दो दिवसीय राष्ट्रीय सिंपोजियम का आयोजन, जन संचार माध्यम-संस्कृत पत्रकारिता पर डाला प्रकाश
कविकुल कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, रामटेक के मीडिया प्रकोष्ठ और उनके सन्निधि नामक एल्युमिनाई एसोशिएशन और सीएसयू के संयुक्त तत्त्वावधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय सिंपोजियम का आयोजन किया गया। जिसका विषय था ' भारतीय ज्ञान परम्परा के परिप्रेक्ष्य में जन संचार माध्यम तथा संस्कृत पत्रकारिता '। इसमें देश के विविध विशेषज्ञों ने अपने महत्त्वपूर्ण विचार रखें।
कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी ने इसके उद्घाटन सत्र के अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में संस्कृत पत्रकारिता तथा भगवान नारद के महत्त्व को बताते हुए इसकी प्राचीनता पर प्रकाश डाला।

केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली से पधारे प्रो. अजय कुमार मिश्रा, प्रभारी मीडिया प्रकोष्ठ, आईकेएस प्रकोष्ठ तथा जनसंपर्क अधिकारी ने रिसोर्स पर्सन के रूप में मीडिया के लिए संस्कृत सामग्री लेखन, भारतीय ज्ञान परम्परा में संस्कृत की भूमिका तथा संस्कृत विश्वविद्यालयों व शैक्षणिक संस्थानों के जन संपर्क अधिकारी की भूमिका जैसे तीन सत्रों में अपने महत्त्वपूर्ण व्याख्यान दिए। संस्कृत पत्रकारिता के राष्ट्रीय सिंपोजियम में प्रो मिश्रा ने कहा संस्कृत के बिना आईकेएस का समग्र ज्ञान अधूरा।
इसके अतिरिक्त प्रो. मिश्रा ने कविकुल कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, रामटेक के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. रेणुका बोकारे के साथ वहां पर आयोजित वैदर्भी शोध पत्रिका (यूजीसी केयर लिस्टेड ) तथा वार्ता पत्रिका के सभी पुराने अंकों के अतिरिक्त अद्यतन अंकों के संग्रह के एक आयोजित प्रदर्शनी का भी विमोचन किया।
प्रो. अजय कुमार मिश्रा ने कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी को अपनी स्वतन्त्र समीक्षा पुस्तक "उत्तर आधुनिकता तथा संस्कृत कविता" भी भेंट स्वरूप दी, जो संस्कृत कविता के पूर्वी तथा पश्चिमी विचारधारों को लेकर नवाचारी विमर्श करती है। इसकी भूमिका जाने माने संस्कृत विद्वान प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र (दोनों पूर्व कुलपति) तथा प्रो. गिरीश नाथ झा, अध्यक्ष , वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग ( सीएसटीटी) ने लिखी है।
इस पुस्तक भेंट के अवसर युवा संस्कृत विद्वान डा शास्त्री कौशलेन्द्रदास तथा विदुषी एवं श्रमसाधनी डॉ. रेणुका बोकारे भी उपस्थित रहें। प्रो. अजय कुमार मिश्रा का मानना था कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में जो भारतीय ज्ञान परम्परा (आईकेएस) के महत्त्व पर जो बल दिया गया है, उसको चरितार्थ करने में इसे एक ऐतिहासिक पहल माना जाना चाहिए क्योंकि संस्कृत के बिना आईकेएस के लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इसके लिए यह विश्वविद्यालय विशेष कर इस सिम्पोजियम की संयोजिका विदुषी डा रेणुका बोकारे सर्वथा स्तुत्य हैं।
प्रो. मिश्रा ने आगे यह भी कहा कि संस्कृत की सामग्री को आईकेएस की दृष्टि से लिखने का उत्तरदायित्व संस्कृत लेखकों के लिए कुछ और अधिक इसलिए भी है कि बौद्धिक मानसिकता की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने में संस्कृत और उसका शास्त्र ज्ञान रामबाण हो सकती है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उन्नयन के लिए भी यह जरूरी है। इसलिए यह बहुत ही आवश्यक है विदेशी विद्वानों ने जो भारतीय बौद्धिकता को नीचे दिखाने के लिए षड्यंत्र किया है ,उनको समुचित खोज पूर्ण आईकेएस पाठ्य सामग्री के जरिए खारिज किया जाना चाहिए।
इस प्रसंग में उन्होंने केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी के उस वक्तव्य की भी चर्चा की कि संस्कृत भविष्य की भाषा है। इसलिए संस्कृत की भूमिका को ना केवल जनसंपर्क अधिकारी, अपितु सभी संस्कृत विद्वानों तथा विदुषियों के साथ साथ इसके अनुरागियों को न केवल शोध पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से, बल्कि सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में संस्कृत को सोशल मीडिया के साथ जम कर उड़ान भी भरनी होगी, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि आईटी के खुले हाथ होने के कारण इस पर सूचनाओं का अंबार सा लग गया। अतः इनकी सटीकता पर भी ध्यान