर्थ विकास परिषद के ड्राफ्ट को मंजूरी देकर इसे व्यवस्थित राह पर लाने की तैयारी की है। वैसे चित्रकूट में पहले से भी काफी काम हो रहा है और यहां की सुरम्य पहाड़ियों में रोप-वे एक बड़े आकर्षण के रूप में उभरा है। एयरपोर्ट की उपलब्धि भी बड़ी है, जो विदेशी सैलानियों को यहां आने के लिए प्रेरित करेगी।
सरकार ने अपने फैसले से इन दोनों क्षेत्रों के सुनियोजित विकास में आने वाली अड़चनें दूर की है। कैबिनेट बैठक में श्री चित्रकूट धाम तीर्थ विकास परिषद विधेयक, 2021 और उप्र विंध्य धाम तीर्थ विकास परिषद विधेयक, 2021 के ड्राफ्ट को मंजूरी प्रदान करने के साथ ही इनके गठन के लिए विधानमंडल के मानसून सत्र में विधेयक भी लाया जाएगा। यह महत्वपूर्ण है कि दोनों परिषदों के अध्यक्ष मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ होंगे और वही भविष्य में सभी निर्णय भी लेंगे। दोनों ही धामों की सांस्कृतिक, स्थापत्य संबंधी विरासत के संरक्षण, पारिस्थितिकीय संरक्षण, विकास और रखरखाव के लिए आवश्यक योजना ये परिषदें ही तैयार करेंगी। साथ ही योजना को धरातल पर उतारने और संबंधित तमाम विभागों के बीच समन्वय और निगरानी की भी जिम्मेदारी इन परिषदों पर होगी।
इसे अन्य सामान्य फैसलों में नहीं रखा जा सकता। उत्तर प्रदेश में धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, प्राकृतिक संपदा की बहुलता है, लेकिन आजादी के इतने वर्षो बाद भी आज तक इस पर उचित तरीके से ध्यान नहीं दिया गया। यही कारण है कि चाहे वह धार्मिक पर्यटक हों या प्राकृतिक सौंदर्य के प्रेमी या फिर ऐतिहासिक अभिरुचि के पर्यटक उत्तर प्रदेश में आकर कुछ ही स्थानों तक सीमित हो जाते हैं, जबकि प्रदेश के कोने-कोने में इसकी संभावनाएं बिखरी पड़ी हैं। इस संभावनाओं को वास्तविक रूप से पहचाना है योगी सरकार ने, इसलिए हर संभव संभावना तलाशी जा रही है। क्योंकि पर्यटकों की संख्या बढ़ने से न केवल रोजगार बढ़ेगा, बल्कि पर्यटन उद्योग बढ़ने से होटल से लेकर परिवहन तक तमाम तरह के उद्योग भी पनपेंगे। प्रदेश की आर्थिक समृद्धि का यह बहुत ही संभावनाशील क्षेत्र होते हुए भी अभी तक अछूता और उपेक्षित रहा है। सबसे पहले रामायण सर्किट योजना पर काम शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे आगे भी बढ़ रहा है, पर इससे इतर भी तमाम ऐसे क्षेत्र हैं, जहां विकास की आवश्यकता है। हालांकि इसकी शुरुआत ब्रज तीर्थ विकास परिषद के गठन से कर दी गई थी, पर चित्रकूट और विंध्य धाम पर भी परिषद के गठन की जरूरत थी, जो अब पूरी होने जा रही है।
इसके साथ एक महत्वपूर्ण सवाल भी है। महज परिषद के गठन से ही कुछ नहीं होता। जैसा कि ब्रज तीर्थ विकास परिषद के मामले में है। मथुरा में परिषद का गठन तो कर दिया गया है, लेकिन ऐसा कुछ भी बदलाव नहीं दिखता जो परिषद के गठन के बाद होना चाहिए। जिन बुनियादी सुविधाओं की जरूरत होती है, वह तक नहीं दिखतीं। इस मामले में यदि एकमात्र माडल है तो वह माता वैष्णो देवी श्रइन बोर्ड। धार्मिक पर्यटन करने वाले लोग इस फर्क को समझते हैं। सभी आवश्यक सुविधाएं, स्वच्छता और सुरक्षा की जो व्यवस्था माता वैष्णो देवी धाम यात्र में दिखती है, वह और कहीं नहीं है। चित्रकूट और विंध्य धाम की भी यात्र करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या कम नहीं है। चित्रकूट हो या विंध्य धाम दोनों ही विंध्य पहाड़ी से जुड़े हैं, लेकिन इस मामले में चित्रकूट को देखें तो इसका जो हिस्सा मध्य प्रदेश क्षेत्र के अंतर्गत आता है, वहां काफी विकास हुआ है।
आवश्यक सुविधाएं भी हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश वाले हिस्से में ऐसा कुछ भी नहीं दिखता है। चूंकि पूर्व की सरकारों द्वारा इन क्षेत्रों की उपेक्षा की गई, इसलिए ये पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो सके, लेकिन जब अब वर्तमान सरकार ने इस पर ध्यान दे ही दिया है तो उसे एक बार में ऐसा कुछ कर जाना चाहिए, जिससे आगे चल कर कोई कमी नजर न आए। उत्तर प्रदेश में धार्मिक स्थलों के विकास का एक ऐसा माडल सामने आना चाहिए, जिसकी मिसाल दी जा सके। इन क्षेत्रों में एकीकृत पर्यटन विकास और विरासत के संरक्षण व प्रबंधन की ऐसी नजीर सामने आए जो पिछली सारी उपेक्षाओं और कमियों को दूर कर दे। क्योंकि ये क्षेत्र केवल धार्मिक ही नहीं, रमणीय, सुरम्य और प्राकृतिक रूप से भी काफी समृद्ध हैं। इसलिए हर प्रकृति के पर्यटक इस ओर आकर्षित होंगे। इसे ध्यान में रखकर ही इन क्षेत्रों का विकास करना होगा। व्यवस्था ऐसी करनी होगी कि दुनिया के किसी भी देश के पर्यटक के लिए वर्ष र्पयत यहां आना सुगम बन सके।
दोनों धामों के विकास के लिए परिषद का गठन भले ही हो जाए, लेकिन इसका लाभ तभी सही ढंग से प्राप्त हो सकेगा, जब विकास उचित ढंग से हो। चूंकि चित्रकूट धाम रामायण सर्किट का भी एक हिस्सा है, इसलिए इस पर और भी ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। इसलिए मुख्यमंत्री को स्वयं इसमें विशेष रुचि लेकर अपनी देखरेख में ही विकास के पूरे मानकों की निगरानी करनी होगी। अन्यथा परिषदों का गठन तो हो जाएगा, लेकिन वह महज दिखावा ही साबित होगा। यदि प्रदेश का संतुलित और पर्याप्त विकास करना है तो अपने धार्मिक, प्राकृतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों पर विशेष ध्यान देते हुए उनको सजाने-संवारने, संजोने का काम करना ही होगा।












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