रहे। अतः संस्कृत विश्वविद्यालयों के जन संपर्क अधिकारी की भूमिका आईकेएस से जुड़ी सामग्री की उपलब्धता, सटीकता , उसका प्रचार प्रसार और पारदर्शिता की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। साथ ही साथ जन संपर्क अधिकारी जो किसी भी विश्वविद्यालय की उपलब्धियों तथा गति विधियों को लोक तक ले जाने का मुंह की तरह होता है। अतः उसका यह भी नैतिक जिम्मेदारी है कि अपने राष्ट्र, विश्वविद्यालयों तथा संस्थानों की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने में अपनी जान लगा दे और सबका साथ ,सबका विकास तथा सबका विश्वास में विश्वास करें। लेकिन इसको अमली जामा पहनाने के लिए यह भी आवश्यक है जन संपर्क अधिकारी को समुचित सम्मान और सुविधा मिले। संस्कृत पत्रकारिता के छात्र छात्राओं को को एक दूसरे के विश्वविद्यालयों तथा संस्थानों में जाकर इन्टर्नशिप का भी अवसर दिया जाए, ताकि संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए एक पीढ़ी भी बन सके और रोजगार का भी अवसर खुले।
पत्रिकाओं की प्रदर्शनी के उद्घाटन के क्रम में प्रो. मिश्रा ने कहा कि हार्ड कॉपी के रूप में संस्कृत पत्र पत्रिकाओं को बचाए रखना आज भी बहुत ही टेढ़ी खीर है। प्रो. मिश्रा का मानना था कि कविकुल कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय के अधिकारियों के मार्गदर्शन में डॉ. बोकारे इन पत्रिकाओं का संपादन तथा संरक्षण प्रदान कर रही हैं, वस्तुत: वह साहित्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति और उसके इतिहास को भी सुरक्षित कर रहीं हैं क्योंकि साहित्य अपनी समकालीन समाज का प्रत्यक्षदर्शी भी होता है। इस तरह संस्कृत और आईकेएस के महत्त्व को स्थापित किया जाना चाहिए।
इस ऐतिहासिक सिंपोजियम में डॉ. शास्त्री कौशलेन्द्रदास, प्रभारी जन संपर्क अधिकारी तथा डीन, दर्शनशास्त्र, जेआरआर एसयू, जयपुर, डॉ. नारायणदत्त मिश्रा, संपादक तथा संस्कृत समाचार वाचक, वार्तावल्ली, दूरदर्शन, दिल्ली, नहुष वाडजे (Nahush Badge), साउण्डज वेस्ट स्टुडियो, नागपुर, सहायक निदेशक सुश्री श्रद्धा देश पुजारी तथा उमेश यादव, सहा. आचार्य, क्रुणाल महाजन, सहा. आचार्य, कविकुल कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय (तीनों अंतिम) ने क्रमशः संस्कृत की मणिप्रवाल शैली, मीडिया में लेखन तथा वाचन तकनीक, वीडियो और ध्वनि के माध्यमों रोजगार की संभावनाएं, कम्प्यूटर और सोशल मीडिया एवं आधुनिक भाषाओं की पत्रकारिता को लेकर अपने विमर्श प्रस्तुत किए।
डॉ. रेणुका बोकारे भी रिसोर्स पर्सन के रूप में अपने व्याख्यान में आईकेएस में संस्कृत के महत्त्व पर व्यापक प्रकाश डाला और पीली पत्रकारिता से भी बचे रहने की बात की। इस सिंपोजियम के उद्घाटन सत्र में कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी, कुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, रामटेक, विजय पनशिकर , प्रधान संपादक, दि हितवाद, समाचार पत्र , नागपुर डॉ राखी तिवारी, कम्युनिकेशन रिसर्च, विभागाध्यक्ष, एमसीएनयूजेसी, भोपाल, डॉ. लीना रस्तोगी, भवितव्यम्, संपादक, संस्कृत, दैनिक, नागपुर, डॉ. नन्द किशोर पत्तरकाइन (Nandkishore Pattarkine), पूर्व संपादक, भवितव्यम्, संस्कृत दैनिक, नागपुर, प्रो. क्रुष्ण कुमार पाण्डेय, कुल सचिव तथा प्रो. हरे कृष्ण अगस्ती, निदेशक कविकुल कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय ने भी अपने विचार रखें।
इसके समापन सत्र की अध्यक्षता संस्कृत साहित्य की विदुषी प्रो. कविता होले, फाइनेंस तथा एकाउंट अधिकारी ने किया और उन्होंने अपने उद्बोधन में इसकी सार्थकता पर प्रकाश डाला और आगे यह भी कहा कि इस सिंपोजियम से हमें यह भी सीख लेनी चाहिए कि इस दिशा में और क्या उत्तरोत्तर उत्कृषट किया जा सकता है ? प्रो. होले ने प्रतिभागियों को अपने करकमलों से सहभागिता प्रमाणपत्र पत्र भी वितरित किया।
प्रो. कलपिनी अगस्ती, अध्यक्ष, एल्युमिनाई, कविकुल कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय तथा सुश्री श्रीवरदा मालगे इस सिंपोजियम के सह संयोजक का कार्य किया तथा इसके यशस्विनी संयोजिका डॉ. रेणुका बोकारे, जन संपर्क अधिकारी ने केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली के कुलपति प्रो श्रीनिवास वरखेड़ी तथा निदेशक, केन्द्रीय योजनाएं प्रो. मधुकेश्वर भट को इसमें सहयोग देने के लिए आभार व्यक्त किया
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